यूपी की सत्ता में वापसी के लिए भाजपा के सामने सपा ने खड़ी की 5 बड़ी चुनौतियां
लखनऊ, 16 दिसंबर: उत्तर प्रदेश में पहले बहुकोणीय मुकाबले होते रहे हैं। इसबार भी मुख्य रूप से चार पार्टियां या गठबंधन ही चुनाव मैदान में हैं। लेकिन, अभी तक राज्य के जो सर्वे आए हैं, उनसे लगता है कि मुख्य मुकाबला बीजेपी और समाजवादी पार्टी में ही है और सत्ताधारी दल को फिलहाल इसमें बढ़त मिलती दिखाई पड़ रही है। लेकिन, मुख्य विपक्षी पार्टी बीजेपी को कड़ी टक्कर दे रही है। बाकी बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस भी मैदान में है, लेकिन वे अभी तक रेस में नजर नहीं आ रही हैं। हालांकि चुनावों में अभी कम से कम दो महीने बाकी हैं, ऐसे में अभी का कोई भी आकलन पूरी तरह से बदल जाने की भरपूर संभावना है।

चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में भाजपा को बढ़त
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर अभी तक जितने भी ओपिनियन पोल या चुनाव पूर्व सर्वेक्षण आए हैं, सब में भारतीय जनता पार्टी को बाकियों के मुकाबले बेहतर स्थिति में बताया गया है। लेकिन, सभी सर्वे से यह भी साफ हो रहा है कि बीजेपी के सामने समाजवादी पार्टी ही सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ी है। अखिलेश यादव की विजय यात्रा में उमड़ रही भीड़ भी इसी की ओर इशारा कर रही है कि जो भी मतदाता विकल्प की तलाश में हैं, उन्हें सपा में उम्मीद की किरण दिखाई पड़ रही है। कम से कम चुनाव आयोग की ओर से तारीखों के ऐलान से पहले आजतक तो ऐसी ही स्थिति लग रही है। बहुजन समाज पार्टी ऐतिहासिक रूप से अभी तक की सबसे कमजोर स्थिति में दिखाई पड़ रही है। हालांकि, मायावती के वोटरों के बारे में कहा जाता है कि उनमें से ज्यादातर साइलेंट रहते हैं। लेकिन, इतना भी साइलेंट आश्चर्यजनक है कि कोई सुगबुगाहट ही महसूस ना हो रही हो!

भाजपा के मजबूत दिखने के क्या कारण हैं ?
प्रचार में कांग्रेस भी इसबार पूरा जोर लगा रही है। लेकिन, अभी तक की स्थिति से यही लग रहा है कि मुख्य मुकाबला बीजेपी और एसपी में ही होने जा रहा है। इस स्थिति ने प्रदेश के चुनावी समीकरण को इस वक्त तक काफी कुछ स्पष्ट कर दिया है। बीजेपी के लिए एडवांटेज ये है कि उसके पास मोदी-योगी का ब्रांड है और विकास के ऐसे चमचमाते काम, जिसको चाहकर भी विपक्ष भी नहीं नकार पा रहा। पूर्वांचल एक्सप्रेस हो या काशी विश्वनाथ कॉरिडोर अखिलेश यादव सब में अपनी योगदान के दावे करने को मजबूर हो रहे हैं। केंद्र और प्रदेश दोनों जगह एक दल की सरकार होने से जो फायदा किसी दल को मिल सकता है, उसका लाभ बेशक भारतीय जनता पार्टी को मिलता दिख रहा है। ऊपर से हिंदुत्व की धार और तुष्टिकरण विरोधी एजेंडा उसके आधार को और मजबूत कर रहा है। साथ ही साथ केंद्र और राज्य सरकारों की विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के जरिए उसने माइक्रो लेवल पर जो जातीय समीकरणों को साधा है, उसने उसके वोटर बेस को बहुत ही मतबूत बना दिया है। ओपिनियन पोल और चुनाव पूर्व सर्वे भी यही बातें बता रहे हैं।
Recommended Video

