जोशीमठ का नाम हुआ ज्योतिर्मठ, आदि गुरु शंकराचार्य की तप स्थली जानिए क्यों है खास और पौराणिक महत्व
चमोली जिले का ऐतिहासिक और पौराणिक शहर जोशीमठ का नाम ज्योतिर्मठ हो गया है। इसका धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है।
आदि गुरु शंकराचार्य की तप स्थली ज्योतिर्मठ पुराणों में भी खासा पहचान रखता है। जोशीमठ का नाम ज्योतिर्मठ होने के बाद स्थानीय लोगों ने आतिशबाजी और मिठाई खिलाकर एक दूसरे को बधाई दी।

स्थानीय लोग और ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य जोशीमठ का नाम परिवर्तन के पक्ष में रहे हैं। सरकार के सामने भी इसको लेकर कई बार मांग उठी। अब सरकार ने इस मांग को पूरा कर जोशीमठ का नाम परिवर्तित कर ज्योतिर्मठ कर दिया गया है।
उत्तराखंड के चमोली जिले के जोशीमठ की अपनी एक धार्मिक महत्व लिए हुए हैं। आदि गुरु शंकराचार्य की तप स्थली के साथ-साथ यहां का इतिहास और पौराणिक महत्व है। मान्यता है कि 8वीं सदी में आदि गुरु शंकराचार्य इस क्षेत्र में आए थे। उन्होंने अमर कल्पवृक्ष के नीचे तपस्या की थी।
इस तपस्या के फलस्वरूप उन्हें दिव्य ज्ञान ज्योति की प्राप्ति हुई थी। दिव्य ज्ञान ज्योति और ज्योतेश्वर महादेव की वजह से इस स्थान को ज्योतिर्मठ का नाम दिया गया। लेकिन बाद में यह जोशीमठ के नाम से ही प्रचलित हो गया। अब उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने जनभावनाओं को देखते हुए जोशीमठ तहसील को ज्योतिर्मठ नाम देने का फैसला किया है। स्थानीय लोगों का दावा है कि ज्योतिर्मठ का इतिहास 2500 साल पुराना है।
भाजपा ने जोशीमठ एवं कौश्यकुटोली तहसील के नाम परिवर्तन कर पौराणिक एवं संस्कृति पहचान देने का स्वागत किया है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने जोशीमठ को ज्योतिर्मठ और कौश्यकुटोली को श्री कैची धाम करना देश के सांस्कृतिक पारंपरिक स्वरूप को पुनर्स्थापित करने की हमारी नीति का हिस्सा है। क्योंकि सैद्धांतिक एवम वैचारिक पक्ष के अनुरूप जनमानस के विचारों एवं इच्छा को ध्यान में रखते हुए, पूर्व में ही सीएम पुष्कर धामी द्वारा इसकी घोषणा की गई थी। उन्होंने कहा, दोनों ही शहर क्रमश शंकराचार्य की ज्योतिर्मठ पीठ और नीम करोली बाबा के श्री कैंची धाम के कारण दुनिया भर में विख्यात हैं । लिहाजा उनकी पौराणिक पहचान एवं स्थाई पहचान को वर्तमान परिचय बनाना और आने वाली पीढ़ी के लिए सही स्वरूप प्रस्तुत करना बेहद जरूरी था।












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