क्या सीटों की गणित में उलझेगा जयंत चौधरी-अखिलेश यादव का गठबंधन, जानिए ये बातें किस ओर कर रही इशारा

लखनऊ, 10 जनवरी: उत्तर प्रदेश के चुनावी घमासान में समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोक दल के बीच अंदरूनी मतभेद की खबर ने एक नया मोड़ दे दिया है। दरअसल जयंत 23 दिसंबर को सपा प्रमुख अखिलेश यादव के साथ होने वाली संयुक्त रैली के बाद से ही चुनावी लड़ाई से गायब हैं। इसके बाद यह सवाल उठ रहे हैं कि क्या अखिलेश और जयंत के बीच सीट बंटवारे को लेकर एक आम सहमति नहीं बन पा रही है? तो सवाल यह है कि क्या गठबंधन में सबकुछ ठीक है? क्या इस नए मोड़ से समाजवादी पार्टी को फायदा होगा या नुकसान? दरअसल इसी पेंच को सुलाने के लिए अखिलेश यादव सोमवार को दिल्ली में जयंत चौधरी से मुलाकात कर सीटों के स्वरूप को अंतिम रूप देने का प्रयास करेंगे।

जयंत चौधरी

23 दिसंबर को अलीगढ़ में अखिलेश यादव और जयंत चौधरी की रैली ने संकेत दिया कि बीजेपी को पश्चिमी यूपी में अखिलेश से कड़ी टक्कर मिल सकती है। इसके बाद उम्मीद की जा रही थी कि अब अखिलेश और जयंत की यह जोड़ी आने वाले दिनों में देखने को मिलेगी, लेकिन 23 दिसंबर के बाद जयंत चौधरी गायब हो गए, जिसके बाद पता चला कि सीटों के बंटवारे को लेकर गठबंधन में गठजोड़ है।

माना जा रहा था है कि अखिलेश अभी 28 से ज्यादा सीटों के लिए तैयार नहीं हैं। हालांकि गठबंधन में मनमुटाव की खबर आते ही अखिलेश सक्रिय मोड में आ गए और दरार भरने लगे, जिसके बाद जयंत चौधरी की ओर से कहा गया है कि आगरा की रैली में सब कुछ ठीक हो जाएगा। दरअसल, सपा और रालोद गठबंधन में सीट के साथ-साथ रस्साकशी का वर्चस्व भी है।

अखिलेश यादव

पश्चिमी यूपी में सपा को फायदा या नुकसान?

अगर समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोक दल के बीच सब कुछ ठीक रहा तो यहां का सपा गठबंधन बीजेपी को कड़ी टक्कर दे सकता है। हालांकि ताजा सर्वे में पश्चिमी यूपी की 136 सीटों में से 40 फीसदी वोट बीजेपी गठबंधन के पक्ष में जाते दिख रहे हैं, जबकि सपा गठबंधन को 33 फीसदी वोट मिल सकते हैं। वहीं, बसपा को 15 फीसदी, कांग्रेस को सात फीसदी और अन्य को पांच फीसदी वोट मिलने की संभावना है।

कृषि कानूनों को लेकर भाजपा पहले ही जाटों को नाराज कर चुकी है। ऐसे में जाटों की इस नाराजगी का बीजेपी से सपा-रालोद गठबंधन फायदा उठा सकता है। हालांकि बीजेपी ने इस कानून को वापस लेकर चुनाव में नया दांव खेला है, लेकिन चुनाव विशेषज्ञों का मानना ​​है कि अब बीजेपी के लिए बहुत देर हो चुकी है। दूसरा पहलू यह है कि पश्चिमी यूपी में यादव वोट मुस्लिम और जाट वोटों से काफी कम हैं। रालोद की पैठ पहले से ही जाटों में है, जिससे अखिलेश को फायदा होना तय है।

साफ है कि अगर रालोद और समाजवादी पार्टी के बीच सीटों की बात नहीं हुई तो पश्चिमी यूपी में अखिलेश को परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। जयंत चौधरी के साथ रहना और उनकी मांगों को स्वीकार करना अखिलेश की बड़ी मजबूरी है। गठबंधन टूटने से बीजेपी को ही फायदा होगा। ऐसे में दोनों पार्टियां इस सुनहरे मौके को हाथ से जाने नहीं देना चाहेंगी।

जयंत

मतभेदों को हल्का करने के प्रयास में जयंत-अखिलेश

वहीं दूसरी ओर सपा ने कहा कि नेताओं के बीच एक और बातचीत के बाद सीट बंटवारे के फार्मूले को अंतिम रूप दिया जाएगा। हाल ही में अखिलेश-जयंत की मुलाकात के बाद अखिलेश यादव ने ट्विटर पर मुलाकात की तस्वीरें साझा कीं। यादव ने लिखा, "श्री जयंत चौधरी से यूपी के भविष्य के बारे में बातचीत।" इसी तरह, चौधरी ने ट्वीट किया, "उत्तर प्रदेश के विकास के लिए हमारे संबंधों को मजबूत किया!"

हालांकि अंतिम सीट सौदे के बारे में बोलते हुए, सपा प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने कहा, "बैठक सीट बंटवारे पर बात करने के लिए थी। दोनों नेताओं के बीच एक और दौर की बैठक होगी और उसके बाद हम सीट बंटवारे के फॉर्मूले की घोषणा करेंगे। रालोद ने 2019 का लोकसभा चुनाव सपा और बसपा के "महागठबंधन" के हिस्से के रूप में लड़ा था। रालोद को तीनों सीटों-बागपत, मथुरा और मुजफ्फरनगर में हार का सामना करना पड़ा था।

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