मायावती के सामने बसपा का वजूद बचाने की चुनौती; परिवार को भी आजमाया, वोट बचाने के लिए चला उत्तराधिकार का दांव ?
लखनऊ, 28 अगस्त: उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने यह साफ कर दिया है कि उनका अगला उत्तराधिकारी कोई दलित ही होगा। यानी बसपा का अगला चीफ कोई दलित ही होगा। लेकिन सवाल यह है कि मायावती के बाद उनका उत्तराधिकारी बनने लायक कौन हैं। राजनीतिक विश्वलेषकों की माने तो सारे नामी चेहरे और विश्वासपात्र लोग तो उनका साथ छोड़ चुके हैं। उनके पास फिलहाल दलित चेहरे के तौर पर कोई ऐसा नाम नहीं है जिसे आगे बढ़ा सकें। हालांकि वो अपने भाई आनंद कुमार और भतीजे आकाश को भी संगठन में शामिल कर मौका दे चुकी हैं लेकिन वो कुछ करिश्मा नहीं दिखा पाए। राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो चुनाव सिर पर देखते हुए अब मायावती ने वोट बैंक को सहेजने की लिए उत्तराधिकार का यह दांव चला है।

मायावती ने सोशल इंजीनियरिंग के बूते पर पहली बार 2017 में सरकार बनाने में सफल रहीं थीं। तब उन्हें अपने बल पर बहुमत मिला था। उस समय मायावती के साथ कई नामी चेहरे जुड़े थे। पूर्व कैबिनेट मंत्री रामअचल राजभर, पूर्व मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा, वर्तमान में भाजपा सरकार में मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य, बसपा के कोआर्डिनेटर रहे जुगुल किशोर, पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी समेत कई बड़े नेता अब उनके साथ नहीं हैं। ये सभी लोग मायावती के विश्वासपात्रों में गिने जाते थे। मायावती के शासन में इन नेताओं की तूती बोलती थी लेकिन जैसे ही 2012 में मायावती के हाथ से सत्ता गई, सभी लोगों ने एक एक कर मायावती का साथ छोड़ दिया या खुद बहनजी ने ही पार्टी से निकाल दिया।

सतीश मिश्रा के बाद कोई बड़ा नेता साथ नहीं
मायावती के साथ वर्तमान में राष्ट्रीय महासचिव सतीश मिश्रा ही एकलौते ऐसे नेता हैं जो लंबे समय से उनके साथ बने हुए हैं। बसपा पूरे प्रदेश में ब्राह्मणों को रिझाने के लिए प्रबुद्ध बर्ग सम्मेलन चला रही है। इसकी जिम्मेदारी सतीश मिश्रा ही संभाल रहे हैं। सतीश मिश्रा के बाद दूसरा ऐसा कोई नाम नहीं है जो मायावती का करीबी हो और लंबे समय से उनके साथ रहा हो। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो मायावती अब अपनी प्रासंगिकता खोती जा रही हैं। समाज में उनकी स्वीकार्यता पहले से कम हो रही है। उनके बाद ऐसा कोई नाम नहीं है जो बसपा के मूवमेंट को आगे लेकर जा सके। इसलिए मायावती के सामने यह चुनौती है कि वह बसपा की जिम्मेदारी किसके कंधे पर डालती हैं। दूसरी बात यह भी है कि मायावती के बाद दूसरा नेता कौन होगा जिसकी सतीश मिश्रा उतनी ही कद्र करेंगे जितनी की मायावती की करते हैं।
राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार अवनीश त्यागी कहते हैं कि,
'' बसपा प्रमुख के सामने राजनीतिक और व्यक्तिगत दोनों तरह के उत्तराधिकार का संकट है। मायावती का राजनीतिक उत्तराधिकारी कौन होगा यह तो जनता ही तय करेगी। जिस तरह से लोहिया का उत्तराधिकारी उनके परिवार से न होकर कोई बाहर का हो गया। उसी तरह यह कहना कि बसपा का उत्तराधिकारी दलित ही होगा यह तो ठीक है लेकिन चेहरा कौन होगा, जनता उसको स्वीकार करेगी या नहीं करेगी, इस बात पर भी निर्भर करेगा।''
मायावती के सामने बसपा का वजूद बचाने की चुनौती
बसपा की मुखिया मायावती के सामने कई चुनौतियां मुंह बाए खड़ी हैं। जिस तरह से भाजपा और आरएसएस ने मिलकर मायावती के अंबेडकर अभियान को अपने एजेंडे में शामिल किया उससे दलितों के अंदर भी भटकाव आ रहा है। पीएम मोदी ने एक दलित को देश का राष्ट्रपति बना दिया इसके बाद मायावती का कद और भी घट गया। इससे भाजपा को लेकर जनता के बीच एक अच्छा संदेश गया और भाजपा के पास यह बताने के लिए हो गया कि वही दलितों की सबसे हितैषी है। पिछले दो चुनावों से बसपा का कद भी लगातार घट रहा है। पिछला विधानसभा चुनाव हो या फिर लोकसभा का चुनाव बसपा की सीटें लगातार घटती गईं। इसने बसपा को चिंता में डाल दिया है।

त्यागी कहते हैं कि,
'' दरअसल मायावती के मन में यह भी डर पैदा हो गया था कि दलितों के भीतर यह बात सिर उठा रही है कि पार्टी में नंबर दो की हैसियत रखने वाले सतीश मिश्रा अब हावी हो रहे हैं। पिछले कुछ समय से मिश्रा ही सक्रिय तौर पर दिखाई दे रहे थे। दलित समाज को लग रहा था कि अब मायावती के असली राजनीतिक उत्तराधिकारी सतीश मिश्रा ही हैं। इसी भ्रम को तोड़ने के लिए मायावती ने यह कदम उठाया है ताकि दलित समुदाय के मन में जो संदेह पैदा हो रहा है उसे दूर किया जा सके।''
भाई और भतीजे को आजमा चुकी हैं मायावती
बसपा की मुखिया मायावती हालांकि अपने भाई आनंद और भतीजे आकाश को संगठन में शामिल किया था। उनको एक पहचान देने की कोशिश की थी लेकिन उनके अंदर वो काबिलियत नहीं थी कि वो समय रहते अपने आपको एक चेहरे के तौर पर विकसित कर सके। आकाश को मायावती ने लोकसभा चुनाव में साथ साथ चुनावी रैलियों में भी घुमाया था। कई जगहों पर वो मायावती की रैलियों की तैयारी करते भी देखे गए लेकिन चुनाव खत्म होने के बाद उनकी सक्रियता का पता नहीं लगा। वहीं भाई आनंद कुमार के खिलाफ जांच एजेंसियों ने शिकंजा कसा तो उनके तेवर भी ढीले पड़ गए। लाख कोशिशों के बाद भी आनंद कुमार बसपा में स्थापित नहीं हो पाए। हालांकि यह बताया जाता है कि मायावती के आर्थिक साम्राज्य का पूरा हिसाब किताब आनंद ही देखते हैं।












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