UP Bypolls 2018: 14 महीने में चौथी हार से योगी के नेतृत्व पर उठे सवाल?
लखनऊ। नरेंद्र मोदी की अगुवाई में जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश में 2014 के लोकसभा चूनाव में 73 सीटों पर जीत दर्ज की थी उसके बाद माना जा रहा था कि भाजपा को हरा पाना बेहद मुश्किल है। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की प्रचंड जीत ने इस विश्वास को और भी पुख्ता किया था, लेकिन इस विश्वास पर पिछले एक वर्ष में विपक्षी दलों ने लगातार सेंधमारी की है। यूपी की चार लोकसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में भाजपा को लगातार हार का सामना करना पड़ा है। लगातार मिल रही हार ने भाजपा नेतृत्व पर भी बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।

एकजुट विपक्ष के सामने मुरझाया कमल
पिछले वर्ष प्रचंड बहुमत के बाद योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली थी, उनके साथ ही सांसद केशव प्रसाद मौर्या ने भी उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। जिसके बाद इलाहाबाद की फूलपुर और गोरखपुर लोकसभा सीट खाली हुई थी और इन दोनों ही सीटों पर भाजपा के उम्मीदवार को हार का सामना करना पड़ा था। हार का यह सिलसिला जो गोरखपुर और फूलपुर से शुरू हुआ था वह कैराना और नूरपुर में भी जारी है। इन दोनों ही सीटों पर भाजपा को संयुक्त विपक्ष के सामने मुंह की खानी पड़ी है।

हार की बड़ी वजह
गोरखपुर और फूलपुर की हार की बाद के जिस तरह से भाजपा को कैराना और नूरपुर में हार का सामना करना पड़ा है उसके बाद बड़ा सवाल योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व पर खड़ा होने लगा है। तमाम राजनीतिक जानकारों का मानना है कि योगी सरकार पिछले एक वर्ष में अपने तमाम वायदों को पूरा करने में विफल रही है, बिजली की समस्या से लेकर, प्रदेश में बढ़ते अपराध, रोजगार की कमी और किसानों की समस्या के चलते लोगों में योगी सरकार को लेकर नाराजगी है।

बिजली, पानी, अपराध पर लचर सरकार
जिस तरह से भाजपा ने सरकार में आने से पहले किसानों से वायदा किया था कि बिक्री के 14 दिन के भीतर गन्ना किसानों को उनकी फसल की लागत मिलेगी, वह जमीन पर लागू नहीं हो पाया है। यही नहीं सिंचाई और बिजली की कटौती की वजह से भी किसानों की नाराजगी का योगी सरकार को सामना करना पड़ रहा है। किसानों के मुद्दे से इतर प्रदेश में लगातार जिस तरह से पुलिस ने अपराधियों के खिलाफ एनकाउंटर अभियान चलाया है उसको लेकर भी सरकार की आलोचना हो रही है। पुलिस द्वारा किए गए कई एनकाउंटर पर सवाल खड़े हो चुके हैं। यही नहीं पुलिस के लगातार एनकाउंटर के बाद भी ना सिर्फ प्रदेश के अन्य शहरों बल्कि प्रदेश की राजधानी में भी अपराधी बेखौफ होकर लूट और हत्या की घटना को अंजाम दे रहे हैं।

विवादित बयान और अल्पसंख्यक विरोधी छवि
साथ ही जिस तरह से तमाम विवादित वजहों और बयानों को लेकर प्रदेश सरकार सुर्खियों में रही है उसे लेकर भी सरकार की छवि को काफी नुकसान पहुंचा है। खुद योगी आदित्यनाथ अपने बयान को लेकर कई बार मीडिया की सुर्खियां बन चुके हैं। जिस तरह से उन्होंने कहा था कि मैं हिंन्दू हूं ईद नहीं मनाता हूं, उनका यह बयान काफी सुर्खियों में रहा। कैराना और नूरपुर में प्रदेश सरकार को अल्पसंख्यक विरोधी छवि का काफी नुकसान उठाना पड़ा, जिसकी परिणिती हार के रुप में भाजपा के सामने आई है।

आसान नहीं है 2019 की चुनौती
आगामी लोकसभा चुनाव में अब तकरीबन एक वर्ष से भी कम का समय बचा है, लेकिन जिस तरह से एक के बाद भाजपा को हार का सामना करना पड़ा रहा है उसने पार्टी की की लोकसभा की उम्मीदों का बड़ा झटका दिया है। यहां बड़ा सवाल यह उठता है कि इसी तरह अगर विपक्ष 2019 में एकजुट होकर भाजपा के खिलाफ चुनावी मैदान में उतरता है तो भाजपा किस तरह से इसका सामना करेगी। हालांकि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व उपचुनावों के नतीजों को मुख्य चुनाव से तुलना किए जाने के पक्ष में नहीं है, उसका कहना है कि उपचुनाव में वोट फीसदी कम रहता है, जबकि मुख्य चुनाव में बड़ी संख्या में लोग नई सरकार का फैसला लेने के घर से बाहर निकलते हैं, लिहाजा आम चुनाव के परिणाम उपचुनाव से अलग होंगे।
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