माला बेचकर पहलवानी में लगी काशी की बेटी, जीतना है ओलंपिक गोल्ड

बुलंद हौसलों के साथ जुटी आस्था ओलंपिक गेम्स की तैयारी कर रही है। वाराणसी में माला-फूल की दुकान से उनके परिवार का गुजारा चलता है।

वाराणसी। यूपी में वाराणसी के भेलूपुर इलाके में रहने वाली आस्था, सोनारपुरा इलाके में चिंतामणि गणेश मंदिर के बाहर माला-फूल की दुकान लगाकर अपने परिवार की जीविका चलाती है। कंप्यूटर क्लास और स्कूल से वक्त निकालने के बाद आस्था कुश्ती के अभ्यास में लग जाती है। आस्था के हौसले बुलन्द हैं। कुश्ती जैसे मेहनती खेल और दिनभर के कामकाज से वक्त निकालकर अपने माला-फूल के दुकान पहुंचकर मां का हाथ बटाती है। पहलवानी और पढ़ाई-लिखाई के साथ पूरे परिवार का खर्च भी इसी माला-फूल की दुकान से निकलता है। राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी आस्था अपने मां के लिए एक बेटे और लोगों के लिए किसी हीरो से कम नहीं है।

बहादुरी और साहस की मिसाल

बहादुरी और साहस की मिसाल

आस्था की माँ मधु ने बताया कि वर्षों पहले पिता के देहांत के बाद इस लड़की ने न सिर्फ अपने पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर उठा रखी है बल्कि खुद की मेहनत और परिश्रम के बलबूते अपने देश का नाम भी रोशन करने की दिशा में भी अग्रसर है। छोटी सी उम्र में ही पहलवानी में महारत हासिल कर चुकी आस्था, महिला कुश्ती की राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी है। आस्था 4 नेशनल, एक जूनियर और 2 सब जूनियर खेल चुकी है। अब वो ओलम्पिक गेम्स की तैयारी कर रही है।

क्या कहती हैं आस्था ?

क्या कहती हैं आस्था ?

आस्था बताती हैं कि एक छोटा भाई और एक बहन और माँ की जिम्मेदारी बहुत बड़ी होती है। पिताजी का साया उठने के बाद कुछ समझ में नहीं आ रहा था। हमारा घर मंदिर के बगल में था तो मैंने माला बेचना शुरू कर दिया। इसके साथ ही मुझे कुछ अलग करने का मन था। देश के लिए कुछ करने का जज्बा था तो मैंने पहलवानी सीखना शुरू किया। शुरू में लोगों ने खूब हंसी उड़ाई लेकिन मेरी माँ मेरा साथ दिया। मैं आज राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी बन चुकी हूं। अब मेरा मकसद देश के लिए गोल्ड लाना है।

क्या कहते हैं आस्था के कोच?

क्या कहते हैं आस्था के कोच?

कोच गोरखनाथ यादव कहते हैं कि आस्था को 2008 में स्कूल में पहलवानी करते देखा था। मैंने इसके स्कूल में बात कर इसे स्टेडियम में लाकर ट्रेंड किया। आस्था मेहनती है और फिर ट्रेनिंग पाकर राष्ट्रीय स्तर पर गेम खेलने लगी।

संसाधनों का अभाव झेल रही आस्था

संसाधनों का अभाव झेल रही आस्था

संसाधनों के अभाव और सिर पर पिता का साया न होने के बावजूद बनारस की इस बेटी ने बेहद कम उम्र में वो कर दिखाया है जिसके लिए लोग उसकी वाहवाही कर रहे हैं। साथ ही आस्था ने ये भी साबित किया है कि कुछ कर गुजरने की चाह और प्रबल इच्छाशक्ति हो तो बड़ी से बड़ी चुनौतियां भी घुटने टेक सकती है।

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