UP में हार का 'चौका' लगा चुकी है सपा, इन झटकों से पार्टी को कैसे उबारेंगे अखिलेश यादव
लखनऊ, 28 सितंबर: उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) का दो दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन शुरू हो गया है। पहले दिन जहां राज्य सम्मेलन में सपा ने प्रदेश अध्यक्ष के नाम पर मुहर लगाई वहीं दूसरी ओर गुरुवार को राष्ट्रीय अधिवेशन में अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) को तीसरी बार सपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना जायेगा। 2012 में चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री बनने वाले अखिलेश यूपी में लगातार चार चुनाव हार चुके हैं। सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या अखिलेश यादव पार्टी को मिल रही हार के झटकों से उबार पाएंगे। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो 2022 में अखिलेश के पास मौका था लेकिन उन्होंने उसे गंवा दिया। यादव-मुस्लिम गठबंधन सपा की सीटें तो बढ़ा सकता है लेकिन उन्हें सत्ता नहीं दिला सकता। इसलिए ये जरूरी है कि अखिलेश अपने साथ सवर्णों और गैर यादव ओबीसी को जोड़ने पर काम करें।

2012 में यूपी के सीएम बने थे अखिलेश
उत्तर प्रदेश में 2012 में हुए विधानसभा चुनाव में शानदार जीत हासिल करने वाली समाजवादी पार्टी ने मुलायम सिंह के चेहरे पर चुनाव लड़ा था। चुनाव में बीएसपी को हराकर पूर्ण बहुमत हासिल किया था। चुनाव के बाद हालाकि मुलायम सिंह यादव ने अखिलेश को सीएम बना दिया था। उस समय पूरे उत्तर प्रदेश में अखिलेश को लेकर एक सकारात्मक संदेश गया था। मुलायम सिंह के एक युवा को सत्ता सौंपने की सभी तारीफ कर रहे थे। अखिलेश के ऊपर उम्मीदों का पहाड़ लद गया था। तब माना गया था कि मुलायम सिंह का ये फैसला दूरगामी साबित होगा और अखिलेश पार्टी को आगे ले जाने में कामयाब होंगे।

2 साल बाद ही अखिलेश को लगा पहला झटका
यूपी में 2012 में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में शानदार जीत हासिल करने वाली समाजवादी पार्टी को पहला झटका 2014 के लोकसभा चुनाव में ही लग गया था। लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने अपना दल के साथ मिलकर यूपी में 73 लोकसभा सीटें जीतने का करनामा कर दिखाया। समाजवादी पार्टी के खाते में केवल 5 सीटें ही गईं थीं। बीएसपी का खाता नहीं खुला और कांग्रेस केवल रायबरेली और अमेठी के गढ़ ही बचा पाई थी। बीजेपी ने ये करिश्मा उस समय किया था जब अमित शाह को यूपी बीजेपी का प्रभारी बनाया गया था। बीजेपी की इस जीत के बाद अमित शाह का भी कद बढ़ता चला गया। लोकसभा चुनाव में मिली हार से अखिलेश यादव की इमेज को काफी डेंट लगा था। बीजेपी के दिए इस झटके से अखिलेश अभी तक उबर नहीं पाए हैं।

2017 में बीजेपी ने अखिलेश से सत्ता छीनी
उत्तर प्रदेश में 2014 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश को काफी बड़ा झटका लगा था। समाजवादी पार्टी नए सिरे से अपने संगठन को मजबूत करने में जुटी थी। 2017 के विधानसभा चुनाव में जाने से पहले अखिलेश यादव ने सपा की सरकार को एक विकासपरक सरकार के तौर पर पेश करने की कोशिश की थी। समाजवादी पार्टी के 'काम बोलता है' नारे के साथ 2017 के चुनावी समर में उतरने का फैसला किया था। तब तक अखिलेश की तरकश में कई उपलब्धियां आ चुकी थीं लेकिन दूसरी तरफ अखिलेश को अपने ही घर में अंदरूनी संघर्ष से जूझना पड़ा। अखिलेश को घर में पड़ी फूट की बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। हालाकि अखिलेश पूरे आत्मविश्वास के साथ मैदान में उतरे लेकिन बीजेपी या यूं कहें की मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने अखिलेश यादव के दोबारा सरकार बनाने के सपनों पर पानी फेर दिया और लंबे बनवास के बाद यूपी में बीजेपी की सरकार बन गई।

