Raksha bandhan 2025: रक्षाबंधन पर एक दिन के लिए खुलने वाले मंदिर का जानिए क्या है रहस्य
Raksha bandhan 2025: रक्षाबंधन 9 अगस्त 2025 शनिवार को मनाया जाएगा। जो कि भाई बहन के प्रेम और विश्वास का पवित्र बंधन है। हिंदू धर्म का ये त्यौहार भगवान के साथ भी मनाया जाता है। कुछ लोग भगवान को राखी बांधकर अपनी रक्षा का संकल्प लेते हैं।
उत्तराखंड देवभूमि है, तो यहां कई मंदिर ऐसे हैं जहां रक्षाबंधन पर विशेष पूजा अर्चना की जाती है। लेकिन इन सबके बीच एक मंदिर ऐसा है जो सिर्फ रक्षाबंधन पर एक दिन के लिए खुलता है और उसके बाद भक्तों के लिए बंद हो जाता है। रक्षाबंधन पर ग्रामीण महिलाएं आकर भगवान श्रीकृष्ण के इस मंदिर पर राखी बांधती हैं।

उत्तराखंड में भी श्रीकृष्ण के कई ऐसे मंदिर है। जिनकी पौराणिक मान्यता खास है। उत्तराखंड के चमोली जिले की उर्गम घाटी में बंशीनारायण मंदिर भी ऐसा ही खास मंदिर है। इस मंदिर को लेकर सबसे बड़ी मान्यता ये है कि मंदिर सिर्फ एक दिन के लिए खुलता है। रक्षाबंधन के दिन सूर्योदय के साथ खुलता है और सूर्यास्त होते ही मंदिर के कपाट अगले 365 दिन के लिए बंद कर दिए जाते हैं। लेकिन जैसे ही मंदिर का द्वार खुलता है वैसे ही महिलाएं भगवान को राखी बंधना शुरू कर देती हैं और बड़े धूम.धाम के साथ पूजा भी करती हैं।
यहां तक कई लोग ट्रैकिंग करते हुए पहुंचते हैं। जिस स्थान पर मंदिर है वहां बुग्याल भी है। स्थानीय लोगों का दावा है कि बंशी नारायण मंदिर की बनावट कत्यूरी शैली में बना है। जो कि छठवीं से दसवीं इसवीं के मध्य निर्मित किया गया है। यहां श्री कृष्ण और भोलेनाथ की प्रतिमा स्थापित हैं। दस फुट ऊंचे मंदिर में भगवान की चतुर्भुज मूर्ति विराजमान है। वामन अवतार से मुक्त होने के बाद सबसे पहले यहीं प्रकट हुए थे विष्णु पौराणिक मान्यता है कि विष्णु अपने वामन अवतार से मुक्त होने के बाद सबसे पहले यहीं प्रकट हुए थे। इसके बाद से ही यहां देव ऋषि नारद भगवान नारायण की पूजा की जाती है।
इसी वजह से यहां पर लोगों को सिर्फ एक दिन ही पूजा करने का अधिकार मिला हुआ है। मान्यता है कि राजा बलि के अहंकार को नष्ट करने के लिए भगवान विष्णु ने वामन का रूप धारण किया था और बलि के अहंकार को नष्ट करके पाताल लोक भेज दिया। जब बलि का अहंकार नष्ट हुआ तब उन्होंने नारायण से प्रार्थना की कि आप मेरे सामने ही रहें। इसके बाद विष्णु जी बलि का द्वारपाल बन गए।
जब बहुत दिनों तक विष्णु जी, मां लक्ष्मी के पास नहीं पहुंचे तो लक्ष्मी जी पाताल लोग पहुंच गईं और बलि की कलाई पर राखी बांधकर उन्हें विष्णु जी को मांग और लौटकर अपने लोक में पहुंच गए। तब से इस जगह को वंशी नारायण के रूप में पूजा जाने लगा। , मान्यता है कि इस मंदिर में भगवान नारद जी ने 364 दिन भगवान विष्णु की पूजा करते और एक दिन के लिए चले जाते थे ताकि लोग पूजा कर सकें।












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