बढ़ती उम्र, घटता पारा, क्या करे हाथी बेचारा, पहना दी लैगिंग और स्वेटर प्यारा...

मथुरा में इन दिनों हाड़ कंपा देने वाली ठंड पड़ रही है जिससे केवल इंसान ही नहीं बल्कि गजराज भी परेशान हैं, इसलिए उन्हें सर्दी से बचाने के लिए भारी-भरकम जैकेट पहनाए जा रहे हैं।

मथुराहाथी राजा बहुत बड़े, सूंड़ हिलाते कहां चले.. मेरे घर भी आओ ना, हलवा-पूूड़ी खाओ ना...ये कविता हर किसी ने अपने बचपन में पढ़ी होगी इसलिए जब भी इंसान के सामने गजराज आते हैं, तो बरबस लोगों का अपना बचपन और ये पंक्तियां याद आ जाती हैं लेकिन आपको पता है कि आजकल आपके प्यारे हाथी हलवा-पूूड़ी ही नहीं खा रहे हैं बल्कि वो लोगों की तरह स्वेटर और पजामी भी पहन रहे हैं।

हाड़ कंपा देने वाली ठंड में गजराज भी परेशान हैं

जी हां, ये सब हो रहा है बंसीवाले की नगरी यानी की मथुरा में, जहां इन दिनों हाड़ कंपा देने वाली ठंड पड़ रही है जिससे केवल इंसान ही नहीं बल्कि गजराज भी परेशान हैं, इसलिए उन्हें सर्दी से बचाने के लिए भारी-भरकम जैकेट पहनाए जा रहे हैं।

हाथियों को लग रही है ठंड

हाथियों को लग रही है ठंड

मथुरा के फरह स्थित चुरमुरा एलीफैंट रेस्क्यू सेंटर पर 60 साल की आशा (हथिनी) के लिए जैकेट बनाई गई। उम्र के आखिरी पड़ाव पर पहुंच चुकीं सूसी, लाकी, फूलकली, ईका व केडी के लिए भी जैकेट तैयार किए जा रहे हैं। कारीगर इनके लिए कंबल व रेग्जीन का इस्तेमाल करते हैं।

आपको बता दें कि चुरमुरा एलीफैंट रेस्क्यू केंद्र में 13 हथिनी व 7 हाथी हैं। इनमें से छह हथिनियों की उम्र तो 60 साल से ऊपर है। इस बार तापमान बहुत नीचे चला गया। इस कारण इन्हें बहुत परेशानी हो रही है। ऐसे में बूढ़ी हथिनियों का विशेष ध्यान रखा जा रहा है।

13 हथिनी व 7 हाथी हैं

13 हथिनी व 7 हाथी हैं

आपको बता दें कि चुरमुरा एलीफैंट रेस्क्यू केंद्र में 13 हथिनी व 7 हाथी हैं। इनमें से छह हथिनियों की उम्र तो 60 साल से ऊपर है। इस बार तापमान बहुत नीचे चला गया। इस कारण इन्हें बहुत परेशानी हो रही है। ऐसे में बूढ़ी हथिनियों का विशेष ध्यान रखा जा रहा है।

20 मीटर रेग्जीन से जैकेट बनाई जा रही

20 मीटर रेग्जीन से जैकेट बनाई जा रही

कारीगरों द्वारा हर एक के लिए छह कंबल व 20 मीटर रेग्जीन से जैकेट बनाई जा रही हैं। एक जैकेट तैयार होने में पांच दिन लग जाते हैं।

गर्म तासीर वाला भोजन

गर्म तासीर वाला भोजन

प्रोजेक्ट डायरेक्टर डॉ. बैजू राज ने बताया कि इसके साथ ही इन्हें गर्म तासीर वाला भोजन दिया जा रहा है। खाने के लिए गुड़, लहसुन, अदरक और बाजरे का दलिया दिया जाता है।

ठंड से बचाने के लिए विशेष टिन शेड बनाए गए हैं

ठंड से बचाने के लिए विशेष टिन शेड बनाए गए हैं

ठंड से बचाने के लिए विशेष टिन शेड बनाए गए हैं, जो तीन तरफ से ढ़के हुए हैं। रात में सभी हाथियों के ऊपर कंबल डाले जाते हैं। इसके अलावा हर हाथी के शेड में चार सोलर लाइट लगी हैं।

2010 में यह संरक्षण केंद्र शुरू किया गया

2010 में यह संरक्षण केंद्र शुरू किया गया

वाइल्ड लाइफ-एसओएस द्वारा 2010 में यह संरक्षण केंद्र शुरू किया गया। 55 कर्मचारियों का स्टाफ हाथियों की देखरेख करता है।

हाथियों को छह बजे खाना दिया जाता है

हाथियों को छह बजे खाना दिया जाता है

हाथियों की दिनचर्या सेंटर के इंचार्ज नरेश ने बताया कि हाथियों को छह बजे खाना दिया जाता है। सात बजे वे घूमने जाते हैं और 11 बजे एक टारगेट ट्रेनिंग, 12 बजे फल खाने के बाद सभी हाथी बाड़े के अंदर मस्ती करते हैं।

बहुत कठिन है दिनचर्या

बहुत कठिन है दिनचर्या

दोपहर 3:30 बजे फिर घूमने जाते हैं, 4:30 बजे फल खाने के बाद खाना। शाम 6:30 बजे दलिया और रात 8:00 बजे गन्ना दिया जाता है। एक हाथी को रोजाना सौ किलो बरसीम, 150 किलो गन्ना, 40 किलो फल, 10 किलो दलिया व 150 लीटर पानी दिया जाता है। एक हाथी पर एक दिन का खर्चा करीब 3500 रुपये आता है।

पूरे कैंपस का एक दिन का खर्च सवा लाख से डेढ़ लाख रुपए के बीच है। एनजीओ द्वारा ही इसका इंतजाम किया जाता है। कुछ दानदाता भी मदद करते हैं। यह सेंटर 25 एकड़ जमीन में फैला है।

सबसे बड़ी समस्या हाथियों को घुमाने में आती है। हाथियों को एक दिन में घूमने के लिए करीब 20 किलोमीटर एरिया चाहिए। सेंटर के सामने वन विभाग की जगह खाली पड़ी है, उसी में हाथियों को घुमाया जाता है।

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