फ्लैशबैक 2021: उत्तराखंड की सियासत में सत्ता से संगठन तक चला परिवर्तन का दौर
उत्तराखंड में साल भर चली राजनीतिक उठापटक
देहरादून, 24 दिसंबर। 2021 में उत्तराखंड में एक तरफ सियासत में जमकर उठापटक हुई, तो दूसरी तरफ बदलाव भी जमकर हुए। सत्ताधारी भाजपा ने मुख्यमंत्री ही नहीं प्रदेश अध्यक्ष भी बदला, जबकि विपक्षी कांग्रेस ने प्रदेश अध्यक्ष के अलावा संगठन में नया फॉर्मूला लाया। जिसमें एक साथ 4 कार्यकारी अध्यक्ष बनाए गए। इसके अलावा केन्द्र सरकार में भी उत्तराखंड का प्रतिनिधित्व करने वाले चेहरे भी बदले गए। इस तरह 2021 में सियासत में कई परिवर्तन किए गए।

भाजपा ने बदली पुरानी परिपाटी
पहले बात सत्ताधारी भाजपा की। चुनाव मैदान में आने से पहले भाजपा ने मुख्यमंत्री बदलने के साथ ही संगठन में भी बड़ा बदलाव किया। भाजपा ने मदन कौशिक को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर सबको चौंका दिया। भाजपा ने पहली बार तराई सीट से प्रदेश अध्यक्ष बनाया। उत्तराखंड के 21 साल के इतिहास में हमेशा गढ़वाल, कुमाऊँ, ब्राह्रमण, क्षत्रिय के इर्द गिर्द घूमती आ रही है। लेकिन पहली बार सीएम और प्रदेश अध्यक्ष तराई सीट से लाकर इस परिपाटी को खत्म करने की कोशिश की गई। सीएम पुष्कर सिंह धामी भी तराई सीट से हैं। ऐसे में भाजपा के अंदरखाने भी इस बात को लेकर कई दिनों तक विवाद की स्थिति बनी रही, लेकिन केन्द्रीय नेतृत्व ने सभी आशंकाओं को दरकिनार कर दिया। इसके अलावा पहले प्रदेश अध्यक्ष की कमान संभाल रहे बंशीधर भगत को कैबिनेट में लाकर मदन कौशिक की जगह एक दूसरे की सीट सौंप दी। भाजपा केन्द्रीय नेतृत्व ने उत्तराखंड ही नहीं केन्द्र में भी उत्तराखंड के प्रतिनिधित्व को बदल दिया। केन्द्रीय शिक्षा मंत्रालय संभाल रहे डॉ रमेश पोखरियाल निशंक को हटाकर अजय भट्ट को मोदी सरकार में रक्षा, पर्यटन राज्य मंत्री बनाया गया। यहां भी गढ़वाल, कुमाऊँ फेक्टर को पार्टी ने स्वीकार नहीं किया और एक नया प्रयोग किया।
कांग्रेस लाई कार्यकारी अध्यक्ष का फॉर्मूला
कांग्रेस में नेता प्रतिपक्ष इंदिरा ह्रदयेश के निधन के बाद हाईकमान ने प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी देख रहे प्रीतम सिंह को नेता प्रतिपक्ष बना दिया। इसके साथ ही प्रदेश संगठन में बड़ा फेरबदल कर दिया। कांग्रेस हाईकमान ने गणेश गोदियाल को संगठन की जिम्मेदारी दी तो 4 कार्यकारी अध्यक्ष भी बनाए, जो कि जीत राम, भुवन कापड़ी, तिलक राज बेहड़ और रंजीत रावत को जिम्मेदारी दी गई। जीतराम गढ़वाल के दलित चेहरा, भुवन कापड़ी तराई के युवा चेहरा, तिलक राज बेहड़ तराई सीट और रंजीत रावत को कुमाऊँ चेहरा बताया गया। कांग्रेसियों का दावा था कि पार्टी ने हर क्षेत्र और हर वर्ग को प्रतिनिधित्व दिया गया। हालांकि कांग्रेस के अंदर पहले से चली आ रही गुटबाजी को कम करने के लिए कांग्रेस हाईकमान ने पंजाब की तर्ज पर नया फॉर्मूला तैयार कर सबको शांत कराने की कोशिश की। ऐसे में उत्तराखंड कांग्रेस के इतिहास में भी ये पहली बार फॉर्मूला सामने आया।
राजभवन में भी नया चेहरा
उत्तराखंड की सियासत की तरह राजभवन में भी बदलाव हुआ। बेबीरानी मौर्य ने इस्तीफा देकर सक्रिय राजनीति को चुना और वे भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाई गई। बेबीरानी मौर्य 2018 में उत्तराखंड की राज्यपाल बनाई गई थी, लेकिन वे भी अपना कार्यकाल पूरा किए बिना इस्तीफा सौंपकर वापस सक्रिय राजनीति में लौट गई। बेबीरानी मौर्य की जगह उत्तराखंड के नए राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) गुरुमीत सिंह को बनाया गया। जो कि आर्मी बैकग्राउंड और सिख समुदाय से आते हैं। राज्यपाल की नियुक्ति को लेकर भी जमकर राजनीति हुई। केन्द्र सरकार के इस फैसले को उत्तराखंड में सैनिक वोटर और सिख वोटरों से जोड़ा गया। बेबी रानी मौर्य के इस्तीफे के बाद भी विपक्ष ने जमकर आरोप लगाए।












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