मुजफ्फरनगर दंगा: हर बंद दरवाजे के पीछे मौत की फैक्ट्री
[अंकुर कुमार श्रीवास्तव]। ''बहुत बर्बाद कर डालेगी हम दोनों को ये नफरत,
उठो लफ्जे मोहब्बत करके सज़दा कर लिया जाये''
मशहूर शायर अनवर जलालपुरी का ये शेर मुजफ्फरनगर जिले में नफरत फैलाने वालों के लिये नसीहत भी है और लगे हाथ भाईचारे की दावत भी दे रहा है। इसके बावजूद भी गंगा-जमुनी तहजीब वाला जिला मुजफ्फरनगर हिंसा की आग में झुलसकर लहूलुहान हो गया है। इस शहर के जिस्म पर इसकी जिस आदत ने सबसे ज्यादा जख्म दिए हैं, वो है यहां के लोगों का असलहों से लगाव। जायज और नाजायज हथियारों से अपना नाता जोड़ कर खुश होने, ब्लू जिंस-व्हाइट शॅार्ट शर्ट के साथ नंगी पिस्टल रखकर खुद को जगलर साबित करने और असलहों में स्टेटस सिंबल ढूंढ़ने वाले जिला मुजफ्फरनगर की सिसकियां तो वक्त के साथ थम जाएंगी, मगर हथियारों की ये भूख कब और कैसे थमेगी कोई नहीं जानता।
कहा जाता है कि इस देश में जिला मुजफ्फरनगर ही वो एक मात्र जगह है जहां हर गांव और हर घर में कोई ना कोई हथियार जरूर मिल जायेगा। कहा तो यहां तक जाता है कि इस शहर के ज्यादातर बंद दरवाजों के भीतर मौत की फैक्ट्री (असलहे बनाने की फैक्ट्री) चलती है। और जब से यहां खूनखराबा शुरु हुआ है इस फैक्ट्री ने ज्यादा ही आग उगलना शुरु कर दिया है। इस बात पर सच्चाई की मुहर वो लाशें लगा रही हैं जिनपर नाजायज असलहों के गोलियों के निशान हैं। जी हां लाशों के पोस्टमार्टम कर रहे डॉक्टरों ने कई शवों के पेट में से AK-47 की कारतूस निकाली है।

जाहिर है मौत की इन फैक्ट्रियों का असर अब दिख रहा हो, लेकिन इसकी जमीन तभी तैयार हो गई थी, जब कुकुरमुत्तों की तरह ये फैक्ट्रियां मुजफ्फनगर में उगती रहीं और प्रशासन कान में तेल डाल कर सोता रहा। इस नरसंहार के बाद अब यहीं कहा जा सकता है कि काश! उस वक्त कार्रवाई हुई होती तो मुजफ्फरनगर में मातम ना होता। अभी भी वक्त है कि सरकार जाग जाये क्योंकि मुजफ्फरनगर दंगों का कनेक्शन जिला गाजियाबाद से जुड़ता दिख रहा है। ऐसा इसलिये कि दंगा वहां हुआ और यहां अचानक कारतूसों की बिक्री में तेजी आ गई है। गाजियाबाद में असलहों की कुल 15 दुकानें हैं। और इनमें से आठ दुकानों में कारतूसों की बिक्री अचानक से बढ़ी है। बल्कि ना सिर्फ बढ़ी है, सबसे ज्यादा मांग 315 बोर और 12 बोर के कारतूसों की हो रही है जो मुजफ्फरनगर में खूब गरजे थे।
आज आलम ये है कि सड़कों पर ना हिंदू चैन से घूम सकते हैं और ना ही मुसलमान। वक्त आ गया है इस बात पर विचार करने का कि इसके लिये जिम्मेदार कौन है? इसका सबसे ज्यादा नुकसान जनता को है मगर फायदा किसका है? एकांत में सोचा जाये तो सिर्फ वो ही चेहरे नजर आयेंगे जो इंसान नहीं वोट समझते हैं। अहम सवाल ये भी है कि इंसानियत की डोर कहां कमजोर पड़ जाती है कि 5 फीसदी दंगाई 95 फीसदी अमनपरस्तों पर हावी हो जाते हैं? संभलने और सोचने के लिये अभी वक्त और मौका दोनो है। मासूमों के खौफजदा चेहरे और औरतों के दिल में बसा अनजाना दर्द पढ़ लिया जाये तो शायद ये काली रात बीत जाये। तो आईए कवि गोपाल दास नीरज की इस दो लाइनों से अवगत करा दें जो बहुत कुछ कह रह हैं, समझने की देर है-
है बहुत अंधियार अब सूरज निकलनी चाहिए,
जिस तरह से भी हो ये मौसम बदलनी चाहिए।
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