बनारस के इस प्राचीन मंदिर में तपस्या के बाद हुआ था स्वामी विवेकानंद का जन्म
आज स्वामी विवेकानंद की पुण्यतिथि है। स्वामी विवेकानंद का धर्म और आध्यात्म की नगरी काशी से खास रिश्ता था।
वाराणसी। आज स्वामी विवेकानंद की पुण्यतिथि है। स्वामी विवेकानंद का धर्म और आध्यात्म की नगरी काशी से खास रिश्ता था। काशी में गंगा नदी के किनारे सिंधिया घाट पर भगवान शिव का एक मंदिर है जिसे आत्मविरेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर से भी पुराना है। बताया जाता है कि करीब 500 वर्ष पुराने इस मंदिर में बाबा विश्वनाथ की आत्मा विराजमान रहती है। इसी मंदिर में स्वामी विवेकानंद की माता भुनेश्वरी देवी ने कठोर तपस्या की थी जिसके बाद स्वामी विवेकानंद का जन्म हुआ था।

वर्षों की तपस्या के बाद विवेकानंद का हुआ जन्म
आत्मविरेशवर महादेव मंदिर के महंत मुनमुन गुरु ने oneindia को बताया कि आज से करीब 200 वर्ष पूर्व इस मंदिर में स्वामी विवेकानंद के माता-पिता, विश्वनाथ दत्त और भुनेश्वरी देवी को पता चला था की यदि इस मंदिर में सच्चे मन से प्रार्थना और पूजा की जाए तो उनके घर पुत्र रत्न की प्राप्ति हो सकती हैं। जिसके बाद दोनों ने पुत्र रत्न के लिए इस मंदिर में अनुष्ठान कराया था। वो कई वर्षों तक इस मंदिर में लगातार आते रहे और उनके लिए यही मंदिर के गर्भ गृह में बैठ कर मेरे दादा जी आत्मविरेश्वर स्त्रोत का पाठ करते रहे क्योंकि उनके माता पिता को संतान नहीं हो रही थी। यहां पर आने के बाद स्वामी जी का जन्म हुआ इसी कारण उनका नाम आत्मविरेशवर के नाम पर विवेकानंद रखा गया था जिन्होंने बाद में सन्यास धारण कर लिया। आज भी इसी आस्था से बहुत से बंगाली परिवार के लोग यहां आते है और अपना अनुष्ठान कराते है यही नहीं वो लोग इस शिव को विरेश्वर शिव के नाम से बुलाते हैं।

यही हुआ था विवेकांनद का मुण्डन
oneindia से बात करते हुए मंदिर के महंत मुनमुन गुरु ने बताया कि उनके जन्म के बाद स्वामी जी के माता पिता ने मन्नत मांगी थी की मुंडन संस्कार बाबा के परिसर में ही कराया जाएगा। उसी मंन्नत को पूरा करने उनके पिता विश्वनाथ दत्त और माता भुनेश्वरी देवी अपने पुत्र विवेकानंद को लेकर यहां आये और मंदिर के चौक (आंगन) में उनका मुंडन संस्कार कराया जिसके बाद आत्मविरेश्वर महादेव मंदिर में रुद्राभिषेक भी कराया गया। हमारे पूर्वज बताते थे की बचपन में ही उन्हें सन्यासियों और आध्यात्म में विशेष रूचि थी। वो काशी की शक्ति को महसूस करते है और बचपन से ही सन्यास की ओर मूड़ जाना चाहते थे लेकिन क्योंकि वो उस वक्त बहुत छोटे थे इस कारण वो मुण्डन के बाद अनुष्ठान करा अपने माता पिता के साथ चले गए।

दूसरी बार आए थे 10 वर्ष की अवस्था में
विवेकानंद इस मंदिर में अपने मुण्डन के बाद 10 वर्ष की अवस्था में में दोबारा आये थे उसके बाद नहीं आये। मुनमुन गुरु बताते हैं की उनके पूर्वजो ने बताया था की वो अपने एक विशेष सिद्धि की प्राप्ति के लिए यहां आये थे और उसके बाद वो सन्यास की तरफ चले गए।












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