महाशिवरात्रि स्पेशल: उत्तराखंड का त्रियुगीनारायण मंदिर, जहां हुआ था शिव और पार्वती का विवाह
शिव विवाह के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है महाशिवरात्रि
देहरादून, 1 मार्च। आज महाशिवरात्रि का महापर्व है। हिंदू ग्रंथों के अनुसार महाशिवरात्रि शिवजी का महापर्व यह पर शिव विवाह के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। ऐसे में यह जानना जरुरी है कि भगवान शिव और पार्वती का विवाह कहां हुआ था। आइए हम आपको बताते हैं वह पवित्र स्थान एक मंदिर है, जहां भगवान शिव का विवाह हुआ था।

भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी का है मंदिर
यह पवित्र मंदिर है उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में। धार्मिक मान्यता है कि भगवान शिव ने हिमालय के मंदाकिनी क्षेत्र के त्रियुगीनारायण में माता पार्वती से विवाह किया था। यह मंदिर भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी का है। यहां जलने वाली अग्नि की ज्योति, जो त्रेतायुग से अब तक निरंतर जल रही है। इस हवन कुंड की अग्नि को साक्षी मान कर भगवान शिव ने माता पार्वती से विवाह किया था। इसी मंदिर में कई जोड़े शादी के पवित्र बंधन में बंधते हैं। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता पार्वती, पर्वतराज हिमावन की पुत्री थी। पार्वती के रूप में मां सती का पुनर्जन्म हुआ था। अपने इस जन्म में माता पार्वती ने कठिन ध्यान और साधना से भगवान शिव का वरण किया था। जिस स्थान पर मां पार्वती ने शिव जी को पाने के लिए कठोर साधना की, उस स्थान को गौरी कुंड कहते हैं। जो श्रद्धालु त्रियुगीनारायण जाते हैं, वे गौरीकुंड के दर्शन भी जरूर करते हैं। बताते हैं कि भगवान शिव जी ने गुप्त काशी में माता पार्वती के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा था। भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी के इस मंदिर को पार्वती के विवाह स्थल के रूप में जाना जाता है। आज भी इनकी शादी की निशानियां यहां मौजूद हैं। भगवान विष्णु ने पार्वती के भाई की भूमिका निभाई थी। जबकि ब्रह्माजी पुरोहित बने थे।
मंदिर की संरचना बिल्कुल केदारनाथ मंदिर के समान
त्रिजुगीनारायण गांव पौराणिक क्षेत्र हिमवत की राजधानी था। मंदिर की संरचना बिल्कुल केदारनाथ मंदिर के समान ही है। ऐसी मान्यता है कि यह मंदिर त्रेतायुगीन है। मंदिर में एक हवन कुंड हैं जहां सदैव अग्नि प्रज्ज्वलित रहती है। ऐसी मान्यता है कि यह अग्नि उसी विवाह समारोह की है और इसी अग्नि के चारों ओर माता पार्वती और भगवान शिव ने फेरे लिए थे। तब से ही यह निरंतर प्रज्ज्वलित है। तीन युगों से इस अग्नि का अस्तित्व है, यही कारण है कि मंदिर त्रियुगीनारायण कहलाता है। गांव में मंदिर के आसपास तीन कुंड हैं, रुद्र कुंड, विष्णु कुंड और ब्रह्म कुंड। ऐसा कहा जाता है कि ब्रह्म कुंड में ही स्नान करके ब्रह्मा जी ने माता पार्वती और भगवान शिव का विवाह सम्पन्न कराया था। विष्णु कुंड में स्नान करने के बाद भगवान विष्णु ने माता पार्वती के भाई के नाते सभी परंपराओं का निर्वहन किया था और रुद्र कुंड में स्नान करके भगवान शिव विवाह में शामिल हुए। मंदिर में ही एक स्तम्भ भी है। इसके बारे में कहा जाता है कि भगवान शिव को उपहार स्वरूप जो गाय मिली थी उसे इसी स्तम्भ में बांधा गया था।
रुद्रप्रयाग से 159 किमी की दूरी पर है मंदिर
माना जाता है कि वर्तमान मंदिर की स्थापना आदि शंकराचार्य ने की थी। उन्होंने पूरे उत्तराखंड में कई मंदिरों की स्थापना की थी जिनमें केदारनाथ और बद्रीनाथ भी शामिल हैं। मंदिर में चांदी की एक दो फुट की भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित है। यह मंदिर रुद्रप्रयाग से 159 किमी की दूरी पर है। जो कि ऋषिकेश से लगभग 152 किमी की दूरी पर है।
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