Kedarnath Helicopter Crash: पायलट के अनुभव को लेकर खड़ा हुआ सवाल,पिछले ही महीने शुरू की थी इन इलाकों में उड़ान
Kedarnath Helicopter Crash: उत्तराखंड में मंगलवार को केदारनाथ में हेलीकॉप्टर क्रैश हो गया। इसमे पायलट समेत कुल 7 लोग सवार थे और इन सभी की इस हादसे में मौत हो गई। चार महीने पहले बॉम्बे हाई के पास एक हेलीकॉप्टर क्रैश हो गया था, जिसमे चार लोगों की मौत हो गई थी। दोनों ही हादसों में एक बड़ी समानता सामने आई है। एविएशन एक्सपर्ट ने बताया कि दोनों ही हादसों में एक बात यह समान है कि दोनों ही हेलीकॉप्टर को उड़ा रहे पायलट काफी सीनियर थे। लेकिन दोनों ही पायलट ने कुछ समय पहले नए तरीके के एयरक्राफ्ट को उड़ाना शुरू किया था, लिहाजा दोनों का इस तरह के हेलीकॉप्टर को लेकर अनुभव काफी कम था।
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ट्रेनिंग और अनुभव पर सवाल
दोनों ही हादसों में एक और समानता यह है कि दोनों ही हेलीकॉप्टर खराब मौसम की वजह से हुए हैं। कैप्टन अनिल सिंह की बात करें तो वह उत्तराखंड हादसे में शिकार हुए हेलीकॉप्टर को उड़ा रहे थे। उनके पास 15 साल से हेलीकॉप्टर उड़ाने का अनुभव था। अनिल सिंह मल्टी इंजन डॉफिन एन-4 क्राफ्ट को उड़ा चुके थे। वह आर्यन एविएशन के सात सितंबर माह में जुड़े थे। यहां पर उन्होंने सिंगल इंजन बेल-407 को उड़ाना शुरू किया था। अनिल सिंह मुख्य रूप से समुद्र तट पर उड़ान भरने वाले पायलट थे। ऐसे में सवाल यह उठता है कि पहाड़ी और दुर्गम इलाकों में फ्लाइंग की कौन सी विशेष ट्रेनिंग उनके पास थी।

पहाड़ी इलाके पर उड़ान मुश्किल
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार एविएशन एक्सपर्ट ने बताया कि अनिल सिंह सेना के पायलट थे, लिहाजा उन्होंने पहाड़ी इलाकों में उड़ान भरी होगी, लेकिन यह उनके शुरुआती करियर में हुआ होगा। समुद्र के ऊपर मल्टी इंजन हेलीकॉप्टर को उड़ाना और पहाड़ी इलाके में सिंगल इंजन हेलीकॉप्टर को उड़ाना अलग-अलग बात होती है। दोनों में अलग-अलग तरह की कुशलता की आवश्यकता होती है।

दोनों ही हेलीकॉप्टर अलग
एक वरिष्ठ समुद्रतटीय पायलट ने बताया कि मल्टीइंजन हेलीकॉप्टर समुद्र तटीय इलाकों में उड़ान भरते हैं, इसमे ऑटो पायलट का विकल्प होता है, साथ ही अन्य स्थिर रखने वाली डिवाइस भी होती हैं। यह मुख्य तौर पर कॉकपिट के भीतर मौजूद विकल्पों पर चलता है। ऐसे में पूअर विजिबिलिटी बड़ी समस्या नहीं होती है, लेकिन जब सिंगल इंजन हेलीकॉप्टर ऐसी परिस्थिति का सामना करता है तो उसमे काफी दिक्कत होती है, खासकर कि पहाड़ी इलाकों में। बता दें कि डीजीसीए की शुरुआती जांच यह बताती है कि खराब मौसम के चलते यह क्रैश हुआ है।

जून माह में हुए हादसे से समानता
वहीं जून माह में पवन हंस एक्सिडेंट की बात करें तो पायलट के पास डौफिन एन-3 हेलीकॉप्टर उड़ाने का अनुभव था। दोनों हीऑफशोर पायलट थे। दोनों ही पायलट ने जल्द ही ग्लास कॉकपिट सिकोर्स्की को उड़ाना शुरू किया था। दोनों ही पायलट को एक जैसी ट्रेनिंग दी गई थी, उनके पास 10 घंटे से अधिक उड़ान का अनुभव नहीं था, दोनों ही यह उड़ान इंस्ट्रक्टर की मदद से करते थे। मानसून में दोनों ने समुद्री तटों पर उड़ान भरनी शूरू की थी, जोकि समुद्री तट पर सबसे मुश्किल समय होता है।












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