यूपी चुनाव : टिकैत, मुनव्वर राना, लखीमपुर खीरी, कुछ भी काम न आया, कमल ही कमल छाया
लखनऊ, 11 मार्च। उत्तर प्रदेश के चुनावी नतीजे ने बड़े बड़े 'गुब्बारों' की हवा निकाल दी। चुनाव से पहले ये गुब्बारे हवा में ऊंचे उड़ रहे थे। लेकिन फुस्स होते ही ये जमीन पर आ गिरे।

किसान नेता राकेश टिकैत, शायर मुनव्वर राणा और लखीमपुर खीरी पर बवाल काटने वाली कांग्रेस, कटे हुए दरख्त की तरह धाराशायी हैं। कहां तो भाजपा को खत्म करने का दावा किया था। लेकिन खुद की साख ही खत्म हो गयी।

धरा का धरा रह गया टिकैत का भौकाल
किसान आंदोलन में राकेश टिकैत ने खूब चर्चा बटोरी थी। उनके आंसुओं ने मंद पड़ रहे किसान आंदोलन को और तेज कर दिया था। लेकिन बाद में वे राजनीतिक नेता की तरह बर्ताव करने लगे। भाजपा को हराने के लिए बड़े-बड़े दावे किये। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांव गांव में घूम कर कहा था, किसान किसी भी वोट दें लेकिन भाजपा को वोट हरगिज न दें। उन्होंने दावा किया था, विधानसभा चुनाव में योगी को कुर्सी से उतार कर ही दम लूंगा। टिकैत ने जो भौकाल बनाया उससे भाजपा डर भी गयी थी। लेकिन जनता जनार्दन ने तो कुछ और सोच रखा था। उसने भाजपा को सजा तो दी लेकिन मामूली। एक हद तक इनाम ही ज्यादा दिया। पहले चरण के 11 जिलों की 58 सीटों पर किसान वोटर निर्णायक थे। मुजफ्फरनगर, बागपत, शामली मेरठ समेत इन 11 जिलों में राकेश टिकैत (भारतीय किसान यूनियन) का खासा असर भी था। किसान आंदोलन के कारण इस इलाके में भाजपा को खत्म माना जा रहा था। लेकिन जनता ने 58 में से 45 सीटें भाजपा की झोली में डाल कर सबको हैरान कर दिया। कमल को सिर्फ 8 सीटों का नुकसान हुआ। जो बबंडर खड़ा किया गया था उसके हिसाब से ये नुकसान कुछ भी नहीं। दूसरे चरण के चुनाव में भी टिकैत भाजपा को मामूली नुकसान ही पहुंचा सके। भाजपा को 59 में से 49 सीटों पर जीत मिली। पहले से केवल दो सीटें ही कम आयीं।

क्या मुनव्वर राना अब यूपी छोड़ देंगे ?
एक शायर के रूप में मुनव्वर राणा की मकबूलियत का कोई जवाब नहीं। लाखों लोग उनकी शायरी के मुरीद हैं। लेकिन राजनीति में घुसपैठ कर उन्होंने अपनी मिट्टीपलीद कर ली। उन्होंने कसम उठायी थी कि अगर योगी दोबारा जीत गये तो वे उत्तर प्रदेश छोड़ देंगे। उनके विवादास्पद राजनीतिक बयान सुर्खियां बटोरते रहे हैं। इस चुनाव में भी अल्पसंख्यक मतों के ध्रुवीकरण की कोशिश की थी। कांग्रेस ने उनकी बेटी उरूसा राना को उन्नाव की पुरवा विधानसबा सीट से उम्मीदवार बनाया था। जिन मुसलमानों के समर्थन में वे बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, उन्हीं ने उनकी बेटी को नकार दिया। पुरवा सीट पर ऊरुसा राना को महज एक हजार 878 वोट मिले और उनकी जमानत जब्त हो गयी। उन्हें नोटा से भी कम वोट मिले। इस सीट पर जीत मिली भाजपा के अनिल सिंह। यानी जनता ने इस बार बड़बोले लोगों को अच्छा सबक सिखाया है। अब जब योगी दोबारा सत्ता में लौट चुके हैं तो क्या मुनव्वर राना उत्तर प्रदेश छोड़ देंगे ?

औंधे मुंह गिरी कांग्रेस की ‘खीरी राजनीति’
किसान आंदोलन के समय लखीमपुर खीरी में भी भारी बवाल हुआ था। इस घटना में चार किसान और चार अन्य लोग मारे गये थे। उस समय लखीमपुर खीरी, किसान आंदोलन का नया हॉटसपॉट बन गया था। केन्द्रीय मंत्री अजय मिश्र और उनके पुत्र आशीष मिश्र विवाद के केन्द्र में रहे। यह बहुत दुखद घटना थी। लेकिन इसकी आड़ में जबर्दस्त राजनीति भी हुई। कांग्रेस ने इस घटना को अपने राजनीतिक प्रक्षेपण का लॉन्चिंगपैड बना लिया था। प्रियंका गांधी, राहुल गांधी, भूपेश बघेल, चरणजीत सिंह चन्नी, नवजोत सिंह सिद्धू जैसे कई बड़े नेता यहां आये थे। कांग्रेस ने खीरी मुद्दे पर देश भर में प्रदर्शन किया था। बाद में अखिलेश यादव और बसपा सांसद सतीश चंद्र मिश्र भी खीरी पहुंचे थे। इस घटना को लेकर भाजपा के खिलाफ जबर्दस्त माहौल बनाया गया था। लेकिन जब चुनाव हुआ तो खीरी पर विपक्ष की राजनीति औंधे मुहं नीचे गिर गयी। इस जिले की आठों विधानसभा सीट पर भाजपा को जीत मिली। जिस तिनकुनिया में हिंसा की घटना हुई थी वह निघासन विधानसभा क्षेत्र में आती है। निघासन सीट पर भाजपा को सबसे बड़ी जीत मिली। भाजपा के शशांक वर्मा ने 41 हजार वोटों से विजय प्राप्त की। गोला सीट से भाजपा के अरविंद गिरी ने पांचवीं बार जीत हासिल की। पलिया सीट से भाजपा के रोमी साहनी ने हैट्रिक लगायी। लखीमपुर खीरी सदर से योगेश वर्मा, कस्ता से सौरभ सिंह सोनू, श्रीनगर से मंजू त्यागी, मोहम्मदी से लोकेन्द्र प्रताप सिंह, धौरहरा से विनोद शंकर अवस्थी ने भाजपा का परचम फहराया। कांग्रेस की सारी राजनीति धरी की धरी रह गयी। इन आठ सीटों में से एक पर भी वह मुकाबले में नहीं रही। सभी सीटों पर सपा दूसरे स्थान पर रही।
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