Lok Sabha Election: देवरिया के टिकट फाइनल में कहां फंसा पेंच? क्या पिछली गलती नहीं दोहराना चाहती भाजपा
UP Deoria Lok Sabha Seat: उत्तर प्रदेश में 7 चरणों के तहत लोकसभा चुनाव के लिए मतदान होगा। 19 अप्रैल को फर्स्ट फेज की वोटिंग होगी। हालांकि ज्यादा सीटों पर उम्मीदवारों का ऐलान कर चुकी बीजेपी का अभी 12 सीटों पर प्रत्याशियों को लेकर मंथन चल रहा है।
जिन 12 सीटों पर उम्मीदवार के ऐलान का इंतजार है, उनमें से एक सीट देवरिया लोकसभा भी है, ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर क्यों देवरिया सीट पर भाजपा अपना प्रत्याशी उतारने में देरी कर रही है।

यूपी की देवरिया सीट भी उन सीटों में शामिल हैं, जहां पार्टी असमंजस की स्थिति में है। देवरिया से कांग्रेस ने जहां पार्टी प्रवक्ता अखिलेश प्रताप सिंह को टिकट दिया है। वहीं भाजपा की ओर से पत्ते खुलने का इंतजार है। लगातार दो बार से 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने यहां कब्जा जमाया है, लेकिन इस बार प्रत्याशी के ऐलान में देरी की वजह स्थानीय और बाहरी के मुद्दे का हावी होना बताया जा रहा है।
चुनावों से 'बाहरी' बना मुद्दा
दरअसल, पिछले दो चुनावों की बात करें तो साल 2014 में मोदी लहर में भाजपा ने यहां से पार्टी के कद्दावर नेता कलराज मिश्र को उम्मीदवार बनाया, हालांकि मिश्र पार्टी के बड़े नेताओं में शुमार हैं, लेकिन देवरिया से उनका प्रत्याशी घोषित होना यहां के लिए आश्चर्यचकित करने वाला था। जब मुद्दा बाहरी का उठा तो कलराज मिश्र ने यहां तक अपनी सफाई में कहा कि उनके पुरखे देवरिया के प्यासी रहने वाले ही थे।
हालांकि मोदी लहर होने के चलते इन मुद्दों का ज्यादा खास फर्क नहीं पड़ा और कलराज मिश्र जीत गए। इसके बाद वो केंद्र सरकार में मंत्री भी बने और देवरिया में कई विकास कार्य भी हुए।
इसके बाद 2019 के चुनाव में बीजेपी ने रमापति राम त्रिपाठी को टिकट दिया। रमापति राम त्रिपाठी बीजेपी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रहे, लेकिन वह भी देवरिया में सियासी तौर पर सक्रिय नहीं थे। उस समय भी कार्यकताओं में यह सवाल उठा कि भाजपा ने एक बार फिर इस सीट पर किसी स्थानीय नेता को उम्मीदवार न बनाकर बाहरी व्यक्ति को प्रत्याशी बना दिया। हालांकि फिर भी जनता ने उनको सांसद बनाकर संसद पहुंचा दिया।
एक बार फिर हावी ये मुद्दा
अब जब 2024 का लोकसभा चुनाव आया है, तो एक बार फिर बाहरी और स्थानीय उम्मीदवार का मुद्दा बड़ा होता नजर आ रहा है। लोग मौजूदा सांसद से नाखुश हैं। वहीं बीजेपी के स्थानीय लोग नहीं चाहते हैं कि रमापति राम त्रिपाठी को फिर से टिकट मिले। देवरिया बीजेपी के लोग अपने बीच से ही किसी नेता को प्रत्याशी को चाहते हैं।
इतना ही नहीं चर्चा यह भी है कि अगर पार्टी ने इस बार भी अगर रामापति राम त्रिपाठी पर भरोसा जताया तो यह पार्टी के हित में नहीं होगा। भाजपा कार्यकर्ता हर हाल में स्थानीय उम्मीदवार चाहते हैं।
इस नेता के चुनाव लड़ने की चर्चा
वहीं दावेदारी की बात करें तो यूपी सरकार में मंत्री सूर्य प्रताप शाही के यहां चुनाव लड़ने की चर्चाओं ने जोर पकड़ा हुआ है। हालांकि उनके नाम पर संशय बरकरार है। और उसका कारण उनकी सियासी जमीन को बहुत मजबूत नहीं होना माना जा रहा। हालांकि अब सवाल यह है कि क्या पार्टी स्थानीय लोगों के मन की सुनेगी या फिर एक बार फिर बाहरी और स्थानीय की आवाज 'मुद्दा' बनकर रह जाएगी।
आपको बता दें कि देवरिया लोकसभा क्षेत्र में 5 विधानसभा सीटें आते हैं, और यह सीट ब्राह्मण बाहुल्य हैं। ऐसे में यहां जातिगत समीकरण बहुत मायने रखता है। मालूम हो कि देवरिया में 7वें चरण के अंतर्गत एक जून को मतदान होगा।












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