Igas Selfie With Family हैशटैग के साथ फोटो सोशल मीडिया पर अपलोड करें, धामी सरकार देगी ईनाम
मुख्यमंत्री धामी ने "सेल्फी विथ फैमिली" अभियान शुरू किया
उत्तराखंड का लोकपर्व इगास, बूढ़ी दिवाली आज पूरे धूमधाम से मनाया जा रहा है। धामी सरकार ने इस लोकपर्व पर राजकीय अवकाश घोषित किया है। साथ ही लोकपर्व को पूरे संस्कृति और रीति रिवाज के साथ मनाने का आह्रवान किया है। इस मौके पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने खास बनाने के लिए "सेल्फी विथ फैमिली" अभियान शुरू किया है।

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सोशल मीडिया के जरिए जारी संदेश में सीएम धामी ने कहा कि हमारी सरकार ने प्रदेश के लोक पर्वों एवं परंपराओं के संवर्धन के उद्देश्य से इगास, बूढ़ी दिवाली के अवसर पर अभियान के अंतर्गत 3 भाग्यशाली विजेताओं को प्रोत्साहन पुरस्कार प्रदान करने का निर्णय लिया है। यह त्योहार मनाते हुए आप भी अपने परिवार के साथ सेल्फी लेकर #SelfieWithFamily हैशटैग के साथ अपनी फ़ोटो सोशल मीडिया पर अपलोड कर आकर्षक उपहार जीतने का अवसर प्राप्त कर सकते हैं।
दीपावली से 11 दिन बाद आने वाली एकादशी को मनाया जाता है ईगास
ईगास पर्व दीपावली से 11 दिन बाद आने वाली एकादशी को मनाया जाता है। इस पर्व के दिन सुबह मीठे पकवान बनाये जाते हैं जबकि रात में स्थानीय देवी.देवताओं की पूजा अर्चना के बाद भैला जलाकर उसे घुमाया जाता है और ढोल नगाड़ों के साथ आग के चारों ओर लोक नृत्य किया जाता है। इगास पर्व मनाने के पीछे कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। एक पौराणिक मान्यता है कि जब भगवान राम 14 वर्ष बाद लंका विजय कर अयोध्या पहुंचे तो लोगों ने दिये जलाकर उनका स्वागत किया और उसे दीपावली के त्योहार के रूप में मनाया। लेकिन कहा जाता है कि गढ़वाल क्षेत्र में लोगों को इसकी जानकारी 11 दिन बाद मिली। इसलिए यहां पर दीपावली के 11 दिन बाद यह दीवाली इगास मनाई जाती है।
सबसे प्रचलित मान्यता के अनुसार
सबसे प्रचलित मान्यता के अनुसार गढ़वाल के वीर भड़ माधो सिंह भंडारी टिहरी के राजा महीपति शाह की सेना के सेनापति थे। करीब 400 साल पहले राजा ने माधो सिंह को सेना लेकर तिब्बत से युद्ध करने के लिए भेजा। इसी बीच बग्वाल दीपावली का त्यौहार भी थाए लेकिन इस त्यौहार तक कोई भी सैनिक वापिस ना आ सका। सबने सोचा माधो सिंह और उनके सैनिक युद्ध में शहीद हो गएए इसलिए किसी ने भी दीपावली नहीं मनाई। दीपावली के ठीक 11वें दिन माधो सिंह भंडारी अपने सैनिकों के साथ तिब्बत से दवापाघाट युद्ध जीत वापिस लौट आए। कहा जाता है कि युद्ध जीतने और सैनिकों के घर पहुंचने की खुशी में उस समय दिवाली मनाई थी। उस दिन एकादशी होने के कारण इस पर्व को इगास नाम दिया गया और उसी दिन से गढ़वाल क्षेत्र में दीपावली के 11 दिन बाद इगास पर्व मनाया जाता है। इगास पर्व के दिन लोग घरों की साफ.सफाई कर पारम्परिक पकवान बनाते है। पशुओं की पूजा की जाती और रात को पूरे उत्साह के साथ गांव में एक जगह इकठ्ठे होकर भैलो खेलते। भैलो का मतलब एक रस्सी से हैए जो पेड़ों की छाल से बनी होती है। इगास के दिन रस्सी को घुमाते हुए भैलो खेलते हैं।
भैला का है विशेष महत्व
ईगास बग्वाल के दिन भैला खेलने का विशेष महत्व है। यह चीड़ की लीसायुक्त लकड़ी से बनाया जाता है। यह लकड़ी बहुत ज्वलनशील होती है। इसे दली या छिल्ला कहा जाता है। जहां चीड़ के जंगल न हों वहां लोग देवदार, भीमल या हींसर की लकड़ी आदि से भी भैलो बनाते हैं। इन लकड़ियों के छोटे-छोटेटुकड़ों को एक साथ रस्सी अथवा जंगली बेलों से बांधा जाता है। फिर इसे जला कर घुमाते हैं। इसे ही भैला खेलना कहा जाता है।












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