यूपी चुनाव 2022: जातियों के आधार पर ही बजेगा पार्टियों का डंका, पश्चिमी यूपी में किसके मन में क्या है ? जानिए
मुजफ्फरनगर, 26 अक्टूबर: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों का काउंटडाउन शुरू हो चुका है। यूं तो जातियों के आधार पर वोटिंग की परंपरा लगभग पूरे देश में है। लेकिन, बिहार और यूपी इसके लिए कुछ ज्यादा ही बदनाम रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश भी इससे बिल्कुल अछूता नहीं है। आने वाले विधानसभा चुनावों के लिए अभी से इसी आधार पर गोलबंदी होने लगी है और मौजूदा मुद्दों को भी किसी न किसी रूप में जाति आधारित सुविधाजनक चुनावी चाशनी में ही लपेटा जा रहा है। जाहिर है कि मतदाताओं ने भी इसी आधार पर अपने मुद्दे चुन लिए हैं और जिन्हें जो अपने मन का लग रहा है, उसी आधार पर अपनी भावनाएं जाहिर कर रहे हैं।

पश्चिमी यूपी में जाति ही रहेगा अहम मुद्दा ?
देशभर में इस समय महंगाई और किसान आंदोलन बहुत बड़ा मुद्दा लगता है। लेकिन, पश्चिमी यूपी में आने पर पता चलता है कि ये मुद्दे जरूर हैं, लेकिन यह किसी न किसी रूप में जातिगत मुद्दों के प्रभाव में आ चुकी हैं। 2017 के चुनाव में पश्चिमी यूपी ने भाजपा की ऐतिहासिक जीत की तारीख लिख दी थी। लेकिन, इस बार भी यह तय लग रहा है कि यहां चुनाव नतीजे जातिगत आधारों पर ही तय होने वाले हैं। सिवालखास के दबथुवा गांव को ही लेते हैं। 23 अक्टूबर को यहां पर आरएलडी नेता जयंत चौधरी की 25 अक्टूबर की रैली के समर्थन के लिए एक पंचायत बुलाई गई थी। यहां पर कुछ लोगों ने महंगाई का मुद्दा भी उठाया और दावा किया कि इस बार तो उनका वोट आरएलडी को ही जा रहा है।

जाटों के मन में क्या चल रहा है ?
यहां के 28 वर्षीय सुनील चौधरी ने ईटी से कहा है, 'हमने बीजेपी को वोट दिया था ये सोचकर कि किसानों के लिए अच्छा काम करेगी। लेकिन, दिल्ली बॉर्डर पर हमारे लोग कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं और सरकार सुनने को तैयार नहीं है।' 2018 के आखिर की बात है। यही अखबार दबथुवा पहुंचा था तो गांव वालों ने आवारा पशुओं की शिकायत की थी और भाजपा के विरोध में वोट डालने का दावा किया था। तथ्य ये है कि मौजूदा यूपी विधानसभा में 13 जाट एमएलए हैं और सारे के सारे भाजपा के हैं। जाहिर कि अबतक जाट समाज पर बीजेपी की मजबूत पकड़ रही है। लेकिन, इस बार क्या होगा यह बड़ा सवाल है।
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गुर्जर, त्यागियों के दिलों में क्या है ?
पास में ही बुबुकपुर गांव है, जो गुर्जर-बहुल है। इसी गांव के ढावा चलाने वाले सुनील कसाना कहते हैं, 'यह जाटों का (किसान) आंदोलन है, ताकि जयंत चौधरी को खड़ा कर सकें।' मेरठ-करनाल रोड पर ही बुबुकपुर के बाद इकरी गांव पड़ता है। यहां त्यागियों की ज्यादा आबादी है। यहां मुकुल त्यागी, रवींद्र कश्यप और दीपक शर्मा नाम के तीन छात्र मिले। इन सबका कहना था कि ज्यादातर गांव वालों को कृषि कानूनों के बारे में पता ही नहीं है और उनको लगता है कि यह विपक्षी दलों का कोई आंदोलन है, किसानों का नहीं। यह एक पैटर्न है, जो बाकी जाट-बहुल गांवों में भी नजर आ रहा है, जैसे कि शामली विधानसभा सीट के सिंभालका और थाना भवन के सिलावार गांवों में।

पश्चिमी यूपी में जातियों का गणित क्या है ?
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) और राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) जैसी पार्टियां को भरोसा है कि इस बार तो उन्हें जाट-मुस्लिम वोटरों का समर्थन पक्का है। तथ्य ये है कि अगर उनकी उम्मीदें सही रहीं तो इलाके की 25 सीटों पर यह वोट बैंक निर्णायक साबित हो सकता है। क्योंकि, इस इलाके में जाट 7% और मुसलमान 29% होने का अनुमान है। अगर ऐसा होता है तो बाकी गैर-जाट ओबीसी जातियां जैसे कि गुर्जर- 4%,सैनी -4%,कश्यप- 3%, पाल-2% और बाकी बीजेपी की तरफ जा सकते हैं।

2017 में पश्चिमी यूपी ने किसे दिया था वोट ?
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कुल 71 विधानसभा क्षेत्र आते हैं। बीजेपी ने 2017 के चुनावों में इनमें से 51 सीटें जीत ली थीं। आरएलडी के एकमात्र विधायक सहेंदर सिंह रमाला भी बाद में बीजेपी में शामिल हो गए थे और इस इलाके के उसके विधायकों की संख्या पहुंच गई 52. जबकि, सपा ने 16, कांग्रेस ने 2 और बसपा ने 1 सीट जीती थी।
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