चाचा शिवपाल की 10 साल पहले वाली वो सलाह जिस पर अमल कर अखिलेश ने बदल दी थी सपा की इमेज
इलाहाबाद। उत्तर प्रदेश की राजनीति में कुछ गिने चुने कद्दावर नेताओं का जिक्र हमेशा होता रहता है और ऐसा ही एक कद शिवपाल यादव का भी रहा है। भले ही आज अखिलेश यादव और शिवपाल के बीच दूरियां अपने चरम पर हों लेकिन, अखिलेश यादव ने चाचा शिवपाल की एक ऐसी बात मानी थी जिससे अखिलेश यादव को खासी लोकप्रियता मिली थी। या यूं कहें कि पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान शिवपाल यादव के लिए गए पूर्व फैसले को अमल में लाने पर अखिलेश यादव राजनीतिक चरित्र में पूरी तरह से हिट हो गए थे।

दरअसल, बाहुबली अतीक अहमद को समाजवादी पार्टी से साइडलाइन किए जाने का जिक्र पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान ही समझा जाता है। जब अखिलेश यादव ने अतीक अहमद का टिकट काट दिया था लेकिन, इसकी स्क्रिप्ट कई साल पहले शिवपाल यादव ने ही लिखी थी। जब शिवपाल यादव के भारी दबाव के कारण अतीक अहमद को पार्टी से बाहर किया गया था। परन्तु, अतीक अहमद पार्टी में वापस आए और फिर से अपने राजनैतिक कैरियर को आगे बढ़ा रहे थे। लेकिन चाचा शिवपाल की पुरानी सलाह को अमल में लाते हुए अखिलेश यादव ने अतीक अहमद को पार्टी से मिल रहे राजनीतिक संरक्षण को समाप्त कर दिया था और उनके सपा में रहे अस्तित्व को भी लगभग शून्य कर दिया था पर ऐसा ही कुछ अब शिवपाल यादव के साथ भी हुआ है और वह भी पार्टी से पूरी तरह साइडलाइन होने के बाद नई पार्टी बना कर सामने आए हैं।
तब अतीक हो गये थे साइडलाइन
2004 आते-आते जब अतीक अहमद की तूती इलाहाबाद समेत पूरे यूपी में बोल रही थी और अतीक विधायक से सांसद बन गये। उस वक्त शिवपाल यादव ही थे जो अतीक की बढ़ती ताकत और उससे पार्टी को होने वाले नुकसान की गुणा गणित का आकलन कर मुलायम सिंह यादव को लगातार सचेत कर रहे थे। लेकिन अतीक अहमद पर मुलायम सिंह की कृपा बरसती रही। इसी बीच 2005 में अतीक अहमद के इस्तीफा देकर सांसद बनने के बाद खाली हुई इलाहाबाद पश्चिमी विधानसभा सीट पर उपचुनाव हुआ।
इस उपचुनाव में बसपा की ओर से राजू पाल प्रत्याशी बने और बड़े ही आश्चर्यजनक तरीके से राजू पाल ने अतीक अहमद के तिलिस्म को इस सीट से खत्म कर दिया और शहर पश्चिमी विधानसभा से जीतकर विधायक बन गए। लेकिन 25 जनवरी 2005 को राजू पाल की दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई और उस हत्या का इल्जाम अतीक अहमद पर आया। इसके बाद ही शिवपाल यादव ने अतीक अहमद उस साइड लाइन करने के लिए कई बार सपा मुखिया मुलायम सिंह को कहा। लेकिन, अतीक अहमद के बड़े कद व मुस्लिमों के बीच उनकी हाईप्रोफाइल लोकप्रियता के चलते उन्हें पार्टी से नहीं निकाला गया।
हालांकि माहौल तब बदला जब 2007 में मायावती की सरकार बनी और राजू पाल हत्याकांड समेत कई पुराने मामले खोलकर मायावती ने अतीक की मुश्किलें पूरी तरह से बढ़ा दीं। इस बीच समाजवादी पार्टी की भी जमकर किरकिरी होने लगी। क्योंकि अतीक अहमद समाजवादी पार्टी से सांसद थे और सपा उन पर कोई कार्रवाई नहीं कर रही थी। इससे समाजवादी पार्टी की छवि को भारी नुकसान पहुंच रहा था और जब शिवपाल यादव ने सीधे तौर पर अपना विरोध जताया तो अतीक अहमद को पार्टी से बाहर कर दिया गया।
हालांकि बाद में फिर से अतीक अहमद की सपा में वापसी हुई। लेकिन, चाचा के बताए नक्शे कदम पर ही अखिलेश यादव ने अतीक अहमद से दूरी बनाए रखी और बीते विधानसभा चुनाव के दौरान कानपुर कैंट से प्रत्याशी घोषित होने के बाद उनका पहले टिकट काट दिया और फिर राजनीतिक संरक्षण खत्म होते ही वह जेल की चारदीवारी में कैद हो गए। अखिलेश यादव का यह फैसला राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण पर रोकथाम की दिशा में बड़े कदम के तौर पर भी देखा जाता है। हालांकि इस फैसले से होने वाले फायदे व नुकसान का सबसे पहले आकलन शिवपाल यादव ने ही किया था। फिलहाल यह वह सलाह थी जिसे अखिलेश यादव ने माना था।
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