जब Mulayam Singh Yadav ने अपने धुर विरोधियों को भी चौंकाया, बाद में उनको गलती का एहसास भी हुआ
समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) के संरक्षक मुलायम सिंह यादव (Mulayam Singh Yadav) के पास उन नेताओं के साथ मंच साझा करने की दुर्लभ क्षमता थी, जिन्हें एक समय में उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी माना जाता था। राजनीतिक स्थिति ओर सियासी हवा को पहचानते हुए मुलायम ने राजनीति में यू टर्न लेने से भी परहेज नहीं किया। चाहे वह बीजेपी छोड़कर सपा में आए दिग्गज नेता कल्याण सिंह या बसपा की सुप्रीमो मायावती रही हों सबके साथ परिस्थितियों के हिसाब से मंच शेयर किया। हालांकि मायावती के साथ मंच शेयर करने के पीछे कारण उनके बेटे पूर्व सीएम अखिलेश यादव थे जिन्होंने 2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा के साथ गठबंधन करने का फैसला किया था।

कल्याण को सपा में शामिल कराने का दांव खेला
इससे पहले मुलायम सिंह यादव ने राम जन्मभूमि मुद्दे पर वैचारिक रूप से अलग-अलग होने के बावजूद मुलायम ने 2009 में एटा में कल्याण सिंह से हाथ मिलाया था। कल्याण सिंह ने समाजवादी पार्टी के समर्थन से एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में एटा लोकसभा सीट जीती थी। यह वह समय था जब कल्याण सिंह ने बीजेपी से बगावत कर दी थी। बगावत के बाद कल्याण सिंह बीजेपी से बाहर हो गए थे। बाद में कल्याण सिंह ने अपनी पार्टी भी बनाई। तक यूपी का सियासी समीकरण ऐसा बदला था कि मुलायम और कल्याण एक मंच पर दिखाई दिए थे। ये मुलायम का करिश्मा ही था कि वह कल्याण को अपने साथ लाने में कामयाब हो गए थे।
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मुलायम को अपने इस फैसले पर पछताना पड़ा था
कल्याण सिंह बीजेपी छोड़कर सपा में तो आ गए थे लेकिन जल्द ही उन्होंने अपनी इस ऐतिहासिक भूल का एहसास भी हो गया था। हालाँकि, 2009 के लोकसभा चुनावों के बाद उनकी दोस्ती समाप्त हो गई क्योंकि मुलायम को कल्याण सिंह के साथ अपने संबंधों को मुसलमानों को समझाने में मुश्किल हो रही थी। यह वह समय था जब मुलायम को पहली बार अपने फैसले पर पछताना पड़ रहा था। बाद में उन्होंने कहा भी था कि कल्याण सिंह को सपा में शामिल कराने का फैसला गलत था। हालांकि इस बीच कल्याण सिंह की बीजेपी से नजदीकियां बढ़ गईं थीं और वो अपने मातृ संगठन बीजेपी में दोबारा लौट आए थे। इसके बाद कल्याण सिंह ने कहा था कि अब उनकी अंतिम इच्छा है कि जब उनका निधन हो तो उनका पार्थिव शरीर बीजेपी के झंडे से लिपटा हुआ हो। उनकी मौत के बाद उनकी यह इच्छा बीजेपी ने पूरी भी कर दी थी।

राजनीतिक प्रतिद्वंदिता के बाद भी मायावती के साथ मंच साझा किया
अपनी कड़वी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता को पीछे छोड़ते हुए सपा नेता मुलायम सिंह यादव और बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती ने 25 साल में पहली बार 19 अप्रैल, 2019 को मैनपुरी में मंच साझा किया। मुलायम के बेटे अखिलेश यादव ने चुनाव से ठीक पहले मायावती के घर जाकर उनका आशीर्वाद लिया था। इसके बाद लोकसभा चुनाव के लिए बसपा के साथ चुनावी समझौता किया। तब यह दावा किया गया था कि मायावती और अखिलेश के समझौते के बाद बीजेपी यूपी में साफ हो जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सपा केवल पांच सीटों पर सिमटकर रह गई जबकि बसपा को फायदा हो गया और वह शून्य से दस तक पहुंच गई।

लोकसभा चुनाव 2019 में सपा-बसपा में हुआ था गठबंधन
लोकसभा चुनाव के दौरान बसपा और सपा की तरफ से मैनपुरी में एक जनसभा का आयोजन किया गया था। इस जनसभा में पहली बार मायावती और मुलायम एक साथ एक मंच पर दिखाई दिए थे। इस मंच पर दोनों नेताओं को एकसाथ लाने के पीछे समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव का दिमाग काम कर रहा था। सपा और बसपा के बीच गठबंधन होने की वजह से इस रैली में काफी भीड़ आई थी। मुलायम ने मायावती को सपा कार्यकर्ताओं से मिलवाया और उन्हें अपना सम्मान दिखाने के लिए उनके पैर छूने को कहा। मायावती ने मुलायम की प्रशंसा की और लोगों से उन्हें वोट देने का आग्रह किया था।

मुलायम ने कहा था- मायावती ने हमेशा मुश्किल घड़ी में साथ दिया
मैनपुरी का यह वही मंच था जहां मुलायम की बहु और अखिलेश की पत्नी डिंपल यादव ने मायावती का पैर छूकर आशीर्वाद लिया था। तब इस घटना को कई नजरिए से देखा गया था। अप्रैल 2019 के उस दिन मैनपुरी की यात्रा पर मायावती का स्वागत करते हुए, मुलायम ने कहा: "मैंने हमेशा उनका सम्मान किया है और उनके लिए खड़ा रहा हूं। उन्होंने (मायावती) भी जरूरत की घड़ी में मेरा साथ दिया था। भाषण के बाद मुलायम अपनी सीट पर लौटते ही मायावती उठ खड़ी हुईं। मैनपुरी सीट से मुलायम सिंह यादव ने जीत हासिल की।












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