UP-बिहार के 3 बाहुबली: अतीक का चैप्टर क्लोज, मुख्तार पर कानून की मार; आनंद मोहन का रास्ता साफ
अपराध की दुनिया की जब भी बात होती है, उत्तर प्रदेश और बिहार सबसे आगे नजर आते हैं। इन दोनों राज्यों की माटी से उभरे तीन बाहुबली अतीक अहमद, मुख्तार अंसारी और आनंद मोहन सिंह।

खून, अपहरण और माफियागिरी... जब भी अपराध की दुनिया की बात होती है तो उत्तर प्रदेश और बिहार दोनों ही राज्य अव्वल नंबर पर आते हैं। सत्ता का मोह हो या बदले की भावना, दोनों ही सूरतों में राज्य रक्त सा 'लाल' हो जाता है। गोलियों की गूंज किसी न किसी कोने से कानों में पहुंच ही जाती है। यूपी-बिहार की माटी से उभरे तीन बाहुबली अतीक अहमद, मुख्तार अंसारी और आनंद मोहन सिंह। यह वो नाम हैं, जिन्होंने अपराध की दुनिया में अपना वर्चस्व दिखाते हुए सियासत में कदम जमाया।
माफिया डॉन अतीक अहमद का चैप्टर तीन की तिकड़ी ने क्लोज कर दिया है। लेकिन उसकी पत्नी शाइस्ता अभी तक पुलिस को चकमा दे रही है। वहीं, मुख्तार अंसारी पर कानून की दफाएं और मजबूत हो गई हैं। मुख्तार अपने 10 साल अब जेल में ही बिताएगा। यूपी को दहलाने वाले इन दो माफियाओं को अपने जुर्म की सजा मिली। उधर, बाहुबली आनंद मोहन सिंह को बिहार सरकार ने वरदान देकर 15 साल बाद जेल से रिहा करा लिया। आइए आपको मिलवाते हैं बाहुबलियों से...
आतंक का पर्याय बना तांगा चलाने वाले का बेटा अतीक
बात 70 के दशक की है। साल 1962 में उत्तर प्रदेश के प्रयागराज स्थित चकिया गांव निवासी तांगा चलाने वाले फिरोज अहमद के घर 10 अगस्त को एक बेटे ने जन्म लिया। माता-पिता ने उसका नाम अतीक रखा। गरीबी में निवास कर रहे अतीक अहमद क पढाई से मन हटने लगा। कम उम्र में अमीर बनने की सनक सवार हो गई। 17 साल की उम्र में अतीक ने खून से अपने हाथ रंग कर अपराध की दुनिया में कदम रखा। उसके बाद तो जैसे कारवां ही अतीक का शुरू हो गया। वक्त और पुलिस दोनों ही अतीक के दोस्त से बन गए। एक के बाद एक 100 मुकदमे दर्ज हुए। इस दौरान उसने राजनीति का स्वाद भी चखा।
लगातार 5 बार विधायकी अपने नाम की थी। हालांकि, उमेश पाल हत्याकांड उसके और परिवार के लिए लिए काल साबित हुआ। दरअसल, बीएसपी तत्कालीन विधायक राजू पाल की हत्या के गवाह उमेश को मरवाने का मुकदमा उसके पूरे परिवार पर दर्ज हुआ। पूछताछ को साबरमती से पुलिस अतीक को प्रयागराज लेकर आई और तीन की तिकड़ी ने पुलिस कस्टडी में अतीक और उसके भाई अशरफ को गोलियों से छलनी कर दिया।
रसूखदार खून और काम माफियागिरी, ये है मुख्तार अंसारी
उत्तर प्रदेश की मऊ विधानसभा सीट से 5 बार विधायक रहे मुख्तार अंसारी का जन्म सुभानल्लाह अंसारी के घर 30 जून 1963 को हुआ था। मुख्तार की रगों में रसूखदार खून बहता है। उनके दादा डॉ. मुख्तार अहमद अंसारी कांग्रेस अध्यक्ष तो नाना मोहम्मद उस्मान इंडियन आर्मी में ब्रिगेडियर थे। वहीं, पिता गाजीपुर में साफ-सुथरी छवि रखने वाले और कम्युनिस्ट बैकग्राउंड के आने वाले थे। वह स्थानीय राजनीति में सक्रिय थे। इतना ही नहीं, देश के सबसे लंबे वक्त तक उपराष्ट्रपति रहे हामिद अंसारी रिश्ते में चाचा लगते हैं।
1990 के दशक में मुख्तार ने जमीन के कारोबार में अपराध की दुनिया में एंट्री की। इसके बाद गोलियों की गूंज पर मुख्तार खुश होने लगा। साल 2002 में मुख्तार और विरोधी ब्रजेश सिंह के बीच शूटआउट हुआ। इसके बाद तो जैसे पूर्वांचल पर मुख्तार की मुहर लग गई। ठीक तीन साल यानी 2005 बाद विधायक कृष्णानंद की गोलियों से भूनकर हत्या कर दी गई। जिसमें मुख्तार को नामजद किया गया। यह पहली बार था शायद, जो एके-47 गाजीपुर में गूंजी हो। इसी साल मऊ में दंगे भड़के, इसका आरोप भी मुख्तार पर लगा। 786 नंबर की जीप में हथियार बंद गुर्गों संग सडक पर काफिला निकालने वाला मुख्तार अब 10 साल जेल में काटेगा। विधायक कृष्णानंद राय की हत्या और कारोबारी नंदकिशोर रूंगटा की किडनैपिंग मामले में मुख्तार को यह सजा गाजीपुर की MP/MLA कोर्ट ने सुनाई है।
आनंद मोहन को बिहार सरकार का वरदान!
बिहार के सहरसा जिले की धरती पर 26 जनवरी 1956 को आनंद मोहन सिंह ने जन्म लिया। स्वतंत्रता सेनानी राम बहादुर सिंह के पोते आनंद मोहन के बचपन से ही तेवर तीखे रहे। रगों में स्वतंत्रता सेनानी का खून उबाल मारने लगा और सिर्फ 17 साल की उम्र में ही जेपी आंदोलन में हिस्सा लेकर राजनीतिक करियर की ओर कदम बढाया। 80 के दशक में आनंद मोहन सिंह दबंगई और जाति के बल पर बाहुबली नेता बन गए। इस दौरान कई मुकदमे भी दर्ज हुए।
80 के दशक में बिहार में आनंद मोहन सिंह बाहुबली नेता बन चुके थे। उन पर कई मुकदमे भी दर्ज हुए। 1990 के विधानसभा चुनाव में जनता दल के टिकट पर आनंद मोहन ने महिषी से चुनाव लड़ा। 1993 में जनता दल से अलग होकर बिहार पीपुल्स पार्टी का गठन किया। आनंद मोहन अपनी रफ्तार के साथ आगे बढ़ते रहे, लेकिन 1994 में डीएम रहे जी कृष्णैया की हत्या के आरोप में उन्हें फांसी के बाद उम्रकैद की सजा हुई। साल 2023 में नीतीश कुमार की सरकार बिहार में बाहुबली आनंद मोहन के लिए वरदान बनकर आई। कानून के नियमों में बदलाव कर आनंद मोहन को 15 साल बाद जेल से रिहा किया गया।












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