हरक सिंह रावत को बाहर का रास्ता दिखाकर भाजपा ने एक तीर से साधे कई निशाने, जानिए पर्दे के पीछे की पूरी कहानी

प्रेशर पॉलिटिक्स के जरिए अपनी बात मनवाने में जुटे थे हरक सिंह

देहरादून, 17 दिसंबर। उत्तराखंड में कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत को पार्टी से बाहर कर भाजपा ने एक साथ कई समीकरण साधने की कोशिश की है। हरक सिं​ह लंबे समय से पार्टी के अंदर प्रेशर पॉलिटिक्स कर रहे थे, जिसको हाईकमान ने कड़ा संदेश दिया है। इसके साथ ही भाजपा ने साफ कर दिया कि पार्टी के अंदर परिवारवाद के लिए कोई जगह नहीं है। ये बात अलग है कि हरक सिंह के भाजपा से जाने के बाद चुनाव में कितना नुकसान पार्टी को होता है। ये चुनाव परिणाम आने के बाद ही साफ हो पाएगा।

मंत्रिमंडल में भारीभरकम विभाग नहीं मिलने से हुए थे नाराज

मंत्रिमंडल में भारीभरकम विभाग नहीं मिलने से हुए थे नाराज

2017 विधानसभा चुनाव से ठीक पहले हरक सिंह रावत अपने बा​गी विधायकों के साथ कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए थे। तब भाजपा ने उन्हें कोटद्वार सीट से विधायक का टिकट दिया। इससे पहले वे रुद्रप्रयाग सीट से विधायक थे। चुनाव जीतने के बाद उन्हें भाजपा की त्रिवेंद्र सरकार में वन एवं पर्यावरण मंत्रालय मिला। जिसको लेकर हरक सिंह कई बार नाराजगी दर्ज कराते रहे। 5 साल के कार्यकाल में हरक सिंह कई बार वे खुलकर विरोध करते हुए नजर आए। त्रिवेंद्र सिंह रावत को कुर्सी से हटाने में भी हरक सिंह का अहम रोल माना जाता है। त्रिवेंद्र के साथ कर्मकार बोर्ड को लेकर दोनों के बीच जमकर खींचतान होती रही। पुष्कर सिंह धामी के सीएम बनने के बाद भी वे नाराज हो गए थे। खुद से जूनियर नेता के सीएम बनने की बात कहते हुए वे हाईकमान से अपनी नाराजगी जता चुके थे। हालांकि इस नाराजगी का ज्यादा असर नहीं हुआ लेकिन पुष्कर सिंह धामी की सरकार में उन्हें भारी भरकम ऊर्जा विभाग मिल गया।

चुनाव की आहट होते ही प्रेशर पॉलिटिक्स की शुरू

चुनाव की आहट होते ही प्रेशर पॉलिटिक्स की शुरू

जैसे ही चुनाव की आहट हुई। हरक सिंह के कांग्रेस में जाने की सुगबुगाहट शुरू हो गई। कभी प्रीतम सिंह के मुलाकात की खबरें, कभी खुलकर कांग्रेस के पक्ष में अपनी बात रखना। इस तरह हरक सिंह ने भाजपा को इस बात के संकेत दे दिए,कि वे कभी भी पाला बदल सकते हैं। इसके बाद हरक सिंह ने कैबिनेट बैठक में कोटद्वार मेडिकल कॉलेज की मांग पूरी न होने पर बैठक के बीच में ही इस्तीफा सौंपने की धमकी देकर अपनी नाराजगी दर्ज कराई। इस घटना ने भाजपा को कई जगह असहज कर दिया। लेकिन अगले दिन मुख्यमंत्री धामी के साथ डिनर कर मेडिकल कॉलेज के लिए 25 करोड़ रुपए स्वीकृत कराकर भाजपा को आशीर्वाद भी देते हुए नजर आए। इस बीच टिकटों के बंटवारे की प्रक्रिया शुरू होते ही वे कोटद्वार से चुनाव न लड़ने और दूसरे विकल्प डोईवाला, केदारनाथ सीट तलाशने के साथ ही अपनी बहू अनुकृति गुंसाई के लिए लैंसडाउन सीट से प्रत्याशी बनाए जाने की मांग करने लगे। जिसके बाद पार्टी में बगावत होती नजर आने लगी। लैंसडाउन से विधायक दिलीप रावत खुलकर हरक सिंह के विरोध में आ गए। इसके बाद भाजपा कोर ग्रुप की बैठक देहरादून में हुई, लेकिन हरक सिंह नहीं पहुंचे। इसके बाद हरक सिंह के दिल्ली जाने की खबरें सामने आने लगी। लेकिन दिल्ली पहुंचने से पहले हरक सिंह के भाजपा और मंत्रिमंडल से बर्खास्त करने का आदेश जारी हो गया। इसके बाद हरक सिंह मीडिया में सामने आकर कांग्रेस की सरकार बनाने का दावा करते नजर आए।

परिवारवाद को लेकर कड़ा संदेश

परिवारवाद को लेकर कड़ा संदेश

भाजपा ने हरक सिंह रावत प्रकरण से एक साथ कई संदेश देने की कोशिश की। जब भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह देहरादून या उत्तराखंड दौरे पर रहे। हरक सिंह की हनक के बारे में जरुर बात करते हुए नजर आए। हाईकमान 5 साल तक हरक की हनक को लेकर काफी असहज महसूस करती नजर आई। लेकिन जब पार्टी को इससे नुकसान होता हुआ दिखने लगा तो हरक सिंह को बाहर का रास्ता दिखा दिया। हरक सिंह ने खुद के लिए केदारनाथ या डोईवाला सीट मांगी, ज​हां उनका विरोध होने लगा था। अगर हरक इन सीटों से चुनाव लड़ते तो पार्टी के अंदर विद्रोह या बगावत होने का डर था। इससे भी ज्यादा खतरा लैंसडाउन सीट पर था, जहां वे अपनी बहू अनुकृ​ति गुंसाई के लिए टिकट मांग रहे थे। इस सीट पर सिटिंग विधायक का टिकट काट भाजपा के अंदर एक बड़ा गुट विरोध में आ गया था। ​जिसका नेतृत्व दिलीप रावत कर रहे थे। इतना ही नहीं हरक की इस मांग को पूरा करने के बाद भाजपा में परिवारवाद को लेकर एक नई बहस शुरू होने का भी डर था। दिलीप रावत का आरोप था कि अनुकृति गुंसाई तो भाजपा की प्राथमिक सदस्य ही नहीं है तो टिकट की दावेदार कैसे हो सकती हैं। इस तरह भाजपा ने हरक को बाहर कर एक साथ कई समीकरण साध लिए हैं।

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