एक दशक में कितनी बदली अखिलेश यादव की राजनीति की दशा और दिशा, जानिए

लखनऊ, 17 फरवरी: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव अपने चरम पर है। चुनाव के लिहाज से सभी दल अपनी रणनीति पर काम कर रहे हैं लेकिन आज हम बात करेंगे अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी की। अखिलेश यादव ने एक दशक पहले यूपी में एक सकारात्मक राजनीति की शुरूआत की थी। यूपी को पहली बार एक युवा मुख्यमंत्री मिला था। जनता को बड़ी उम्मीदें थीं।अखिलेश यादव तब कन्नौज से सांसद हुआ करते थे लेकिन 2012 के चुनाव में सपा को प्रचंड बहुमत मिला और पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने अपने बेटे को यूपी का सीएम बनाने का फैसला कर लिया। अखिलेश सीएम तो बन गए लेकिन पिछले एक दशक की राजनीति में उन्हें 'अंदर' से लेकर 'बाहर' तक कई मोर्चों पर जूझना पड़ा। हालत यह हुई कि 2017 के चुनाव में सत्ता हाथ से फिसल गई।

एक परिवार की पार्टी होने के ठप्पे से बाहर निकलने की कोशिश

एक परिवार की पार्टी होने के ठप्पे से बाहर निकलने की कोशिश

समाजवादी पार्टी आज भी यादवों की पार्टी मानी जाती है और साथ ही उस पर परिवार पार्टी होने का ठप्पा भी जोर से लगता है, वह भी अकारण नहीं। मुलायम सिंह यादव के लंबे परिवार में लगभग दो दर्जन लोग सक्रिय राजनीति का हिस्सा रहे हैं, जिनमें मुलायम सिंह, उनके भाई, परिवार, बेटा, भतीजा, पोता, बहू और अन्य रिश्तेदार शामिल हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव के नतीजों में अखिलेश परिवार से पांच सांसद थे। उन्होंने 2017 के विधानसभा चुनाव और फिर 2019 के लोकसभा चुनाव में पारिवारिक छवि को नुकसान पहुंचाया। 2017 के विधानसभा चुनाव में करीब चालीस फीसदी सीटें यादवों और मुसलमानों को दी गई थीं। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक जनसभा में कहा था कि इन अतिवादी परिवार के सदस्यों से राज्य को काफी नुकसान हुआ है। अखिलेश इस बार न सिर्फ यादवों और मुसलमानों से दूरी बना रहे हैं, बल्कि गैर-यादवों और ब्राह्मणों से भी नजदीकियां दिखाने की कोशिश की है। ब्राह्मणों को प्रसन्न करने के लिए उन्होंने परशुराम की मूर्ति का अनावरण भी किया है।

यादव की बजाए ओबीसी पर पकड़ बनाने पर फोकस

यादव की बजाए ओबीसी पर पकड़ बनाने पर फोकस

इस छवि को तोड़ने के लिए अखिलेश ने टिकट देकर भी जाति संतुलन बनाने की कोशिश में यादवों के अलावा गैर यादव ओबीसी के साथ छोटी पार्टियों में शामिल होने की पहल की। वैसे भी यूपी में 12 फीसदी यादवों के साथ सरकार बनाना मुश्किल काम है, इसलिए 30 फीसदी ओबीसी में से अपने लिए हिस्सा लेना जरूरी है। उम्मीदवारों की सूची में यादवों और मुसलमानों को कम महत्व दिया गया, साथ ही यादव परिवार के सदस्यों को चुनाव प्रचार में नहीं रखा गया है। इससे पहले मुलायम सिंह यादव, शिवपाल यादव, राम गोपाल और धर्मेंद्र यादव के अलावा डिंपल यादव चुनाव प्रचार में नजर आ चुकी हैं, लेकिन इस बार उन्हें दूर रखा गया है।