2019 के लोकसभा चुनाव में फेल हुई अखिलेश की रणनीति
उत्तर प्रदेश में लगातार दो चुनाव में हार का सामना कर चुके अखिलेश 2019 के लोकसभा के चुनाव में नए प्रयोग के साथ मैदान में उतरे। अखिलेश को विश्वास था की उनकी ये रणनीति कामयाब होगी और वो बीजेपी को हराने में कामयाब होंगे। अखिलेश ने नई रणनीति के तहत बीजेपी को हराने के लिए बीएसपी का साथ पकड़ा और मायावती के साथ मिलकर लोकसभा का चुनाव लड़ने का फैसला किया था। बीएसपी और एसपी के बीच हुए गठबंधन के बाद दावे किए जा रहे थे कि 2019 लोकसभा चुनाव में बीजेपी साफ हो जाएगी। चुनाव के बाद नतीजे फिर चौकाने वाले आए और मायावती और अखिलेश यादव की एकजुटता भी बीजेपी को हरा नहीं पाई। इस लोकसभा चुनाव में बीएसपी को 10, एसपी को 5 और कांग्रेस को केवल एक सीट से संतोष करना पड़ा था। बीजेपी को 64 सीटें मिली थीं।

2022 में अखिलेश के गठबंधन का फॉर्मूला भी नहीं चला
उत्तर प्रदेश में 2014, 2017 और 2019 के चुनाव में हार का झटका खा चुके अखिलेश 2022 के चुनाव में नई रणनीति के साथ सामने आए। अखिलेश ने इस चुनाव में बीजेपी को हराने के लिए छोटे दलों के साथ गठबंधन का फॉर्मूला अपनाया। अखिलेश ने चुनाव के दौरान सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, महान दल और आरएलडी जैसे दलों के साथ गठबंधन किया। अखिलेश ने एक तरफ जहां पश्चिम में बीजेपी को हराने के लिए जयंत चौधरी को साधा वहीं पूर्वांचल का गणित सुधारने के लिए ओम प्रकाश राजभर के साथ गठबंधन किया। बीजेपी भी अखिलेश की रणनीति का जवाब बड़े ही सधे अंदाज में दे रही थी। चुनाव के बाद जब परिणाम आए तो अखिलेश की सीटें दो गुनी जरूर हो गईं लेकिन बीजेपी यूपी में 37 साल के बाद लगातार दोबारा सरकार बनाने में कामयाब हो गई। अखिलेश के लिए ये चौथा चुनावी झटका था।

लगातार मिले चुनावी झटकों से कैसे उबरेंगे अखिलेश ?
अखिलेश यादव अब यूपी की राजनीति में नए नहीं हैं। लगातार चार चुनावी झटकों के बाद अब भी वो बीजेपी को हराने के दावे कर रहे हैं लेकिन ये कारनामा कैसे होगा इसका जवाब समाजवादी पार्टी के पास नहीं है। सपा के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने कहा, ''बीजेपी से पार पाने के लिए बीजेपी की तरह सोचना पड़ेगा। बीजेपी यूपी में लगातार चुनाव जीत रही है लेकिन 2012 के बाद से ही बीजेपी ने यूपी में चार बार अपने प्रदेश अध्यक्ष बदल दिए। समाजवादी पार्टी में फिर उसी चेहरे को वापस बैठा दिया गया। इससे पार्टी के कार्यकर्ताओं और नेताओं में क्या संदेश जाएगा ?'' हालाकि यूपी के वरिष्ठ पत्रकार विजय शंकर पंकज कहते हैं कि, '' अखिलेश के पास 2022 के चुनाव में सत्ता में वापस आने का बड़ा मौका था लेकिन उन्होंने गंवा दिया। एक बात साफ है कि यूपी में सिर्फ मुस्लिम-यादव को जोड़ने से सीटें तो बढ़ जाएंगी लेकिन सत्ता नहीं मिलेगी। सत्ता में वापसी के लिए और बीजेपी को हराने के लिए अखिलेश को गैर यादव ओबीसी को साधने के साथ ही सवर्णों को भी जोड़ना होगा। जब तक इस फार्मूले पर अखिलेश आगे नहीं बढ़ेंगे तब तक उन्हें अपेक्षित सफलता मिलनी मुश्किल है।''












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