BJP के लिए गेमचेंजर साबित होने वाले संगठन मंत्री सुनील बंसल की होगी UP से विदाई ?

लखनऊ, 23 अप्रैल: उत्तर प्रदेश में एक दशक पहले तक बीजेपी की स्थिति यह थी कि वह सत्ता का बनवास झेल रही थी। राम मंदिर आंदोलन के समय एक बार कल्याण सिंह की बदौलत यूपी में बीजेपी को सत्ता में आने का मौका मिला था। इसके बाद एक बार मायावती के सहयोग से कुछ दिन तक सरकार चलाई लेकिन उसके बाद सपा के नेता मुलायम सिंह यादव और बसपा की मुखिया मायावती के करिश्में के आगे बीजेपी की एक न चली और उसे लंबे समय तक सत्ता का बनवास झेलना पड़ा था। ऐसी विषम परिस्थितियों में 2012 के चुनावों के बाद और 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले यूपी बीजेपी में संगठन मंत्री सुनील बंसल की एंट्री हुई और उन्होंने पूरे यूपी की सियासी तस्वीर ही बदलकर रखी दी। उनके नेतृत्व में बीजेपी ने चार चुनावों में यूपी में बेहतरीन सफलता मिली थी। सूत्रों के मुताबिक बंसल ने शीर्ष नेतृत्व से प्रदेश छोड़ने की इच्छा जाहिर की है। हालांकि आलाकमान यह चाहता है कि वह 2024 के चुनाव तक यूपी में ही रुकें।

सुनील बंसल ने खुद जताई यूपी छोड़ने की इच्छा ?

सुनील बंसल ने खुद जताई यूपी छोड़ने की इच्छा ?

बीजेपी के सूत्रों की माने तो चुनाव से पहले ही इस तरह की खबरें सामने आ रहीं थीं कि चुनाव के बाद बंसल यूपी बीजेपी के संगठन मंत्री के दायित्व से मुक्त हो जाएंगे। हालांकि चुनाव के दौरान बीजेपी को पुर्णबहुमत की सरकार बनी है उसमें बंसल के योगदान को कम करके नहीं आंका जा सकता है। बंसल ही वह शख्स थे जिन्होंने यूपी में बीजेपी के लिए गेमचेंजर होने की भूमिका निभाई है। हालांक इस दौरान बंसल तो आठ सालों तक अपने पद पर कायम रहे लेकिन इस दौरान बीजेपी को कई प्रदेश अध्यक्ष मिले। इसमें लक्ष्मीकांत वाजेपयी, महेंद्र नाथ पांडेय, केशव प्रसाद मौर्य, स्वतंत्रदेव सिंह ने उनके साथ काम किया। इनमें से कुछ प्रदेश अध्यक्ष ऐसे भी थे जिनके साथ बंसल की ट्यूनिंग सही नहीं रही। लेकिन इन चुनौतियों के बीच बंसल ने अपने रणनीतिक कौशल का बखूबी परिचय दिया।

BJP के लिए बंसल का विकल्प ढूंढना आसान नहीं

BJP के लिए बंसल का विकल्प ढूंढना आसान नहीं

बीजेपी के लिए पिछले चार चुनावों से गेमचेंजर साबित होने वाले सुनील बंसल का विकल्प ढूंढना इतना आसान भी नहीं है। बीजेपी के कई नेताओं ने अंदरखाने बातचीत के दौरान यह स्वीकार किया कि बंसल की तरह संगठन मंत्री मिलना काफी कठिन है। हालांकि कुछ लोगों का यह भी कहना है कि बंसल अभी चाहकर भी यूपी को नहीं छोड़ पाएंगे। आलाकमान यह चाहता है कि 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव तक वह हर हाल में यूपी में रहें। क्योंकि यह चुनाव बीजेपी ओर मोदी दोनों के लिए काफी अहम है। इसलिए आलाकमान और संघ के शीर्ष नेतृत्व की मंशा के अनुरुप ही उनको चलना होगा।

बंसल के नेतृत्व में BJP ने जीते चार अहम चुनाव

बंसल के नेतृत्व में BJP ने जीते चार अहम चुनाव

महामंत्री संगठन सुनील बंसल भी अब भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश से विदाई ले सकते हैं. माना जा रहा है कि उनके लिए भी 30 अप्रैल तक की मियाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने तय कर दी है. इसके बाद भाजपा और संघ के बीच में पुल का काम करने वाला नया संगठन महामंत्री उत्तर प्रदेश को मिलेगा। महामंत्री संगठन सुनील बंसल को भी उत्तर प्रदेश में अब 8 साल का समय बीत चुका है। चार चुनाव उनके रहते भाजपा जीत चुकी है। दो लोकसभा चुनावों में पार्टी को ज्यादा सीटें दिलाने और यूपी में लगातार दो बार यूपी में बीजेपी की सरकार बनवाने में बंसल का अहम योगदान है।

30 अप्रैल तक हो सकती है सुनील बंसल की विदाई

30 अप्रैल तक हो सकती है सुनील बंसल की विदाई

इस बीच माना जा रहा है कि उनके दिल्ली के कई दौरे हो चुके हैं और 30 अप्रैल के बाद वह भी नई जिम्मेदारी संभाल सकते हैं. महामंत्री संगठन एक ऐसा पद होता है जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रत्येक भारतीय जनता पार्टी प्रदेश संगठन को दिया जाता है। महामंत्री संगठन पद पर रहने वाला संघ और संगठन के बीच सेतु का काम करता है और महत्वपूर्ण निर्णय उसकी मोहर के बिना स्वीकृत नहीं किए जाते हैं. ऐसे में सुनील बंसल ने पिछले तीन चुनावों में भाजपा की जीत में अहम भूमिका निभाई है और अब संघ और संगठन उनको और महत्वपूर्ण भूमिका में देखना चाहता है. इसलिए उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी संघ के किसी अन्य पदाधिकारी को दी जा सकती है।

यूपी बीजेपी ने PMO को भेजी है चुनावी रिपोर्ट

यूपी बीजेपी ने PMO को भेजी है चुनावी रिपोर्ट

दरअसल बीजेपी की तरफ से बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्‌डा और पीएम मोदी को यूपी में बीजेपी के चुनावी प्रदर्शन को लेकर एक रिपोर्ट भेजी गई थी। रिपोर्ट में बीजेपी ने इस बात का जिक्र किया है कि चुनाव के दौरान अपना दल और निषाद पार्टी के साथ गठबंधन करना पार्टी के लिए फायदेमंद साबित नहीं हुआ। बीजेपी की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इन छोटे दलों का वोट बीजेपी में ट्रांसफर नहीं हुआ जिसकी वजह से 2017 की तुलना में 2022 में बीजेपी को 57 सीटें कम मिलीं। यदि बीजेपी अपने दम पर चुनाव लड़ती तो वह 300 प्लस के अपने दावे को सच साबित कर सकती थी। बीजेपी के एक नेता नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं, " दरअसल बंसल जी ने इसकी भविष्यवाणी पहले ही कर दी थी। वह अपना दल और निषाद पार्टी के साथ गठबंधन के पक्ष में नहीं थे। नतीजे आने के बाद बंसल जी ने कहा था कि इधर उधर के चक्कर में 50 सीटों का नुकसान हो गया।"

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