यूपी में राजभर के साइकल पर सवार होने से क्या भाजपा पर होगा बुरा असर?
लखनऊ, 20 अक्टूबर: समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में छोटे दलों के साथ गठबंधन शुरू करके अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले पहली बार सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के सामने बड़ी राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है। उसने उस सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के साथ गठबंधन किया है, जिसे 2014 और 2017 के चुनावों में यूपी में भाजपा की बड़ी जीत का एक बड़ा किरदार माना जाता है। वैसे सुभासपा सुप्रीमो ओम प्रकाश राजभर ने पहली बार भाजपा को टेंशन में नहीं डाला है। उन्होंने पिछले लोकसभा चुनावों में भी कई सीटों पर उसके लिए मुश्किलें खड़ी करने की कोशिशें की थीं। लेकिन, इस बार की कहानी अलग है। उन्होंने बीजेपी की सबसे बड़ी प्रतिद्वंद्वी पार्टी से हाथ मिलाया है।

यूपी की राजनीति के सबसे अप्रत्याशित चेहरे बन चुके हैं राजभर
सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के नेता ओम प्रकाश राजभर उत्तर प्रदेश की राजनीति के सबसे अप्रत्याशित चेहरे बनकर उभरे हैं। उन्होंने 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव के लिए हैदराबाद के सांसद और एआईएमआईएम के नेता असदुद्दीन ओवैसी की अगुवाई में 10 पार्टियों के गठबंधन वाला भागीदारी संकल्प मोर्चा बनाया था और रैलियां भी करने लगे थे। जबकि, 2017 के विधानसभा में उनका भाजपा के साथ गठबंधन था और मौजूदा योगी आदित्यनाथ सरकार में बर्खास्तगी से पहले तक वे मंत्री पद पर भी काबिज थे। चंद रोज पहले तक उनकी एक बार फिर से भाजपा नेताओं के साथ चर्चा की सुगबुगाहट सुनाई पड़ने लग थी और बुधवार को अचानक सपा की साइकिल पर सवार हो गए। ये वही राजभर हैं, जिन्होंने योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री
रहते हुए 2019 के लोकसभा चुनावों के दौरान बसपा सुप्रीमो मायावती को अगला पीएम बनने की भविष्यवाणियां कर रहे थे और दावा करते थे कि प्रदेश में एनडीए मुश्किल से 15 से 20 सीटें ही ला पाएगी। अब पूर्व सीएम अखिलेश यादव के साथ मुलाकात के बाद उनकी नई लाइन है- "अबकी बार, भाजपा साफ! समाजवादी पार्टी और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी मिलकर आए साथ। दलितों, पिछड़ों अल्पसंख्यकों के साथ सभी वर्गों को धोखा देने वाली भाजपा सरकार के दिन हैं बचे चार।....."(पहली तस्वीर-अखिलेश यादव के ट्विटर से )
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यूपी में कितनी बड़ी ताकत हैं राजभर ?
यह बात सही है कि 2014 के लोकसभा चुनाव से लेकर 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव तक उत्तर प्रदेश में सुभासपा को भाजपा की बड़ी जीत का एक अहम किरदार माना गया। क्योंकि, पूर्वांचल में राजभार समाज निश्चित रूप से एक बड़ा वोट बैंक है। 2012 के विधानसभा चुनाव में यह पार्टी पहली बार चुनाव लड़ी थी और 52 सीटों पर अपने उम्मीदवार दिए थे। उसे सीट तो एक भी नहीं मिली, लेकिन उसने 5.6% वोट लाकर भाजपा के रणनीतिकारों का ध्यान जरूर खींच लिया था। गाजीपुर की जहूराबाद पर खुद राजभर तो 49,600 वोट ले आए थे। इसी तरह गाजीपुर की बाकी सीटों के अलावा आजमगढ़, वाराणसी और बलिया की कई सीटों पर इसके उम्मीदवारों को अच्छे-खासे वोट मिले थे। भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में इसके साथ समझौता किया और 2017 में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी को चुनाव लड़ने के लिए 8 सीटें दीं। ओम प्रकाश राजभर की पार्टी का स्ट्राइक रेट 50% रहा और वह न सिर्फ 4 सीटें जीत गई, बल्कि उसने कुल 34.14% वोट भी जुटा लिए। सीएम योगी ने इसलिए उन्हें अपनी कैबिनेट में जगह भी दी थी।

पिछले चुनाव में सुभासपा का कैसा था प्रदर्शन ?
एक आंकड़े पर गौर करें तो राजभर समाज उत्तर प्रदेश में पूर्वांचल समेत करीब 15 जिलों में अच्छी तादाद में है। यानी जिन इलाकों में सुभासपा का प्रभाव है, वहां समाजवादी पार्टी के साथ उसका गठबंधन निश्चित तौर पर बीजेपी के लिए परेशानी का सबब बन सकता है, क्योंकि इससे सपा की स्थिति उन सीटों पर मजबूत हो सकती है। पिछले चुनावों का रिकॉर्ड देखने से लगता है कि राजभर की पार्टी भले ही खुद चुनाव जीतने का माद्दा ना रखती हो, लेकिन चुनावी खेला करने का दम जरूर रखती है। हालांकि, 2019 के लोकसभा चुनाव में सुभासपा बीजेपी के लिए ज्यादा चुनौती नहीं खड़ी कर पाई थी। मसलन, वाराणसी में इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ सिर्फ 8,892 वोट मिले तो गोरखपुर में भाजपा प्रत्याशी के खिलाफ यह सिर्फ 4,319 वोट ही जुटा सकी। वैसे कुछ दिन पहले जब राजभर अखिलेश यादव की साइकिल की सवारी करने के चक्कर में पड़े हुए थे तो उन्होंने दावा किया था,'अगर सपा सुभासपा के साथ गठबंधन करती है तो मऊ, बलिया, गाजीपुर, आजमगढ़, जौनपुर, अंबेडकर नगर और बाकी जिलों में बीजेपी एक भी सीट नहीं ले पाएगी। सिर्फ वाराणसी की दो सीटों पर (भाजपा के साथ) बड़ी लड़ाई होगी।'

भाजपा के पास राजभर की काट क्या है ?
ओम प्रकाश राजभर खुद को अपनी जाति का एकमात्र नेता समझते हैं। लेकिन, भाजपा ने भी उनकी काट खोजने की कोशिश की है। पार्टी के पास मंत्री अनिल राजभर, राज्यसभा सांसद सकलदीप राजभर और पूर्व सांसद हरिनारायण राजभर जैसे चेहरे हैं, जिनके जरिए वह सुभासपा की रणनीति को धूल चटाने की कोशिश जरूर करेगी। कहा जा रहा है कि पार्टी माया सरकार में मंत्री रह चुके रामअचल राजभर को भी सेट करना चाहती है। यही नहीं पार्टी ने बहराइच में सुहेलदेव का स्मारक बनाकर भी इस समाज में अपनी पैठ बनाने की कोशिश की है। इसलिए, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी का गठबंधन भाजपा को नुकसान करेगा या वह इसका कोई और तोड़ निकाल लेगी अभी से यह तय कर पाना बहुत ही मुश्किल है। क्योंकि, राजनीति के किस धुरंधर ने सोचा था कि दशकों बाद यूपी में सपा और बसपा गठबंधन के बावजूद भाजपा को रोक पाना असंभव हो जाएगा!












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