UP Chunav 2027: OP Rajbhar की सुभासपा का SP में विलय तय? बेटे Arun की Akhilesh Yadav से मुलाकात के क्या मायने?
Uttar Pradesh Vidhan Sabha Chunav 2027: उत्तर प्रदेश की सियासत इन दिनों गरमागरम है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले विपक्षी समाजवादी पार्टी (सपा) में कथित फूट की चर्चाएं जोर पकड़ रही हैं। एक तरफ भाजपा के सहयोगी और मंत्री ओम प्रकाश राजभर (सुभासपा प्रमुख) लगातार सपा पर हमले बोल रहे हैं और बड़े टूट का दावा कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ सपा ने पलटवार करते हुए राजभर के बेटे अरुण राजभर की अखिलेश यादव से मुलाकात का हवाला देकर विलय की बात छेड़ दी है।
यह पूरा मामला महज व्यक्तिगत बयानबाजी नहीं, बल्कि यूपी की पिछड़ी जातियों की राजनीति, गठबंधनों की अस्थिरता और 2027 की रणनीति का आईना है। आइए विस्तार से समझते हैं...

OP Rajbhar का दावा: सपा में बड़ी टूट तय
17 जून 2026 को ओम प्रकाश राजभर ने सोशल मीडिया और बयानों में सपा पर तीखा हमला बोला। उन्होंने दावा किया कि सपा के कई सांसद और नेता भाजपा के संपर्क में हैं। रामगोपाल यादव ने अमित शाह को पत्र सौंपा है, जिसमें टूटने वाले नेताओं की सूची है। खनन घोटाला और गोमती रिवर फ्रंट घोटाले की जांच से सपा पर दबाव बढ़ रहा है, जिससे पार्टी टूटने वाली है।
राजभर ने कहा कि महाराष्ट्र और बंगाल छोड़िए, पूरी सपा भाजपा में शामिल होने को तैयार बैठी है। उन्होंने ब्राह्मण सम्मेलन में बलिया के लाल (अपने समर्थकों) के अपमान का भी जिक्र किया और सपा सांसदों को बचाने के लिए अखिलेश को 'सांसद बचाओ अभियान' चलाने की सलाह दी। 18 जून को उन्होंने फिर ट्वीट कर टूट की पुष्टि की।
यह दावा संयोग नहीं। हाल में शिवसेना (UBT) और तृणमूल कांग्रेस (TMC) में फूट देखने के बाद भाजपा विपक्षी दलों में सेंध लगाने की रणनीति पर काम कर रही है। यूपी में भाजपा गठबंधन पहले से मजबूत है और 2022 के बाद राजभर सपा छोड़कर एनडीए में लौट आए थे।
सपा का पलटवार: अरुण राजभर ने विलय का निवेदन किया
सपा राष्ट्रीय प्रवक्ता फखरुल हसन चांद ने 17 जून को सोशल मीडिया पर बड़ा दावा किया। उनके अनुसार, ओपी राजभर के बेटे अरुण राजभर (सुभासपा मुख्य प्रवक्ता) ने कल रात अखिलेश यादव के आवास पर मुलाकात की और सुभासपा (SBSP) का सपा में विलय करने की अपील की। अरुण ने कहा कि पिताजी भाजपा के दबाव में हैं, उनकी बातों को गंभीरता से न लें। वे पिछड़ों की राजनीति बचाने के लिए व्याकुल हैं।
फखरुल हसन चांद ने स्पष्ट किया कि सपा राजभर के बयानों को गंभीरता से नहीं लेती। यह मुलाकात सपा के लिए राजभर की कमजोरी का संकेत है। अरुण राजभर ने बाद में सपा पर ब्राह्मण सम्मेलन वाले अपमान का मुद्दा उठाया, लेकिन विलय वाले दावे पर सुभासपा की तरफ से स्पष्ट इनकार या पुष्टि नहीं आई है।
सपा Vs सुभासपा-BJP: Shivpal बोले झूठी अफवाह, मंत्री बोले- कई सांसद संपर्क में
सपा नेता शिवपाल यादव ने राजभर को 'TRP बढ़ाने वाला' बताया। कहा कि भाजपा के लोग झूठ बोलते हैं। बीच-बीच में षड्यंत्र भी करते रहते हैं। समाजवादी पार्टी का कोई भी सांसद टूटेगा नहीं। ये लोग अपनी TRP बढ़ाने के लिए और चुनाव के समय सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए ये बोलते हैं। मुझे तो लगता है इन्हें ट्वीट करने का भी पैसा मिलता है इसलिए इस तरह की बातें करते हैं, झूठ बोलते हैं...अखिलेश यादव के नेतृत्व में 2027 में उत्तर प्रदेश में सरकार बनेगी...ओम प्रकाश राजभर को पूरे उत्तर प्रदेश में कोई सीरियस नहीं लेता है।
राज्य सरकार में मंत्री संजय निषाद (निषाद पार्टी) ने कहा कि सपा-कांग्रेस के कई सांसद-विधायक भाजपा से संपर्क में हैं क्योंकि सरकार के साथ रहकर ही विकास और सुरक्षा संभव है।
राजभर और सपा का रिश्ता समझें...
