पत्नी भाजपा में और पति कांग्रेस में, बढ़ गयी पंजाब- यूपी की चुनावी सरगर्मी
लखनऊ, 26 नवंबर। पति-पत्नी दोनों कांग्रेस के विधायक। पत्नी उत्तर प्रदेश से तो पति पंजाब से। दोनों रसूखदार राजनीतिक घराने से। लेकिन अब पत्नी के भाजपा में शामिल होने से दो राज्यों की कांग्रेसी राजनीति में हलचल है। इस उलट-पलट से न केवल कांग्रेस को बल्कि सोनिया गांधी को भी निजी तौर राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की उम्मीद बनी प्रियंका गांधी को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। इस पाला बदल से उनके विधायक पति की पंजाब में असहज स्थिति हो गयी है। वे पंजाब के चर्चित राजनीतिक घराने से हैं जिसकी वजह से कांग्रेस की चिंता बढ़ गयी है।

भाजपा की अदिति सिंह और कांग्रेस के अंगद सिंह
29 साल की अदिति सिंह 2017 में रायबरेली से कांग्रेस की विधायक चुनी गयीं थीं। 26 साल के अंगद सिंह पंजाब के नवांनगर से कांग्रेस विधायक बने थे। 2019 में दोनों की शादी हुई थी। अदिति सिंह रायबरेली के बाहुबली विधायक रहे अखिलेश की पुत्री हैं। अखिलेश सिंह रायबरेली के बेताज बादशाह थे। अदिति की शादी से कुछ महीने पहले ही उनका निधन हो गया था। वे रायबरेली से पांच बार विधायक रहे थे। उनकी ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वे सोनिया-प्रियंका के विरोध के बावजूद चुनाव जीतते रहे थे। 2017 में मोदी लहर के बावजूद उन्होंने बेटी अदिति को चुनावी जीत दिली दी थी। अब अदिति सिंह के भाजपा में जाने से रायबरेली का राजनीतिक परिदृश्य बदलने वाला है। अदिति ने अमेरिका के ड्यूक यूनिवर्सिटी से मैनेजमेंट की डिग्री हासिल की है। वे युवा हैं और उन्हें डायनेमिक लीडर माना जाता है। अब भाजपा अदिति सिंह को प्रियंका गांधी की काट के रूप में खड़ा कर रही है। दूसरी तरह अंगद सिंह पंजाब के चर्चित नेता दिलबाग सिंह के परिवार से आते हैं। दिलबाग सिंह नंवा शहर से छह बार कांग्रेस के विधायक बने थे। फिर 2002 में दिलबाग सिंह के भतीजा प्रकाश सिंह इस सीट से कांग्रेस के विधायक बने। अंगद सिंह इन्ही प्रकाश सिंह के पुत्र हैं जो अब नंवा शहर से कांग्रेस के विधायक हैं। यानी अंगद खानदानी कांग्रेसी हैं। लेकिन अब पत्नी के भाजपायी होने से अंगद की स्थिति कांग्रेस में असहज हो गयी है।

अंगद सिंह की चिंता
2017 के चुनाव में अंगद सिंह कांटे के मुकाबले में करीब सवा तीन हजार वोटों से जीते थे। शिरोमणि अकाली दल को करीब 34 हजार और आम आदमी पार्टी के करीब 32 हजार वोट मिले थे। यानी विरोधी दलों की भी यहां मजबूत स्थिति है। अगर अंगद सिंह को फिर टिकट मिलता है तो विरोधी दल अदिति सिंह का मुद्दा उठा सकते हैं। अगर अंगद सिंह की विश्वसनीयता सवालों के घेरे में आ गयी तो न केवल नवां शहर बल्कि इससे सटे बालाचौर विदानसभा सीट पर भी कांग्रेस को नुकसान उठाना पड़ सकता है। अंगद सिंह का परिवार पिछले कई दशक से नवां शहर की सीट कांग्रेस की झोली में डालता रहा है। लेकिन 2022 में उसके सामने असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो गयी है। अकाली दल और आप तो पहले से कांग्रेस को चुनौती दे रहे थे। अब कैप्टन अमरिंदर सिंह के रूप में उसे एक और बड़ी चुनौती से जूझना पड़ रहा है। ऐसे में अदिति सिंह के फैसले से अंगद सिंह और कांग्रेस को पंजाब में बार-बार सफाई देनी पड़ रही है।

