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उत्तराखंड में दीपावली के 11 दिन बाद भी मनाते हैं स्थानीय दीवाली, क्या है इगास पर्व, जाानिए मान्‍यता

उत्तराखंड में दीपावली के 11 दिन बाद भी मनाते हैं स्थानीय दीवाली, इगास पर्व,

देहरादून, 12 नवंबर। उत्तराखंड में दीपावली के 11 दिन बाद भी दीवाली बग्वाल की तरह रोशनी से सजे एक अन्य पर्व की धूम रहती है। जिसे इगास कहा जाता है। इस बार इगास इसलिए भी खास हो गया है क्योंकि पहली बार राज्य सरकार ने इगास पर्व पर राजकीय अवकाश घोषित कर दिया है। अब तक 21 साल में किसी सरकार ने इस तरह की पहल नहीं की। लेकिन पहाड़ की संस्कृति को बचाने के लिए राज्य सरकार और सीएम पुष्‍कर सिंह धामी की ये पहल बड़ा कदम माना जा रहा है। राज्य सभा सांसद और भाजपा के राष्ट्रीय मीडिया प्रमुख अनिल बलूनी ने सबसे पहले इगास पर्व अपने गांव में मनाने की शुरूआत की। जिसके बाद से राष्ट्रीय स्तर पर इस पर्व को लेकर चर्चा भी शुरू हुई। जानने कि कोशिश करते हैं कि पहाड़ में 11 दिन बाद बग्वाल के रुप में मनाई जाने वाला पर्व इगास क्यों मनाया जाता है।

सीएम ने गढ़वाली में लिखा खास संदेश

सीएम ने गढ़वाली में लिखा खास संदेश

दीपावली के 11 दिन बाद मनाए जाने वाले इगास पर्व पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सार्वजनिक अवकाश की घोषणा की है। सीएम धामी ने ट्वीट पर इसकी जानकारी दी। सीएम ने अपने खास अंदाज में लिखा है कि , उत्तराखण्ड की समृद्ध लोकसंस्कृति कु प्रतीक लोकपर्व 'इगास' पर अब छुट्टी रालि। हमारू उद्देश्य च कि हम सब्बि ये त्यौहार तै बड़ा धूमधाम सै मनौ, अर हमारि नई पीढी भी हमारा पारंपरिक त्यौहारों से जुणि रौ। अपने स्थानीय भाषा में लिखे संदेश में सीएम का कहना है कि इगास पर्व जो कि हमारी लोक संस्कृति का प्रतीक है, पर छुट्टी रहेगी। हमारा उद्देश्य है कि हम सभी इस पर्व को धूमधाम से मनाएं, और हमारी पारंपरिक त्यौहार हमेशा जीवित रहे। सीएम पुष्कर सिंह धामी के इस फैसले से चुनावी साल में नई बहस शुरू हो गई है। स्थानीय लोगों ने अब इगास की हर साल छुट्टी करने की मांग की है। आम आदमी पार्टी और कांग्रेस ने भी इगास को धूमधाम से मनाने की बात की है। इधर पूर्व सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत एक बार फिर अपने बयानों से चर्चा में है। मीडिया से बातचीत में त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कहा कि जब छठ पर्व की छुट्टी हो सकती है तो इगास की कोई बड़ी बात नहीं है। पूर्व सीएम का यह बयान सोशल मीडिया में जमकर वायरल हो रहा है।

भैलो खेलने का है रिवाज

भैलो खेलने का है रिवाज

देवभूमि में इस दौरान भैलो खेलने का रिवाज है जोकि खुशियों को एक दूसरे के साथ बांटने का माध्यम है। इस दिन रक्षा बंधन पर हाथ पर बंधे रक्षासूत्र को बछड़े की पूंछ पर बांधकर मन्नत पूरी होने के लिए आशीर्वाद मांगा जाता है। इसमें आतिशबाजी करने के बजाय लोग रात के समय पारंपरिक भैलो खेलते हैं। भैलो रस्सी से तैयार होता है। जिसमें आग लगाकर उजाला किया जाता है। इस रस्सी को आग लगने के बाद गोल-गोल घुमाकर नृत्य किया जाता है।

क्या है मान्यता

क्या है मान्यता

पहाड़ में मान्यता है कि पौराणिक मान्यताओं के अनुसार श्रीराम के वनवास से अयोध्या लौटने पर लोगों ने कार्तिक कृष्ण अमावस्या को दीये जलाकर उनका स्वागत किया था। लेकिन, गढ़वाल क्षेत्र में राम के लौटने की सूचना दीपावली के ग्यारह दिन बाद कार्तिक शुक्ल एकादशी को मिली। इसीलिए ग्रामीणों ने खुशी जाहिर करते हुए एकादशी को दीपावली का उत्सव मनाया। दूसरी मान्यता के अनुसार दीपावली के समय गढ़वाल के वीर माधो सिंह भंडारी के नेतृत्व में गढ़वाल की सेना ने दापाघाट, तिब्बत का युद्ध जीतकर विजय प्राप्त की थी। दीपावली के ठीक ग्यारहवें दिन गढ़वाल सेना अपने घर पहुंची थी। युद्ध जीतने और सैनिकों के घर पहुंचने की खुशी में उस समय दीपावली मनाई थी। एकादशी के दिन होने के कारण इगास कही गई। पहाड़ की लोकसंस्कृति से जुड़े इगास पर्व के दिन घरों की साफ-सफाई के बाद मीठे पकवान बनाए जाते हैं और देवी-देवताओं की पूजा की जाती है। साथ ही गाय व बैलों की पूजा की जाती है। शाम के वक्त गांव के किसी खाली खेत, खलिहान में नृत्य के भैलो खेला जाता है। भैलो एक प्रकार की मशाल होती है, जिसे नृत्य के दौरान घुमाया जाता है।

संस्कृति और परंपरा को बचाने में जुटे हैं लोग

संस्कृति और परंपरा को बचाने में जुटे हैं लोग

उत्तराखंड की संस्कृति और परंपरा को बचाने में जुटे वरिष्ठ पत्रकार, मनोज इष्टवाल ने बताया ​है कि 2016 में उन्होंने गढ़भोज के लक्ष्मण सिंह रावत और गजेन्द्र रमोला के सहयोग के आयोजन से हरिद्वार बाइपास स्थित सरस्वती बिहार के पास आयोजन कराया था। इसके बाद 2017 में परेड ग्रांउड में भाजपा नेता अनिल बलूनी के आह्रवान पर आयोजित हुआ था। 2019 में सांसद अनिल बलूनी ने अपने पैतृक गांव में इगास मनाने का ऐलान किया। लेकिन अस्वस्थ होने के कारण भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने इगास गांव में मनाकर अपनी दोस्ती और परंपरा को जिंदा रखने की कोशिश की। मनोज ने बताया कि देहरादून में हर साल लोग बढ़-चढ़कर इगास में हिस्सा ले रहे हैं। इस साल भी बड़े स्तर पर कार्यक्रम का आयोजन होगा।

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