UP Chunav 2027: तीसरे मोर्चे की आहट, Akhilesh-BJP के लिए खतरे की घंटी? समझें तिगड़ी का गेम क्या?
Uttar Pradesh Vidhan Sabha Chunav 2027: उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनाव अभी लगभग आठ महीने दूर हैं, लेकिन हलचल पहले से तेज हो चुकी है। लखनऊ में 17 जून 2026 को पूर्व मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य और नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद (रावण) की मुलाकात ने नई बहस छेड़ दी है। क्या यह मुलाकात महज सौजन्य भेंट थी या यूपी में तीसरे मोर्चे की नींव पड़ रही है? और असदुद्दीन ओवैसी का इसमें क्या रोल हो सकता है? यह सवाल इन दिनों सियासी गलियारों में गूंज रहा है।
यह घटनाक्रम यूपी की जातीय और सामाजिक राजनीति की जटिलता को उजागर करता है। जहां एक तरफ भाजपा-एनडीए सत्ता की मजबूती पर भरोसा जता रही है, तो दूसरी तरफ सपा का PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूला विपक्षी एकता का दावा कर रहा है। इनके बीच स्वामी प्रसाद मौर्य, चंद्रशेखर आजाद और संभावित रूप से ओवैसी जैसे चेहरे एक नया विकल्प तलाश रहे दिख रहे हैं।

UP Vidhan Sabha Chunav 2027: क्यों अहम है स्वामी प्रसाद मौर्य-चंद्रशेखर की मुलाकात?
17 जून को लखनऊ में स्वामी प्रसाद मौर्य और चंद्रशेखर आजाद की बंद कमरे में लंबी बातचीत हुई। दोनों नेताओं ने अभी तक कोई औपचारिक घोषणा नहीं की, लेकिन राजनीति के गलियारों में चर्चा है कि यह एक नए गठबंधन की दिशा में पहला कदम है। स्वामी प्रसाद मौर्य लंबे समय से छोटे-क्षेत्रीय दलों को एकजुट कर तीसरे मोर्चे की बात कर रहे हैं। सपा छोड़ने के बाद वे अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रहे हैं।
चंद्रशेखर आजाद, भारी भीम आर्मी और आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के राष्ट्रीय अध्यक्ष, नगीना से सांसद के रूप में युवा दलित चेहरा बन चुके हैं। सपा के साथ गठबंधन की बात पहले नहीं बनी, इसलिए वे स्वतंत्र रणनीति पर काम कर रहे हैं। यह मुलाकात बहुजन-दलित-पिछड़े वोट बैंक को जोड़ने की कोशिश का संकेत देती है।
Who Is Swami Prasad Maurya: कौन हैं स्वामी प्रसाद मौर्य? अनुभवी खिलाड़ी की नई चाल
स्वामी प्रसाद मौर्य यूपी राजनीति के चहेते चेहरे रहे हैं। बसपा में मायावती के करीबी, फिर भाजपा में मंत्री, उसके बाद सपा में शामिल हुए। 2022 में उन्होंने भाजपा छोड़कर सपा का साथ दिया था। अब वे अपनी राष्ट्रीय शोषित समाज पार्टी (आरएसएसपी) के जरिए पिछड़ी जातियों (मौर्य, कुशवाहा, शाक्य, सैनी आदि) के बीच अपनी पकड़ मजबूत कर रहे हैं।
वे सामाजिक न्याय, संवैधानिक मूल्यों और पिछड़ों के अधिकारों के मुद्दे लगातार उठाते हैं। उनकी रणनीति छोटे दलों को एक मंच पर लाकर बड़ा समीकरण बनाने की है। चंद्रशेखर के साथ मुलाकात इसी व्यापक बहुजन फॉर्मूले का हिस्सा लगती है।

- लंबे समय तक कांशीराम और मायावती के नेतृत्व वाली BSP में रहे।
- BSP सरकार में मंत्री और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभाई।
- 2016 में BSP छोड़कर BJP में शामिल हुए।
- 2017 में योगी आदित्यनाथ सरकार में कैबिनेट मंत्री बने।
- 2022 विधानसभा चुनाव से पहले BJP छोड़कर समाजवादी पार्टी में शामिल हुए।
- 2024 में सपा से अलग होकर अपनी नई पार्टी राष्ट्रीय शोषित समाज पार्टी बनाने का ऐलान किया।
Who Is Chandrashekhar Azad: कौन हैं चंद्रशेखर आजाद? युवा ऊर्जा और दलित आक्रोश का प्रतीक
चंद्रशेखर आजाद की राजनीति शिक्षा, बेरोजगारी और दलित अधिकारों पर केंद्रित है। भारी भीम आर्मी के जरिए उन्होंने पश्चिमी यूपी में मजबूत आधार बनाया। 2024 लोकसभा चुनाव में नगीना से जीत उनके चुनावी वजूद को स्थापित करती है। उनकी अपील युवा दलितों और उन वर्गों में है, जो पारंपरिक दलों (बसपा, सपा) से दूरी महसूस करते हैं।
मुलाकात में दोनों नेताओं ने संभवतः 2027 की रणनीति, सीट बंटवारे और साझा एजेंडे पर चर्चा की होगी। अगर यह गठबंधन आगे बढ़ा तो पूर्वांचल, अवध और पश्चिमी यूपी के कुछ क्षेत्रों में त्रिकोणीय मुकाबला हो सकता है।

