Ram Mandir: CBRI रूड़की के वैज्ञानिकों ने बताया राम मंदिर की कितनी है उम्र, जानिए मंदिर से जुड़ी 10 खास बातें
Ram Mandir Pran Pratistha पूरे देश इस समय राममय नजर आ रहा है। हर कोई एक बार अयोध्या में भव्य राम मंदिर के दर्शन करना चाहता है। साथ ही इस मंदिर की भव्यता और खास बातों का जानने के लिए उत्साहित है। बता दें कि श्रीराम के इस भव्य मंदिर के निर्माण में रुड़की स्थित केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों की टीम ने भी अपना योगदान दिया है।

सीबीआरआइ की टीम द्वारा राम मंदिर की नींव के अलावा संरचनात्मक डिजाइन सूर्य तिलक और संरचनात्मक स्वास्थ्य निगरानी का कार्य किया जा रहा है। वैज्ञानिकों ने भूकंप की दृष्टि से राम मंदिर को जोन-चार के अनुसार बनाया है। इसकी उम्र भी एक हजार साल से ज्यादा बताई जा रही है। यानि एक हजार साल तक भी मंदिर को किसी तरह का कोई डर नहीं है।
बता दें कि सीबीआरआई रुड़की तीन दशक से अयोध्या में विराजमान रामलला की सेवा में तकनीकी सहायता उपलब्ध कराता रहा है। तिरपाल को आग और पानी व बंदरों से सुरक्षित रखने के लिए संस्थान में बनाया गया। 400 वर्ग मीटर के तिरपाल पर विशेष प्रकार के केमिकल की कोटिंग कर 1994 में रामलला के ऊपर स्थापित किया गया। इसके बाद 2003 और फिर 2015 में नया तिरपाल बनाकर भेजा गया।
22 जनवरी को अयोध्या में श्रीराम मंदिर में रामलला की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा होनी है। मंदिर के निर्माण में अहम भूमिका निभाने वाले सीबीआरआई रूड़की के वैज्ञानिकों ने इसके बारे में विस्तार से बताया। CBRI रूडकी के निदेशक प्रदीप कुमार ने बताया कि तकनीक के साथ भारतीय संस्कति का भी समावेश किया गया है।
प्रोजेक्ट सूर्य तिलक को भी सीबीआरआई ने अंजाम दिया है। इसके तहत मंदिर के भीतर विराजमान रामलला के मस्तक पर रामनवमी के दिन सूर्य की किरणें दोपहर 12 बजकर 04 मिनट पर 20 सेकेंड के लिए विराजमान रहेंगी।
वैज्ञानिक डाॅ. एसके पाणिग्रही ने बताया कि मंदिर के ऊपर की मंजिल पर शीशा लगा है और इसी तरह फाउंडेशन में लगा है। ये सामने से आने वाली सूर्य की किरणों को बुनियाद के शीशे पर रिफलेक्ट करेगा और यहां से सूर्य की किरणें रामलला के मस्तक पर पड़ेंगी। इसके लिए गियर मैकेनिज्म का प्रयोग किया गया है। इसके जरिए रामनवमी को शीशे की दिशा को खास तरीके से फिक्स किया जाएगा।
राम मंदिर से जुड़ी 10 बड़ी बातें
- फाइनल डिज़ाइन से पहले कंप्यूटर पर 50 माडल बनाए गए थे जिसमें 6 माह का समय लगा। खास बात यह है कि पूरे भवन में कोई सरिया नहीं लगा है।
- मंदिर की ऊंचाई 161 फिट है। पूरे मंदिर में कलम को एक के ऊपर एक पत्थर को रखकर इंटरलॉकिंग सिस्टम से निर्मित किया गया है।
- इस निर्माण के दौरान जहाँ एक और इसकी नीव में सेंसर लगाए गए है वही सेंस स्टोन से भव्य मंदिर का निर्माण किया गया है। वही इस निर्माण के दौरान रूडकी सीबीआरआई के अलावा देश की पाँच आईआईटी के वैज्ञानिकों से भी सलाह ली गई है।
- राम मंदिर के निर्माण के दौरान भूकम्प के कारण होने वाली क्षति का खास ख्याल रखा गया है और इसकी उम्र एक हज़ार साल निर्धारित की गई है।
- वैज्ञानिकों के अनुसार जब रामलला को टेंट के नीचे स्थापित किया गया था तभी से रूडकी सीबीआरआई के वैज्ञानिकों द्वारा टेंट को भी इन्ही के द्वारा तैयार किया गया था और उस टेंट की ख़ासियत थी कि उस पर आग व पानी का कोई असर नही होता था।
- राम मंदिर के निर्माण में सरिये का इस्तेमाल नहीं हुआ। पत्थर से पत्थर की इंटरलाकिंग की गई है। इसमें बंशी पहाड़पुर के सैंड स्टोन का प्रयोग किया गया है। इसकी वास्तुकला नागर शैली में है।
- सूर्य तिलक प्रोजेक्ट पर कार्य करने वाले सीबीआरआई रुड़की के वैज्ञानिक डॉ. एसके पाणिग्रही ने बताया कि प्रत्येक साल रामनवमी के दिन प्रभु श्रीराम की प्रतिमा के मस्तक पर सूर्य रश्मियों से तिलक होगा
- पूरे भवन की प्रतिपल हेल्थ मॉनिटरिंग के लिए नींव, कॉलम और रिटेनिंग वॉल में सेंसर लगाए गए हैं।
- मंदिर का भवन कलाकृति का भी बेजोड़ नमूना होगा। पूरे भवन में भार को संतुलित करने के लिए जगह-जगह भारी भरकम हाथी और घोड़े स्थापित किए गए हैं।
- वैज्ञानिक डॉ. देवदत्त घोष ने बताया कि भवन पूरी तरह भूकंपरोधी है। साथ ही इसे किसी भी प्राकृतिक आपदा की आशंका से दोगुनी क्षमता सहने के हिसाब से तैयार किया गया है।












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