भाजपा के सामने सपा की 5 बड़ी चुनौतियां
लेकिन, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव भारतीय जनता पार्टी की सरकार के सामने जो 5 बड़ी चुनौतियां खड़ी कर रहे हैं, उसमें वह अगर सफल हो गए तो बीजेपी के पक्ष में जा रहे सारे चुनाव पूर्व सर्वे हवा हो सकते हैं। ये पांच चुनौतियां हैं- पश्चिमी यूपी में राष्ट्रीय लोक दल, पूर्वांचल में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, बसपा से कथित तौर पर छिटकने वाले दलित वोटर, बेरोजगारी और सबसे बढ़कर जातीय जनगणना का मुद्दा। अखिलेश यादव ने चुनाव से पहले यह कहकर कि उन्हें डिप्टी सीएम के पद से ऐतराज नहीं है, नए समीकरण को ही सशक्त करने की कोशिश है। ताकि, जयंत चौधरी और ओम प्रकाश राजभर के समर्थक उनके पीछे पूरी तरह से लामबंद रहें। पिछले तीन चुनावों 2014 और 2019 में लोकसभा और 2017 में यूपी विधानसा चुनाव में भाजपा प्रदेश में सोशल इंजीनियरिंग करने में सभी जातिवादी दलों पर भारी पड़ी है। लेकिन, पश्चिमी यूपी में जाट, पूर्वांचल में राजभर, मायावती से कथित मायूस दलित वोटर और जातीय जनगणना ऐसे मुद्दे हैं, जिसको लेकर अगर सपा, बीजेपी को साधने में सफल हो गई तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की निजी शख्सियत और विकास के एजेंडे के सामने भी मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। युवा वोटरों में रोजगारी का एक मुद्दा तो हमेशा से रहा ही है। वैसे बीजेपी ने पूर्वांचल में छोटी-छोटी जाति आधारित पार्टियों से तालमेल जरूर किया है और पीएम मोदी ने वाराणसी में राजभरों को भी साधने की कोशिश की है, लेकिन अखिलेश इसे तोड़ने में पूरी कोशिश लगा रहे हैं।

यूपी में सपा के सामने सवाल
लेकिन, फिर भी समाजवादी पार्टी यादव-मुस्लिम गठजोड़ के अलावा बाकी समीकरण भी अपने हिसाब से साध लेगी और सत्ताधारी बीजेपी बैठी रह जाएगी, यह नहीं कहा जा सकता। क्योंकि, दोनों दलों के बीच वोटों का जो फासला है, उसमें बीजेपी का पलड़ा भारी है। 2012 में जब समाजवादी पार्टी जबर्दस्त जीत के साथ पूर्ण बहुमत लेकर सत्ता में आई थी और उसे 224 सीटें मिली थीं, तब भी वह महज 29% वोट ले पाई थी। लेकिन, 2017 में बीजेपी की अगुवाई में एनडीए को 42% वोट मिले थे और वह 312 सीटें जीती थी। 2019 में बसपा के साथ गठबंधन की वजह से सपा अगर मायावती से मायूस दलित वोटरों से उम्मीद लगाए बैठी है तो बीजेपी ने 2014 से उनपर कम डोरे नहीं डाले हैं। अलबत्ता बीएसपी के पास जो भी मुस्लिम वोटर बचे हैं, वह जरूर साइकिल की ओर रुख कर सकते हैं।

प्रियंका कोशिश तो खूब कर रही हैं...लेकिन
कांग्रेस उत्तर प्रदेश में इस बार काफी मेहनत कर रही है। प्रियंका गांधी 'लड़की हूं, लड़ सकती हूं' वाला नारा देकर अपनी दादी के वक्त की भावनाएं यूपी के महिला वोटरों में उभारना चाहती हैं। पार्टी चुनाव प्रचार पर भी पूरी खर्च कर रही है। प्रियंका पूरा हौसला दिखा रही हैं और इसलिए 40% टिकट महिलाओं को देने का ऐलान कर चुकी हैं। लेकिन, जमीनी हकीकत उनका साथ देने के लिए तैयार नहीं है। उनके पास महिला आवेदकों की संख्या ही कम है तो फिर किसी को भी महिला के नाम पर टिकट दे देने से पार्टी सबसे बड़े राज्य में कितना दम दिखा पाएगी, अंदाजा ही लगाया जा सकता है। इस समय तक प्रियंका हों या मायावती दोनों की ही पार्टियां प्रदेश में गंभीर प्रतिद्वंद्वी के तौर पर नहीं उभर पा रही हैं। बहरहाल, अभी तारीखों की घोषणा नहीं हुई है, इसलिए भविष्य के बारे में दावे से कुछ कह देना सही नहीं है।












Click it and Unblock the Notifications