Asaduddin Owaisi का गेम: मुस्लिम वोट बैंक और तीसरे मोर्चे की कड़ी
इस चर्चा में AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी का नाम बार-बार आ रहा है। ओवैसी हाल ही में यूपी आए और मटेरा (बहराइच) से AIMIM उम्मीदवार घोषित किया। उन्होंने साफ कहा कि 2027 में AIMIM अकेले या गठबंधन में लड़ेगी।
क्या बिहार वाला प्लान, अब UP में चलेगा?
बिहार विधानसभा चुनाव में ओवैसी, चंद्रशेखर आजाद और स्वामी प्रसाद मौर्य पहले ही तीसरे मोर्चे (ग्रैंड डेमोक्रेटिक अलायंस) में साथ आ चुके हैं। उस वक्त इस मोर्चे का ऐलान AIMIM बिहार प्रदेश अध्यक्ष अख्तरुल ईमान ने किया था। यूपी में भी इसी मॉडल की संभावना है। ओवैसी का फोकस मुस्लिम बहुल सीटों (बहराइच, बलरामपुर, बस्ती आदि) पर है। वे सपा पर आरोप लगाते हैं कि मुस्लिम वोटों को कैद करके रखा जाता है।
ओवैसी की रणनीति समझें..
- 100-200 सीटों पर लड़ने की तैयारी।
- संगठन विस्तार (शौकत अली यूपी अध्यक्ष)।
- दलित-पिछड़े-मुस्लिम समीकरण।
- सपा-कांग्रेस को चुनौती देकर स्वतंत्र ताकत बनना।
तीसरे मोर्चे के गणित में कौन-कौन से वोट बैंक?
- दलित वोट: चंद्रशेखर आजाद की मुख्य ताकत। बसपा के पारंपरिक वोट में सेंध लगाने की क्षमता।
- पिछड़ा वोट: स्वामी प्रसाद मौर्य की पकड़ वाली जातियां (मौर्य-कुशवाहा आदि)। OBC में गैर-यादव वर्ग को आकर्षित कर सकता है।
- मुस्लिम वोट: ओवैसी का कोर वोट बैंक। अगर एकजुट हुआ तो विपक्षी वोट का बंटवारा होगा।
यह समीकरण PDA को चुनौती दे सकता है। लेकिन यूपी में जातीय समीकरण क्षेत्रीय रूप से अलग-अलग हैं। पूर्वांचल में राजभर-निषाद जैसे वर्ग, पश्चिम में जाटव-वाल्मीकि, अवध में अन्य OBC-सभी को एक मंच पर लाना आसान नहीं।
तीसरे मोर्चे की विफलताएं क्या हो सकती हैं?
यूपी में तीसरे मोर्चे की कोशिशें नई नहीं हैं। 2017, 2022 में कई छोटे गठबंधन बने, लेकिन ज्यादातर बिखर गए। सीट बंटवारे, नेतृत्व की लड़ाई और फंडिंग की कमी मुख्य कारण रहे। बसपा का पतन, सपा का यादव-मुस्लिम केंद्रित होना और भाजपा का हिंदुत्व+विकास फॉर्मूला इन प्रयासों को कमजोर करता रहा। फिर भी, अगर इस बार संगठन मजबूत हुआ और जमीनी काम हुआ तो 5-10% वोट शेयर के साथ कई सीटों पर असर पड़ सकता है।
कांग्रेस-सपा समेत BJP पर असर?
- सपा: PDA में सेंध का खतरा। अखिलेश यादव को मुस्लिम-दलित वोट की चिंता बढ़ेगी।
- बसपा: मायावती का दलित आधार और कमजोर हो सकता है।
- भाजपा: विपक्षी वोट बंटवारे से फायदा। लेकिन अगर तीसरा मोर्चा NDA विरोधी बना तो चुनौती भी।
- कांग्रेस: पहले से कमजोर, और भी मार्जिनल हो सकती है।













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