Samajwadi Party National Executive: क्या अखिलेश यादव ने चाचा शिवपाल को दिया मैनपुरी जिताने का इनाम ?
Samajwadi Party National Executive: राजनीतिक गलियारे में यह भी चर्चा है कि राष्ट्रीय महासचिव बनाए जाने के बावजूद शिवपाल का कद एक तरह से घटा ही है। इसी लिस्ट में उनके धुर विरोधी प्रो रामगोपाल उनसे बड़ी जिम्मेदारी दी गई है

Samajwadi Party National Executive: उत्तर प्रदेश के पूर्व सीएम और समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने रविवार को नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी (Samajwadi Party New Executive) का ऐलान किया है। इस ऐलान में सबकी निगाहें शिवपाल यादव पर ही टिकी थीं। शिवपाल को अखिलेश ने राष्ट्रीय महासचिव तो बना दिया है लेकिन वह इस सूची में पांचवें नंबर पर हैं। हालांकि राजनीतिक राजनीतिक गलियारे में इस बात की चर्चा हो रही है कि क्या अखिलेश यादव ने शिवपाल को मैनपुरी लोकसभा जिताने का इनाम दिया है। हालांकि कुछ राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो शिवपाल के लिए सपा में जाना घाटे का सौदा ही साबित हुआ है।

भतीजे ने दिया चाचा को मैनपुरी जीतने का इनाम
उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद मैनपुरी सीट खाली हुई थी। इस सीट पर सपा ने अखिलेश की पत्नी डिंपल यादव को मैदान में उतारा था। उस समय ऐसी अटकलें लगाईं जा रहीं थीं कि शिवपाल यादव सपा की बजाए बीजेपी का साथ दे सकते हैं। लेकिन ऐन वक्त पर डिंपल यादव ने शिवपाल यादव से बात की और और चाचा-भतीजे के बीच गिले शिकवे दूर हो गए। इसके बाद शिवपाल ने पूरी ताकत के साथ डिंपल के लिए प्रचार किया और डिंपल यह चुनाव दो लाख से अधिक मतों से जीतने में कामयाब रहीं। इस जीत के बाद अखिलेश-शिवपाल के रिश्तों में और मजबूती आई। पहले ही ऐसी अटकलें लगाईं जा रहीं थीं कि शिवपाल को जल्द ही अखिलेश कोई बड़ी जिम्मेदारी दे सकते हैं।
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अखिलेश की कार्यकारिणी मे पांचवें नंबर पर शिवपाल
हालांकि यूपी के राजनीतिक गलियारे में यह भी चर्चा है कि राष्ट्रीय महासचिव बनाए जाने के बावजूद शिवपाल का कद एक तरह से घटा ही है। इसी लिस्ट में उनके धुर विरोधी प्रो रामगोपाल को प्रधान राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया है। यानी शिवपाल को उनके नीचे ही काम करना होगा। सपा को करीब से जानने वाले पंकज कुमार यादव कहते हैं कि दरअसल शिवपाल को जो पद दिया गया है वह उनके हिसाब से कोई खास महत्व वाला नहीं है क्योंकि सपा में कई राष्ट्रीय महासचिव बनाए गए हैं उनमें से एक वो भी है। इसका मतलब ये है कि वो संगठन में कोई खास भूमिका में नहीं रहेंगे जिस तरह मुलायम के समय में रहते थे। मुलायम ने अपने परिवार में हमेशा तालमेल बनाए रखा था।

क्या शिवपाल के लिए रहा घाटे का सौदा
राजनीतिक जानकारों की माने तो राष्ट्रीय महासचिव बनाया जाना एक तरह से शिवपाल के लिए घाटे का सौदा ही है। शिवपाल प्रसपा में राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। सपा में आने के बाद अब उनकी हैसियत एक पदाधिकारी से ज्यादा की नहीं रहेगी। पहले वह मुलायम के समय में प्रदेश अध्यक्ष हुआ करते थे। कई बड़े फैसले आसानी से लिया करते थे लेकिन इस टीम में उनकी उतनी नहीं चलेगी जितनी पहले चलती थी। सबसे बड़ा सवाल है कि राष्ट्रीय महासचिव बनने के बाद अब उनपर पूरा दबाव अपने कार्यकर्ताओं और करीबीयों को संगठन में जगह दिलाने पर होगा।

6 साल बाद मिली कार्यकारिणी में जगह
शिवपाल यादव को 6 साल बाद दोबारा राष्ट्रीय कार्यकारिणी में जगह मिली है। 2017 के चुनाव से पहले ही यानी 2016 में कुनबे में पैदा हुई रार के बाद वो सपा से अलग हो गए थे और अपनी पार्टी बना ली थी। हालांकि पार्टी तो शिवपाल ने बनाई जरूर लेकिन उसका कोई राजनीतिक फायदा उनको नहीं मिल पाया। इसकी वजह यह रही कि वह पार्टी तो बनानेमं कामयाब हो गए लेकिन उनका मन पूरी तरह से सपा से ही जुड़ा रहा। इसी लिए उनको सपा के सिंबल पर ही चुनाव लड़ना पड़ा। अगल होने के बाद अपनी राजनीतिक हैसियत की थाह ले रहे शिवपाल ने कई मोर्चों पर अखिलेश के लिए परेशानी भी खड़ी की लेकिन अंत में मुलायम के निधन के बाद दोनों के बीच गिले शिकवे दूर हो गए।

प्रदेश की राजनीति में नहीं रहेगी भूमिका
सपा को करीब से जानने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार आर पी सिंह कहते हैं कि इस तरह का समायोजन शायद ही शिवपाल यादव को फायदा पहुंचा पाएगा। शिवपाल जिस तेवर वाले नेता के तौर पर जाने जाते हैं और जिस तरह से संगठन पर उनकी पकड़ है उस लिहाज से यह कुछ भी नहीं है। इस पद से एक बात तो साफ हो गई है कि अब प्रदेश में उनकी ज्यादा भूमिका नहीं रहेगी और न ही उनकी प्रदेश की राजनीति में चलेगी। अब वह राष्ट्रीय स्तर पर अपनी नई भूमिका के साथ कितना न्याय कर पाएंगे यह तो आने वाला समय ही बताएगा।












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