रायबरेली में दिनेश प्रताप सिंह पर बीजेपी ने क्यों खेला दांव, कैसे स्मृति ईरानी ने दिखाया रास्ता?
Rae Bareli Lok Sabha Seat BJP Candidate Dinesh Pratap Singh: सोनिया गांधी की रायबरेली सीट पर बीजेपी ने एक बार फिर से दिनेश प्रताप सिंह को टिकट देकर बता दिया है कि वह अमेठी की तरह ही यह सीट भी गांधी परिवार से छीनने के लिए कितनी सोची-समझी रणनीति के साथ काम कर रही है।
2018 से पहले दिनेश प्रताप सिंह सोनिया गांधी के लिए काम करते थे। 2019 में उन्होंने जिस तरह से सपा-बसपा और रालोद गठबंधन के समर्थन के बावजूद कांग्रेस की उम्मीदवार के सामने कड़ी लड़ाई पेश की तो भाजपा को लग गया कि यही हैं, जो अमेठी की तरह रायबरेली में पार्टी के लिए स्मृति ईरानी साबित हो सकते हैं।

सोनिया गांधी को कड़ी टक्कर दे चुके हैं दिनेश प्रताप सिंह
यह तथ्य किसी से छिपा नहीं रह गया है कि रायबरेली में सोनिया के रहते ही कांग्रेस का जनाधार धीरे-धीरे खिसक रहा था। 2019 में विपक्ष की संयुक्त उम्मीदवार होने के बावजूद सोनिया का वोट प्रतिशत जिस तरह से इन्होंने 55.78% पर रोक दिया, उससे पार्टी नेतृत्व को उनमें वहां के लिए बीजेपी का भविष्य नजर आया। तब पहली बार बीजेपी को यहां 38.35% वोट मिले थे।
स्मृति ईरानी की तरह रायबरेली का मैदान नहीं छोड़ा
भाजपा के रणनीतिकारों के मन में तभी से रायबरेली के लिए भी अमेठी की तरह चुनावी खिचड़ी पकनी शुरू हो गई। पार्टी ने हारने के बावजूद दिनेश प्रताप सिंह को विधान परिषद में भेजा और योगी सरकार में मंत्री बनाया गया। ऐसा होने से उन्हें रायबरेली के लोगों के साथ सरकारी स्तर पर संपर्क में बने रहने का मौका मिला।
वे पूरे पांच साल रायबरेली की जमीन से जुड़े रहे, वहां के लोगों के बीच उठते-बैठते रहे। ठीक उसी तरह से जैसे 2014 में पड़ोस की अमेठी सीट पर राहुल गांधी से चुवाव हारने के बावजूद स्मृति ईरानी ने कभी मैदान नहीं छोड़ा।
रायबरेली में सोनिया के सारे खास बीजेपी से जुड़ चुके हैं
एक जमाना था जब रायबरेली में सोनिया गांधी दिनेश प्रताप सिंह और अखिलेश सिंह के भरोसे ही चुनाव लड़ती थीं। आज दिवंगत अखिलेश सिंह की बेटी अदिति सिंह बीजेपी की स्थानीय विधायक हैं और गांधी परिवार के खिलाफ मुखर रहती हैं।
रायबरेली में सोनिया को किसी न किसी रूप में पहले भी समाजवादी पार्टी का समर्थन मिलता रहा है। कांग्रेस की इस सीट से जीत में उसके ऊंचाहार के विधायक रहे मनोज पांडे का बहुत बड़ा योगदान माना जाता है। आज की स्थिति ये है कि मनोज पांडे भी बीजेपी के साथ आ चुके हैं। यह इलाके कद्दावर ब्राह्मण चेहरा रहे हैं।
बीजेपी के फैसले में जातीय समीकरण का भी रहा रोल
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने एक इंटरव्यू में कहा था कि पार्टी ने रायबरेली के लिए तीन नाम सेलेक्ट कर रखे हैं। ऐसे में कांग्रेस की ओर से रायबरेली सीट से प्रत्याशी घोषित करने में बहुत देरी के बाद बीजेपी ने दिनेश प्रताप सिंह के नाम पर मुहर लगाई है तो उसमें जातीय समीकरण का भी बहुत बड़ा रोल है।
एक अनुमान के मुताबिक रायबरेली में 9% ठाकुर और 11% ब्राह्मण वोटर हैं। दिनेश प्रताप सिंह, अदिति सिंह और मनोज पांडे की वजह से पार्टी ने इन 20% मतदाताओं का गणित ठोस कर लिया है। दूसरी तरफ उसने ठाकुर को टिकट देकर इस जाति में कुछ नाराजगी (गुजरात और पश्चिमी यूपी में) की आशंकाओं पर भी मरहम लगाने की कोशिश की है।
इनके अलावा यहां 6% लोध और 4% कुर्मी पूरी तरह से भाजपा के कोर वोटर माने जाते हैं। 23% अन्य वोटरों में बनिया, कुछ अति पिछड़ी जातियां और कायस्थ मतदाता हैं, जो भाजपा का कमल खिलाने में मदद कर सकते हैं।
दलित वोटर भी 34% हैं, जिसमें बसपा के अलावा भी बीजेपी को कुछ की उम्मीद बनी हुई है। इस तरह से लगता है कि इतने सारे गुणा गणित ने दिनेश प्रताप सिंह के नाम पर मुहर लगाने में पार्टी का काम आसान कर दिया है।












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