ओम प्रकाश राजभर सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP) के संस्थापक हैं, जो मुख्य रूप से राजभर (OBC) समुदाय पर आधारित है। 2022 विधानसभा चुनाव में SBSP ने सपा के साथ गठबंधन किया था और 19 सीटों पर लड़े, 6 जीते। लेकिन बाद में संबंध टूट गए और राजभर एनडीए में शामिल हो गए। वे योगी सरकार में मंत्री हैं।
राजभर अक्सर पिछड़ों-दलितों की राजनीति का दावा करते हैं और सपा पर यादव-मुस्लिम केंद्रित होने का आरोप लगाते हैं। PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले में सपा को चुनौती देते हैं। अतीत में उन्होंने सपा के साथ गठबंधन भी किया और अलग भी हुए।
अरुण राजभर ने सपा प्रवक्ता पर साधा निशाना
सुभासपा नेता अरुण राजभर ने समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता फखरुल हसन चांद के बयान पर तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि जो लोग पिछड़ों की राजनीति करने का दावा करते हैं, उन्हें हिंदी की सामान्य वर्तनी तक का ज्ञान नहीं है। राजभर ने आरोप लगाया कि सपा प्रवक्ता अपने बयान में 'पिछड़ों' और 'दबाव' जैसे शब्द भी सही नहीं लिख पाए।
उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि लगता है, सपा शासनकाल की नकल संस्कृति का असर अब भी कुछ नेताओं पर दिखाई देता है। राजभर ने अखिलेश यादव को सलाह देते हुए कहा कि अगर उनके प्रवक्ता को भाषा और लेखन की बुनियादी समझ नहीं है तो उन्हें किसी प्राथमिक विद्यालय में दाखिला दिला देना चाहिए, हां आज स्मार्ट क्लास और बेहतर शिक्षा व्यवस्था उपलब्ध है। उन्होंने कहा कि वर्तमान उत्तर प्रदेश में मेहनत और योग्यता के आधार पर ही सफलता मिलती है। पढ़ाई-लिखाई की कोई उम्र नहीं होती और मेहनत करने वाला व्यक्ति कभी भी सीख सकता है।
UP Vidhan Sabha Chunav 2027: अरुण राजभर-अखिलेश मुलाकात के मायने
- 1. रणनीतिक दबाव: सपा का दावा राजभर को डिफेंसिव पोजिशन में लाने की कोशिश लगता है। अगर अरुण मिले, तो यह SBSP के अंदर असंतोष या भाजपा से दूरी का संकेत हो सकता है। लेकिन यह सपा की 'काउंटर-नैरेटिव' भी हो सकती है।
- 2. पिछड़ों की राजनीति: राजभर समुदाय यूपी में महत्वपूर्ण है, खासकर पूर्वांचल में। विलय से सपा अपनी OBC पहुंच बढ़ा सकती है, लेकिन राजभर की स्वतंत्र पहचान और भाजपा मंत्रिपद छोड़ना मुश्किल है।
- 3. 2027 की तैयारी: चुनाव अभी एक साल दूर हैं। ऐसे दावे मनोबल गिराने, मीडिया स्पेस घेरने और गठबंधन की संभावनाएं तलाशने के लिए होते हैं। भाजपा के पास पहले से मजबूत गठबंधन है (257+ सीटें 2022 में)।
- 4. स्कैम और दबाव का मुद्दा: राजभर खनन और गोमती घोटाले का बार-बार जिक्र करते हैं। अगर जांच तेज हुई तो असंतोष बढ़ सकता है, लेकिन फिलहाल कोई ठोस सबूत या टूट सार्वजनिक नहीं हुई।
क्या विलय संभव है?
फिलहाल, विलय की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है। ओम प्रकाश राजभर और बेटे अरुण की तरफ से मुलाकात व विलय दोनों पर कोई बयान सामने नहीं आया है। मात्र सपा प्रवक्ता की बयानबाजी है। इसमें कितना दम है? इसपर कुछ भी कह पाना मुश्किल है। अभी सुभासपा भाजपा सरकार का हिस्सा है और सीटों की मांग (32 सीटें) कर रही है। अरुण की मुलाकात अगर हुई भी तो वह व्यक्तिगत या प्रोबिंग हो सकती है। राजनीति में ऐसे 'मुलाकात-दावे' आम हैं। कभी दबाव बनाने, कभी छवि सुधारने के लिए।
आगे क्या?
2027 में यूपी की लड़ाई PDA vs NDA की होगी। राजभर जैसे छोटे दलों की भूमिका निर्णायक रह सकती है। अगर सुभासपा सपा से जुड़ी तो विपक्ष मजबूत होगा, लेकिन फिलहाल यह संभावना कम लगती है। दोनों तरफ से बयानबाजी जारी रहेगी, राजभर आक्रामक रहेंगे, सपा उन्हें 'बीजेपी का चेहरा' बताएगी।
यह पूरा एपिसोड यूपी सियासत की अस्थिरता दिखाता है। छोटी पार्टियां बड़े खिलाड़ियों के बीच पिस रही हैं, लेकिन वोट बैंक की वजह से उनका महत्व बना हुआ है। 2027 तक कई और ऐसे 'मुलाकात-दावे' और 'टूट-विलय' की खबरें आएंगी। राजनीति का खेल जारी है, कौन किसके साथ, यह समय बताएगा।













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