सांसद होने के बाद भी सपा ने आजम खां को विधानसभा चुनाव में क्यों उतारा ?
लखनऊ, 26 जनवरी। आजम खां सांसद हैं फिर सपा ने उन्हें विधानसभा चुनाव में क्यों उतार दिया ? क्या रामपुर विधानसभा सीट पर सपा को कोई दूसरा जिताऊ उम्मीदवार नहीं मिला ? अगर कोई सांसद विधानसभा चुनाव हार जाए तो सपा की साख का क्या होगा ? ये सही है कि रामपुर में आजम खां को हराना नामुमकिन जैसा है। लेकिन कभी-कभी नामुमकिन भी मुमकिन होता है। जैसे 1996 में आजम खां रामपुर में विधानसभा का चुनाव हार गये थे। उन्हें कांग्रेस के अफरोज अली खां ने हराया था।

इस बार उनके सामने कांग्रेस के ही काजिम अली खान हैं। वे रामपुर के नवाब खानदान से ताल्लुक रखते हैं। बगल की स्वार सीट से चार बार विधायक भी रह चुके हैं। रामपुर के नवाब खानदान का आज भी जनता में रसूख है। कांग्रेस के अलावा भाजपा से भी आजम खान को यहां चुनौती मिल रही है। भाजपा ने यहां से पूर्व विधायक शिवबहादुर सक्सेना के पुत्र आकाश सक्सेना को मैदान में उतारा है। सबसे बड़ी बात ये कि आजम खां को यह चुनाव जेल के अंदर से लड़ना है।

सांसद आजम खां को विधायक चुनाव में टिकट क्यों ?
सांसद आजम खां फरवरी 2020 से जेल में बंद हैं। पहली बार सपा को उनके बगैर चुनावी मैदान में उतरना पड़ा है। वे सपा का सबसे बड़ा मुस्लिम चेहरा हैं। उनकी कमी सपा के शिद्दत से महसूस हो रही है। माना जाता है कि उत्तर प्रदेश की करीब 20 फीसदी मुस्लिम आबादी राज्य की 107 विधानसभा सीटों पर हार जीत तय करती है। अखिलेश यादव ने सांसद आजम खान को विधानसभा का टिकट देकर भाजपा के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश की है। इस दांव से यह जताने की कोशिश की गयी है कि भाजपा सरकार आजम खां के खिलाफ बदले की कार्रवाई कर रही है। भाजपा ने उन्हें राजनीतिक अदावत में जेल भेजा है। आजम खां के जेल में रहने की बात को अखिलेश भवनात्मक मुद्दा बनाना चाहते हैं ताकि वे मुस्लिम समुदाय की सहानुभूति बटोर सकें। अखिलेश यह भी दिखाना चाहते हैं कि अगर सपा को बहुमत मिला तो आजम खां को बड़ी भूमिका मिलने वाली है। इसलिए उन्हें पहले से विधायक बनाने की तैयारी है। 2017 में आजम खां रामपुर से जीते थे। 2019 में उनके सांसद बनने के बाद इस सीट पर उपचुनाव हुआ था जिसमें उनकी पत्नी तजीन खां विजयी रहीं थीं। अखिलेश 2022 में भी तजीन खान को टिकट दे सकते थे। लेकिन उन्होंने दूर की कौड़ी खेली और सांसद आजम खां को विधायक के चुनाव में उतार दिया।

अखिलेश के लिए आजम खां कितने अहम ?
अखिलेश यादव ने मुस्लिम वोट को एकजुट करने के लिए पिछले साल मार्च में रामपुर से एक साइकिल यात्रा निकाली थी। रामपुर से यह यात्रा बरेली, शाहजहांपुर, लखीमपुर, सीतापुर होते हुए लखनऊ पहुंची थी। अखिलेश यादव ने इस यात्रा के जरिये गांव-गांव में आजम खां के खिलाफ भाजपा सरकार की कार्रवाई का मुद्दा उठाया था। जाहिर है अखिलेश शुरू से आजम खान को चुनावी राजनीति के केन्द्र में रखना चाहते थे। उनको टिकट देना इस कहानी का क्लाइमेक्स है। लेकिन आजम खान को चुनावी मैदान में उतारने का फैसला रिस्की हो सकता है। कुछ लोगों का कहना है कि जेल के अंदर रहने से आजम खां की ताकत अब पहले की तरह नहीं रह गयी है। उनकी गैरमौजूदगी से सपा को नुकसान हो सकता है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अब रामपुर में पहले वाली बात नहीं रह गयी है। आजम खां की लोकप्रियता में कमी आ रही है। 2019 का उपचुनाव इस बात का प्रमाण है।

आजम खां की लोकप्रियता में कमी
2019 में जब यहां उपचुनाव हुआ था तब आजम खां की पत्नी तजीन खान मुश्किल से जीत से पायीं थीं। उन्हें भाजपा के भारत भूषण ने कड़ी टक्कर दी थी। तजीन खां को 79043 वोट मिले थे जब कि भारत भूषण को 71327 वोट मिले थे। तजीन खां करीब आठ हजार वोट से ही जीत पायीं थीं। इस सीट पर भाजपा को 71 हजार वोट मिलना राजनीति के नये अध्याय की तरफ संकेत कर रहा है। इसी सीट पर आजम खां ने 2017 और 2012 में करीब 50 हजार वोट से जीत हासिल की थी। आजम खां और उनके बेटे अब्दुल्ला आजम पर भ्रष्टाचार और फर्जी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप है। फर्जी जन्म प्रमाण पत्र के जुर्म में अदालत ने अब्दुल्ला आजम की विधानसभा सदस्यता रद्द कर दी थी। वे स्वार सीट से सपा विधायक चुने गये थे। सुप्रीम कोर्ट ने चार महीना पहले उनकी विधायकी रद्द होने पर अपनी मुहर लगायी थी। आजम खां के खिलाफ चुनाव लड़ रहे भाजपा उम्मीदवार आकाश सक्सेना एक जुझारू नेता हैं। उनके पिता विधायक रहे हैं। इस क्षेत्र के लोगों को लगता है कि आकाश सक्सेना आजम खां से टक्कर लेने की हिम्मत दिखा सकते हैं। आकाश ने ही आजम खां और अब्दुल्ला आजम पर दो पैन कार्ड रखने का मुकदमा दर्ज कराया था। इन बातों से आजम खां की छवि धूमिल हुई है। अब ऐसे में अगर हवा का रुख बदल जाए तो अचरज की कोई बात नहीं।
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