अदिति सिंह के भाजापा में आने से यूपी में असर
2007 में कांग्रेस के केवल 7 विधायक जीते थे जिनमें अदिति सिंह भी एक थीं। उन्होंने अपने पिता अखिलेश सिंह के दम पर चुनाव जीता था। रायबरेली कोई मामूली सीट नहीं है। यह नेहरू-गांधी परिवार की पहचान और प्रतिष्ठा की सीट है। लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू भी है। इसी रायबरेली में बाहुबली अखिलेश सिंह ने अपनी पहचान बनायी। हत्या समेत कई गंभीर अपराधों के आरोपी अखिलेश सिंह की एक छवि रॉबिनहुड की भी थी। गरीबों और जरूरतमंदों की भी खूब मदद की। वर्ना केवल दबंगई के बल पर कोई रायबरेली से लगातार पांच बार चुनाव नहीं जीत सकता था। तीन बार कांग्रेस (1993,1998, 2003) से विधायक बने। 2003 में कांग्रेस ने अखिलेश सिंह को पार्टी से निकाल दिया। एक हत्याकांड में उन्हें आरोप बनाया गया ता। इसके बाद वे सोनिया गांधी के खिलाफ हो गये। सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी ने 2007 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश सिंह को हराने के लिए गांव-गांव घूम के वोट मांगा था। इंदिरा गांधी की बहू होने और रायबरेली की सांसद होने के बाद भी सोनिया अखिलेश सिंह को हरा नहीं पायी थीं। 2012 में उन्होंने सोनिया के विरोध के बावजूद फिर चुनाव जीता था। अखिलेश सिंह ने अपने दम पर रायबरेली की राजनीति संचालित की।

प्रियंका-सोनिया को चुनौती
2017 में जब अखिलेश सिंह और अदिति सिंह कांग्रेस में आये तो सोनिया गांधी ने राहत की सांस ली थी। लेकिन अब अदिति सिंह के भाजपा में जाने से कांग्रेस को और खास कर सोनिया गांधी को जोर का झटका लगा है। अदिति सिंह अगर 2022 में रायबरेली जीत लेती हैं तो 2024 में सोनिया गांधी की राह मुश्किल हो सकती है। 2019 में राहुल गांधी अमेठी हार चुके हैं। अगर रायबरेली सीट भी हाथ से निकल गयी तो उत्तर प्रदेश में नेहरू-गांधी परिवार का का अंतिम किला भी ढह जाएगा। रायबरेली जिले में विधानसभा की छह सीटें हैं। 2017 के चुनाव में छह में 3 सीटें भाजपा को, 2 सीट कांग्रेस को ओर एक सीट सपा को मिली थी। लेकिन अब अदिति सिंह ने इस जिले के राजनीतिक समीकरण को बदल दिया है। भाजपा में आते ही उन्होंने प्रियंका गांधी राजनीतिक हमला शुरू कर दिया है। उन्होंने प्रियंका गांधी के महिला कार्ड को बेअसर करने के लिए के संदीप सिंह का मुद्दा उछाल दिया है। संदीप सिंह प्रियंका गांधी के निजी सचिव हैं और उनके खिलाफ घर में ताकझांक करने की प्राथमिकी दर्ज है। अदिति सिंह ने अपने एक फैसले से उत्तर प्रदेश और पंजाब में राजनीतिक सरगर्मी बढ़ा दी है।












Click it and Unblock the Notifications