क्या मोदी को रोकने के लिए अखिलेश चलेंगे ये आखिरी दांव?
सपा नेता ने कहा कि सपा-बसपा गठबंधन को लेकर पहला संकेत तब मिलेगा, जब 2018 में मायावती की राज्यसभा की सदस्यता खत्म होगी।
नई दिल्ली। यूपी में भाजपा की प्रचंड जीत के बाद ज्यादातर विपक्षी दल इस बात को महसूस करने लगे हैं कि फिलहाल मोदी लहर को अकेले रोकना बेहद मुश्किल है। ऐसे में 2019 के लोकसभा चुनाव को लेकर सियासी दलों ने रणनीति बनानी शुरू कर दी है। कांग्रेस जहां महागठबंधन की संभावना तलाश रही है, वहीं यूपी की सत्ता से बाहर होने के बाद समाजवादी पार्टी अब मायावती के साथ मिलकर 2019 के चुनाव में उतरने का मन बना रही है।

3 साल के अंदर दो बड़े चुनावों में हार
इकोनॉमिक्स टाइम्स की खबर के मुताबिक समाजवादी पार्टी के ज्यादातर नेताओं का मानना है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में यूपी में भाजपा को रोकने का एकमात्र रास्ता यही है कि बसपा के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ा जाए। समाजवादी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के कई सदस्यों और यूपी विधानसभा चुनाव में पार्टी के कुछ प्रत्याशियों का भी कहना है कि 3 साल के अंदर दो बड़े चुनावों में हार के बाद अब गठबंधन पर विचार जरूरी हो गया है।

सपा-बसपा गठबंधन का पहला संकेत
सपा नेता ने कहा कि सपा-बसपा गठबंधन को लेकर पहला संकेत तब मिलेगा, जब 2018 में मायावती की राज्यसभा की सदस्यता खत्म होगी। बसपा के पास मायावती को राज्यसभा में भेजने के लिए पर्याप्त संख्या बल नहीं है। ऐसे में सपा मायावती को समर्थन देने का विकल्प चुन सकती है। सपा नेता ने बताया कि अगर ऐसा हुआ तो यह सपा-बसपा गठबंधन का पहला संकेत होगा।

अस्तित्व बचाने को जरूरी है गठबंधन
सपा सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे एक मुस्लिम नेता का कहना है कि सपा और बसपा का गठबंधन बेहद जरूरी है, नहीं तो हम हाशिए पर चले जाएंगे। हाल ही में दोबारा चुने गए सपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के 3 सदस्यों ने भी कहा कि सपा और बसपा दोनों के लिए गठबंधन अपने अस्तित्व को बचाने का मामला है। हालांकि ये नेता गठबंधन को लेकर मायावती की तरफ से आश्वस्त नहीं हैं।

मायावती की ओर से कोई संकेत नहीं
सपा के ज्यादातर नेताओं को मायावती की 'एकला चलो' की राजनीति पर ऐतराज है। सपा के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि समस्या यह है कि कोई नहीं जानता कि मायावती के दिमाग में क्या चल रहा है? यह बात बसपा नेताओं से बातचीत के दौरान भी सामने आई। सपा नेताओं के विपरीत बसपा नेताओं का कहना है कि यूपी चुनाव में पार्टी की हार के बाद उन्हें मायावती की ओर से भविष्य की राजनीति को लेकर कोई संकेत अभी तक नहीं मिला है।

गेस्ट हाउस कांड से बढ़ी दूरियां
समाजवादी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के एक वरिष्ठ सदस्य ने बताया कि 1995 में लखनऊ गेस्ट हाउस कांड के बाद मायावती और मुलायम सिहं यादव के बीच किसी भी राजनीतिक गठबंधन की संभावना खत्म हो गई थी। हालांकि अखिलेश यादव को लेकर ऐसा कोई विवाद नहीं है और मायावती भी अपने पुराने निर्णय को बदलने पर विचार कर सकती हैं। ये भी पढ़ें- मायावती के खिलाफ बगावत शुरू, नेताओं ने लगाए बड़े आरोप












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