शिवपाल के अलावा किसी को टिकट नहीं

शिवपाल के अलावा किसी को टिकट नहीं

यादव परिवार में अखिलेश के चाचा शिवपाल यादव को छोड़कर किसी को भी विधानसभा चुनाव का टिकट नहीं दिया गया था। शिवपाल यादव ने अपनी अलग पार्टी बना ली थी और सौ सीटों पर चुनाव लड़ना चाहते थे, लेकिन अखिलेश ने ही उन्हें टिकट दिया। उनके बेटे को भी टिकट नहीं मिला है। शिवपाल यादव खुद गुन्नौर सीट से और उनके बेटे आदित्य जसवंत नगर से चुनाव लड़ना चाहते थे, लेकिन अखिलेश ने जसवंत नगर से शिवपाल को ही टिकट दिया। पिछली बार लखनऊ से चुनाव हार चुके धर्मेंद्र यादव के भाई अनुराग यादव को टिकट नहीं दिया गया था। यादव परिवार की बहू को टिकट नहीं देने पर सहमति बनी, इसलिए डिंपल यादव चुनाव नहीं लड़ रही हैं। जबकि टिकट को लेकर मची मारामारी के बीच अपर्णा यादव ने समाजवादी पार्टी छोड़ दी थी।

परिवारवालों को टिकट से दूर रखा

परिवारवालों को टिकट से दूर रखा

एक अन्य चचेरे भाई और पूर्व सांसद तेज प्रताप को भी टिकट चाहिए था लेकिन नहीं दिया गया। एक अन्य चचेरे भाई अंशुल को भी टिकट नहीं मिला। परिवार में धर्मेंद्र यादव, तेज प्रताप, अक्षय और डिंपल यादव पिछली बार लोकसभा चुनाव नहीं जीत पाए थे, लेकिन विधानसभा चुनाव में किसी को मौका नहीं दिया गया था। मुलायम सिंह के दोस्त हरिओम यादव पिछली बार सिरसागंज से चुनाव जीते थे, इस बार उनका टिकट कट गया तो वे बीजेपी के उम्मीदवार बने हैं। हालांकि राजनाीतिक विश्लेषकों की माने तो समाजवादी पार्टी ने एक बार फिर रणनीति में बदलाव किया है। इस बार किसी बड़ी पार्टी से दोस्ती करने के बजाय उसने छोटी पार्टियों से गठजोड़ किया है, जिससे उसे गैर-यादव ओबीसी वोट हासिल करने में मदद मिलने की उम्मीद है। यह चुनाव न सिर्फ अखिलेश की छवि बदलेगा बल्कि उन्हें पार्टी का इकलौता नेता बनाएगा। ऐसे में किसी भी नेता के लिए पुरानी छवि को तोड़ना आसान नहीं है। इस चुनाव में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव इसी प्रयास में लगे हैं कि उनकी पार्टी की छवि और खुद को एक परिवारवादी और यादवों की पार्टी से बाहर निकाला जाए।

योगी के चुनाव लड़ने से अखिलेश पर बढ़ा दबाव ?

योगी के चुनाव लड़ने से अखिलेश पर बढ़ा दबाव ?

2012 का चुनाव मुलायम सिंह के नेतृत्व में लड़ा गया था, लेकिन जब पार्टी ने 403 में से 224 सीटें जीतीं, तो मुलायम सिंह ने अचानक अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा कर दी। उस समय अखिलेश कन्नौज से सांसद थे और उन्होंने विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा था। अखिलेश पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं। उन्हें शायद यह फैसला इसलिए लेना पड़ा क्योंकि मौजूदा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विधानसभा चुनाव लड़ने की घोषणा की थी। योगी गोरखपुर से विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं। 2017 के चुनाव में बीजेपी को बहुमत मिलने के बाद योगी आदित्यनाथ का मुख्यमंत्री बनना तय हुआ, तब वे गोरखपुर से भी सांसद थे। फिर विधानसभा पहुंचने के लिए विधान परिषद का रास्ता अपनाया, जैसे अखिलेश ने 2012 में किया था। इस बार मौजूदा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और समाजवादी पार्टी के सीएम चेहरे अखिलेश दोनों ही प्राथमिकी के लिए विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं।

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