UP BJP के संगठन मंत्री का टास्क इतना आसान नहीं, धर्मपाल सिंह के सामने ये हैं 5 बड़ी चुनौतियां
लखनऊ, 17 अगस्त: उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के संगठन मंत्री सुनील बंसल की विदाई हो चुकी है। उन्हें केंद्र में राष्ट्र महामंत्री बनाकर कुछ चुनावी राज्यों का प्रभारी भी बनाया गया है। सुनील बंसल के जाने के बाद अब उनकी जगह बीजेपी के नए संगठन मंत्री धर्मपाल सिंह सैनी लेंगे। हालांकि धर्मपाल सिंह को आम चुनाव से पहले एक अग्निपरीक्षा से गुजरना होगा। उनके लिए यूपी नया नहीं है लेकिन बीजेपी जैसी बड़ी पार्टी का संगठन मंत्री बनने के बाद दायित्व भी काफी बढ़ जाते हैं इसलिए उनके सामने कई चुनौतियां हैं जिनका सामना उनको करना पड़ेगा। बीजेपी सूत्रों के मुताबिक धर्मपाल सिंह बुधवार को नए संगठन मंत्री के तौर पर आम काम शुरू कर देंगे।

नवंबर-दिसंबर में होने वाले नगर निगम चुनाव बड़ी चुनौती
यूपी में नवंबर-दिसम्बर में नगर निगम के चुनाव होने हैं। आम चुनाव से पहले नगर निगम के चुनाव बीजेपी के लिए एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने आएगा। इस लिहाज से नए संगठन मंत्री धर्मपाल सिंह का पहली चुनौती नगर निगम चुनाव में बीजेपी को जीत दिलाने की होगी। नगर निगम में फिलहाल बीजेपी का ही बोलबाला है और ज्यादातर सीटों पर बीजेपी ही काबिज है लेकिन इस प्रदर्शन को बरकरार रखना धर्मपाल के लिए बड़ी चुनौती होगी। बीजेपी के एक वरिष्ठ एमएलसी कहते हैं कि जिम्मेदारी बड़ी है। जिस तरह से सुनील बसंल ने इसको निभाया उसी तरह की उम्मीद धर्मपाल सिंह से भी लगाई जा रही है।

संगठन और सरकार में समन्वय बनाने की जिम्मेदारी
संगठन मंत्री की ताजपोशी के बाद धर्मपाल के सामने सबसे बड़ी चुनौती योगी सरकार के साथ समन्वय बनाना है। सुनील बंसल और योगी सरकार के बीच कई मुद्दों को लेकर टकराव देखने को मिला था। अंदरखाने संगठन और सरकार के बीच बेहतर समन्यव नहीं था। सुनील बंसल ने एक गुट बना रखा था जिसे वो अपने हिसाब से चलाते थे। कई मुद्दों को लेकर सीएम योगी के साथ उनके टकराव भी हुए लेकिन इन चुनौतियों के बीच बंसल ने अपनी कार्यक्षमता का परिचय देते हुए अपनी अलग पहचान बनाई। अब धर्मपाल सिंह किस तरह योगी सरकार के साथ तालमेल बैठाते हैं यह देखना काफी दिलचस्प होगा।

यूपी प्रदेश अध्यक्ष के साथ बेहतर तालमेल भी जरूरी
बीजेपी में संगठन मंत्री का पद काफी अहम होता है। संगठन मंत्री का सरकार के साथ प्रदेश अध्यक्ष से बेहतर तालमेल होना बहुत जरूरी होता था। 2014 से पहले जब सुनील बंसल यूपी के संगठन प्रभारी बनाए गए थे तब उस समय में लक्ष्मीकांत वाजपेयी यूपी बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष हुआ करते थे। बीजेपी सूत्रों की माने तो वाजेपयी और सुनील बसंल के बीच हमेशा टकराव की स्थिति बनी रही। दोनों नेता कई मोर्चों पर एक दूसरे से भिड़े थे। सुनील बंसल से बेहतर तालमेल न होने की वजह से लक्ष्मीकांत वाजपेयी को बाद में प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिया गया था। बाद में बीजेपी की कमान केशव प्रसाद मौर्य को सौंपी गई थी जिनका बंसल के साथ बेहतर समन्वय था।

लोकसभा चुनाव 2024 में होगा असली इम्तिहान
बीजेपी के संगठन मंत्री सुनील बसंल जब यूपी के संगठन मंत्री बनाए गए थे तब यूपी में बीजेपी की हालत काफी बुरी थी। केंद्र में यूपीए और राज्य में समाजवादी पार्टी का शासन था। बीजेपी के पास उस समय यूपी में केवल दस सीटें ही थीं। विपरित परिस्थितियों में सुनील बसंल ने इसको चुनौती के तौर पर लिया और 2014 के आम चुनाव में बीजेपी को यूपी में शानदार जीत दिलवाने का काम किया। इसलिए अब नए संगठन मंत्री के सामने 2024 का चुनाव कड़ी चुनौती होगी क्योंकि बीजेपी जितनी सीटें पाएगी उससे धर्मपाल सिंह को भी जोड़कर देखा जाएगा।

नए प्रदेश अध्यक्ष के चयन में अहम भूमिका निभाएंगे धर्मपाल
बीजेपी के एक पदाधिकारी कहते हैं, '' यूपी बीजेपी का नया प्रदेश अध्यक्ष कभी भी घोषित हो सकता है। लेकिन जो भी प्रदेश अध्यक्ष आएगा उसके चयन में भी धर्मपाल की अहम भूमिका होगी। चयन के बाद नए प्रदेश अध्यक्ष के साथ बेहतर तालमेल होना बेहद जरूरी है ताकि एक दूसरे के हितों का टकराव न दिखे।'' यूपी में फिलहाल स्वतंत्रदेव सिंह बीजेपी के कार्यवाहक प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर काम कर रहे हैं। उन्होंने कुछ दिनों पहले ही आरएसएस के दबाव में आकर इस्तीफा दे दिया था। ऐसा माना जा रहा है कि बीजेपी आलाकमान कभी भी प्रदेश अध्यक्ष का ऐलान कर सकता है।












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