RJD के दबाव ने 2017 में नहीं लड़ने दिया UP चुनाव, उसका खामियाजा भुगत रही JDU: जानिए नीतीश से क्यों है नाराजगी ?
लखनऊ, 07 अक्टूबर : उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव सात महीने दूर हैं और सभी पार्टियां अपनी अपनी तैयारियों में जुटी हुई हैं। वहीं दूसरी ओर बिहार की सत्ताधारी जनता दल (यूनाइटेड) या जद (यू) उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव लड़ने का मन बना रही है। पार्टी के सूत्रों का दावा है कि उनकी पहली पसंद राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में शामिल होना होगा। हालांकि प्रदेश का नेतृत्व बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से खफा भी है। यूपी के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने दावा किया कि 2017 में आरजेडी की दबाव की वजह से जेडीयू यूपी में चुनाव नहीं लड़ी जिसका पार्टी का कैडर लगभग समाप्त हो गया। पार्टी पिछले दस साल से चुनाव से दूर है अंतिम बार 2012 में अपने दम पर 200 से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ा था। इन दस सालों में अपने कैडर का ही विश्वास पार्टी के उपर से उठ गया। अब दोबारा कैडर खड़ा करने की कवायद की जा रही है।

पार्टी का विस्तार करना है तो हर चुनाव लड़ना होगा
पार्टी के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने दावा करते हुए कहा कि, ''बिहार में हुए पिछले चुनाव में महागठबंधन में जेडीयू शामिल थी जिसकी वजह से आरजेडी के दबाव में पार्टी को झुकना पड़ा था। आरजेडी ने जेडीयू के सामने शर्तें रखीं थीं कि यदि वह महागठबंधन में शामिल होगी तो यूपी में विधानसभा चुनाव में नहीं उतरेगी। पार्टी पिछले चुनाव में नहीं उतरी जिसका नुकसान यह है कि पार्टी को जिलों में कैडर नहीं मिल रहे हैं और चुनाव लड़ने वाला भी नहीं मिल रहा है। पार्टी का विस्तार करना है तो उसे हर हाल में हर चुनाव में उतरना ही होगा। आप चुनाव से दूर रहकर या दबाव के आगे झुककर पार्टी का भला नहीं कर सकते।''

बिहार से बाहर पार्टी को खड़ा करना ही मकसद
इस नेता ने कहा कि हमारी पहली पसंद एनडीए के हिस्से के रूप में चुनाव लड़ना होगा, और हमें उम्मीद है कि यह काम करेगा। पूर्व समता पार्टी के दिनों से यूपी में हमारी पुरानी उपस्थिति रही है, हालांकि हमने 2017 में चुनाव नहीं लड़ा था। यूपी में हमारे विधायक थे और सरकार में हमारे मंत्री भी थे। उद्देश्य बिहार से बाहर भी पार्टी को पुनर्जीवित करना है। हालांकि हालांकि यूपी से पहले दिल्ली विधानसभा चुनाव में, जद (यू) ने एनडीए के हिस्से के रूप में दो सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन अपना खाता नहीं खोल सका। झारखंड में, उसने अपने दम पर 81 में से 46 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन फिर भी, एक भी जीत नहीं पाई।

यूपी में बीजेपी ज्यादा सीटें देगी इसकी संभावना कम
उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के छोटे दलों के लिए ज्यादा जगह छोड़ने की संभावना नहीं है, जबकि विपक्ष इसे सत्ता बनाए रखने से रोकने के लिए एक संयुक्त मोर्चा बनाने की कोशिश कर रहा है। 2020 के बिहार विधानसभा चुनावों ने जद (यू) को तीसरे स्थान पर ला दिया है। पार्टी केवल उन अन्य राज्यों में विस्तार करने की कोशिश कर रही थी जहां अतीत में उसका अच्छा संगठन रहा है। अरुणाचल प्रदेश में अपने सहयोगी दल के हाथों नुकसान हुआ था, जब उसके सात में से छह विधायक भाजपा में शामिल हो गए थे। अतीत में, पार्टी ने दिल्ली, गुजरात, कर्नाटक और झारखंड सहित कई राज्यों से चुनाव लड़ा है, लेकिन केवल अरुणाचल में सीमित सफलता मिली है।

कई राज्यों में संगठन के विस्तार का प्रयास जारी
पार्टी के पदाधिकारी ने कहा, 'हो सकता है कि पार्टी ने कई जगहों पर सीटें नहीं जीती हों, लेकिन इसने कई राज्यों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। हरियाणा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, केरल और तमिलनाडु जैसे अधिक राज्यों तक पहुंचने और संगठन को मजबूत करने का हमारा प्रयास है। हमने पहले कई राज्यों में लड़ाई लड़ी और अच्छा प्रदर्शन किया। अब पार्टी अपने सांगठनिक आधार को मजबूत करना चाहती है और संघर्ष करना चाहती है।

पूर्वांचल और मध्य यूपी की 36 सीटों पर जेडीयू का दावा
जेडीयू का दावा है कि यूपी में कुर्मी समुदाय भी लगभग सात फीसदी हैं और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इसी समाज से आते हैं। यूपी में कुर्मी समुदाय लगभग 50 सीटों पर अच्छी भूमिका निभाता है। इनको लेकर भी राजनीतिक दल रणनीति बनाने में जुटे हुए हैं। बिहार से सटे पूर्वांचल के दर्जनभर जिलों में उनकी अच्छी फैन फालोइंग भी है जिसका फायदा उनकी पार्टी को मिल सकता है। संतकबीरनगर, मिर्जापुर, सोनभद्र, गाजीपुर, बलियां, वाराणसी, उन्नाव, जालौन, फतेहपुर और प्रतापगढ़ समेत दो दर्जन जिले ऐसे हैं जहां यह समुदाय हर सीट पर लगभग 15000 से 20000 तक वोटर हैं जो चुनाव में अहम भूमिका निभाते हैं। इसी को ध्यान में रखकर जेडीयू ने लगभग तीन दर्जन सीटों पर अपनी दावेदारी पेश की है।

बीजेपी ने किया था निषाद पार्टी के साथ गठबंधन का ऐलान
उत्तर प्रदेश के अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी अपनी चुनावी तैयारियों को तेज करते हुए यूपी मुख्य चुनाव प्रभारी धर्मेंद्र प्रधान ने तीन दिनों तक सह प्रभारियों की बैठक लेने के बाद शुक्रवार को निषाद पार्टी के साथ गठबंधन का एलान किया था। दरअसल निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय निषाद लंबे समय से बीजेपी पर अपनी मांगे मनवाने का दबाव बना रहे थे। आखिरकार वो दबाव बनाने में कामयाब हुए और बीेजेपी ने उन्हें एमएलसी बनने का तोहफा भी दे दिया। हालांकि इस दौरान यूपी के मुख्य चुनाव प्रभारी धर्मेंद्र प्रधान ने कहा था कि संजय निषाद के साथ सीटों को लेकर बातचीत हो गई है। उन्हें सम्मानजनक सीटें दी जाएंगी।












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