यूपी चुनाव 2017- एक-एक वोट साबित होगा निर्णायक, एक चूक भी पड़ सकती है भारी
यूपी के चुनाव में अदना अंतर भी पलट सकता है प्रदेश का सियासी समीकरण, आसान नहीं होगी जीत, एक-एक वोट का रखना होगा हिसाब
लखनऊ। उत्तर प्रदेश का चुनाव देश की राजनीति में क्या स्थान स्थान रखता है इस बात का अंदाजा ऐसे लगाया जा सकता है कि देश के 15 प्रधानमंत्रियों में से 9 प्रधानमंत्री अकेले उत्तर प्रदेश से आएं है, प्रदेश की महत्ता को ध्यान में रखते हुए खुद नरेंद्र मोदी ने भी यूपी के वाराणसी से चुनाव लड़ने का फैसला लिया था। यूपी में एक-एक वोट सभी दलों के लिए काफी मायने रखता है, ऐसें में किसी भी एक समुदाय विशेष का वोट बैंक एक तरफ से दूसरी तरफ जाता है तो वह पूरे सियासी समीकरण को बदलने का माद्दा रखता है।

आसान नहीं है यूपी की राह
यूं तो यूपी में दलित, मुसलमान, ओबीसी और सवर्ण सबसे बड़े वोट बैंक हैं लेकिन इस वोट समीकरण को साधन में तमाम दलों के पसीने छूट जाते हैं। प्रदेश में महज तीन फीसदी वोट बैंक अगर अपना रुख बदलता है तो वह किसी भी दल के लिए निर्णायक साबित हो सकता है। इसी वोट फीसदी के चलते पिछले चुनाव में बसपा के हाथ से तकरीबन 150 सीटें निकल गई थी और अखिलेश यादव ने पहली बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। इससे पहले भी 2002 में इसी वोट फीसदी के चलते मुलायम सिंह सिंह ने सत्ता में वापसी की थी और मायावती को कुर्सी छोड़नी पड़ी थी। कुछ ऐसा ही 2007 में भी हुआ था जब मुलायम सिंह प्रदेश में 100 सीटें भी नहीं जीत पाए थे।
41 सीटों का फैसला चौंकाने वाला
यूपी में तकरीबन 41 विधानसभा की सीटें ऐसी है जहां महज कुछ वोटों ने चुनावी फैसले को बदल कर रख दिया था, जिसमें मुख्य रूप से बहेड़ी, सिकंदराबाद, फर्रुखाबाद, पट्टी, बालामऊ, गाजीपुर, थाना भवन, महोबा, बेहट, करछना, मथुरा, जलालाबाद, गौरीगंज, इलाहाबाद, बिठूर, कोइल, धामपुर, फतेहाबाद, घाटमपुर, बैरिया, कटरा, मेजा, धौरहरा, रुदौली, सिंकदरा, फूलपुर, उतरौला, जौनपुर, महरोनी, अकबरपुर रनिया, बबेरू, चायल, मधुबन, कांठ, स्याना, मिश्रिख, बिलारी, बख्शी का तालाब, डुमरियागंज, फिरोजाबाद, बीकापुर हैं।
वोट फीसदी में कम अंतर भी बना निर्णायक
इन सभी विधानसभा सीटों पर जीतने वाले उम्मीदवारों का व हारने वाले उम्मीदवारों का वोट फीसदी अंदर बहुत ही कम था। बहेड़ी से सपा उम्मीदवार अताउर्रहमान ने भाजपा के चंद्रपाल को सिर्फ 18 वोट से हराया था, आगरा के खेरागढ़ से बसपा के भगवान सिंह कुशवाहा और सपा की रानी पक्षालिका सिंह का वोट अंतर भी महज चार फीसदी था और उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। आपको बता दें कि 2012 के चुनाव में सपा ने 29.13 फीसदी वोट हासिल करके 224 सीटों पर जीत हासिल की थी जबकि बसपा के खाते में 25.19 फीसदी वोट आए थे। हालांकि दोनों दलों के बीच वोट फीसद का खास अंतर नहीं है लेकिन दोनों की सीटों में जमीन आसमान का अंतर है। एक तरफ जहां सपा ने 224 सीटें जीती तो बसपा को महज 80 सीट ही हासिल हुई, जबकि कांग्रेस को 28 व भाजपा को 47 सीटों पर जीत हासिल हुई थी। 2002 के चुनाव में सपा को कुल 25.37 फीसदी वोट हासिल हुए थे और उसे 143 सीटें हासिल हुई थी जबकि बसपा को 23.06 फीसदी वोट हासिल हुए और उसे 98 सीटों पर जीत मिली। जबकि भाजपा के पास सिर्फ 20.08 फीसदी वोट था लेकिन उसे 88 सीटों पर जीत हासिल हुई। वहीं अगर 2007 के आंकड़ों पर नजर डालें तो उस वक्त भी बसपा को 30.43 फीसदी वोट हासिल हुए थे और 206 सीटों पर जीत मिली थी। इस चुनाव मे सपा को 25.43 फीसदी वोट मिले लेकिन उसे सिर्फ 97 सीटों पर जीत मिली।
लोकसभा चुनाव भी बयां करतें है इन आंकड़ों की सच्चाई
2004 में हुए लोकसभा चुनाव के परिणाम पर नजर डालें तो सपा को 26.74 फीसदी वोट मिले और उसे 35 सीटों पर जीत मिली जबकि बसपा को 24.67 फीसदी वोट मिला और 19 सीट पर जीत। इस चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन अच्छा रहा और उसने 22.17 फीसदी वोट हासिल कर 10 सीटों पर जीत दर्ज की। 2009 के चुनाव में सबसे अधिक 27.20 फीसदी वोट बसपा को मिले थे, जबकि एक बार फिर से सपा दूसरे नंबर पर रही थी और उसे 23.26 फीसदी वोट मिले थे। इस चुनाव में एक तरफ जहां सपा 23 सीट तो बसपा ने 20 सीटें जीती थी। वहीं सिर्फ 11.65 फीसदी वोट हासिल करके कांग्रेस ने 21 सीटें तो 17.5 फीसदी वोट हासिल करके भाजपा ने 20 सीटें जीती थी।
मोदी लहर में वोट फीसदी के बाद भी नहीं मिली विरोधियों को सीटें
मोदी लहर में 2014 के चुनाव में भाजपा का कई दलों से गठबंधन था और इस गठबंधन को कुल 42.63 फीसदी वोट हासिल हुए थे और पार्टी ने रिकॉर्ड 73 सीटें जीती थी। जबकि सपा को 22.35 फीसदी वोट मिला था फिर भी उसे सिर्फ 5 सीट मिली थी और 19.77 फीसदी वोट हासिल करने वाली बसपा अपना खाता भी नहीं खोल सकी थी। जबकि कांग्रेस ने सिर्फ 7.53 फीसदी वोट हासिल किया था लेकिन उसे दो सीटों पर जीत हासिल हुई थी, जोकि राहुल गांधी और सोनिया गांधी की सीट थी।
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