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सपा-बसपा मिलन: ये जरूरी भी है और मजबूरी भी, पढ़िए इसके मायने

By Amrish Manish Shukla
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    इलाहाबाद। बात 1993 की है, जब पहली बार समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने गठबंधन किया और उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव लड़ा। इस चुनाव में 176 सीटें दोनों ने जीती और सरकार बना ली, लेकिन जून 1995 में हुए गेस्ट हाउस कांड के बाद दोनों दलों के बीच जो दूरी आई वह लगातार बढ़ती चली गई और दोनों दल एक-दूसरे के जानी दुश्मन बन गये। उस गठबंधन के बाद 25 साल का एक बड़ा वक्त यानी ढाई दशक बीत जाने के बाद एक बार फिर से दोस्ती की वही राह फिर से नजर आने लगी है। फूलपुर और गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव में पुरानी दोस्ती का रंग कितना गाढ़ा होगा यह तो चंद दिनों में पता चलेगा। परन्तु भाजपा के भगवा अभियान से विचलित बसपा ने साइकिल से अपनी कदम ताल मिलने का फैसला कर लिया है। हालांकि ऑफर तो सपा की ओर से ही था लेकिन सही मायने में यह खुद को बचाने के लिए लिया गया फैसला है और इसके राजनीतिक मायने सिर्फ अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाने के लिए ही हैं।

    25 साल बाद सपा-बसपा साथ

    25 साल बाद सपा-बसपा साथ

    यह सपा- बसपा की मजबूरी भी है और उनके लिये जरूरी भी है कि वह अपने बिखरते वोट बैंक को बचाये और विपक्ष में ही सही, खड़े रहने लायक बने। फिलहाल 25 साल पहले जो करिश्मा उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा ने मिलकर किया था उसी करिश्मे को वापस फिर से करने की कोशिश में बसपा ने पहली सीढ़ी चढ़ ली है। यह अपने आप में ही राजनीति की वह भाषा है जिसे आम जनता कभी भी समझ नहीं पाती है। एक दूसरे के धुर विरोधी हो चुके और हर वक्त निशाने पर रहने वाले यह दोनों दल अब एक दूसरे के विरोध में बोलते नजर नहीं आएंगे। आश्चर्य जरूर होगा क्योंकि दोनों दलों के समर्थक- कार्यकर्ता हमेशा से ही एक दूसरे के सामने तलवार खींचे खड़े रहते थे लेकिन अब वही तलवारें इनके सेनापतियों ने म्यान में रखने का आदेश दे दिया है।

    इन बीते 25 सालों में बहुत कुछ बदला है। बसपा शिखर पर पहुंच कर जहां धड़ाम हुई है । वहीं नीचे से उठती हुई सपा अर्श से एक बार फिर से फर्श की ओर लौट रही है। कहते हैं कि दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है ऐसे में राजनीति में दुश्मन बन चुकी भाजपा, बसपा और सपा के लिए दोस्ती का ताना-बाना लेकर आई है। अब दोनों दल मौजूदा फूलपुर और गोरखपुर लोकसभा चुनाव में अपनी ताकत का सही आकलन कर सकेंगे। सपा ने अपना प्रत्याशी खड़ा किया है और बसपा अब उन्हें अपना समर्थन दे रही है। यह वोट इकट्ठे होकर कितने कारगर साबित होंगे यह तो वक्त बताएगा लेकिन आगामी लोकसभा चुनाव के लिए दोनों दलों ने अपने गठबंधन का पूर्ण संकेत दे दिया है।

    सपा-बसपा का उदय

    सपा-बसपा का उदय

    उत्तर प्रदेश की बारहवीं विधानसभा का चुनाव सही मायनों में ऐतिहासिक रहा। इस चुनाव में एक नए गठबंधन ने जन्म लिया था और बसपा-सपा ने एक साथ मिलकर चुनाव लड़ा और सपा-बसपा का उदय हुआ। इस चुनाव में दोनों दलों ने 176 सीटें जीती और यूपी में गठबंधन वाली सरकार बनी जिसके मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव बने । हलांकि इससे पहले मुलायम सिंह यादव एक बड़े राजनैतिक के रूप में स्थापित हो चुके थे और इससे पहले वह जनता दल की ओर से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए थे लेकिन 1995 में गेस्ट हाउस कांड के बाद बसपा का सपा से राजनैतिक साथ छूट गया और यहीं से बसपा का सही मायने में भाग्योदय हुआ। 3 जून 1995 को मायावती यूपी की मुख्यमंत्री बनी और इतिहास में पहली दलित महिला मुख्यमंत्री बनने का गौरव हासिल किया। मायावती 137 दिन तक मुख्यमंत्री रही और यह तय हो गया कि निकट भविष्य बसपा के लिये स्वर्णिम युग होगा।

    राजनीति में छा गयी बसपा

    राजनीति में छा गयी बसपा

    मायावती के मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्हें एक दलित नेता के रूप में पेश किया गया और दलितों का उन्हें मसीहा कहा जाने लगा । यह यूपी की जातिगत राजनीति में सटीक गणित थी और इसे बहुत ही बेहतरीन तरीके से मायावती ने एक सिस्टम से आगे बढ़ाया। इसी का नतीजा नतीजा रहा कि 21 मार्च 1997 को मायावती 184 दिन के लिये फिर सीएम बन गई। उत्तर प्रदेश का 2 बार मुख्यमंत्री बन जाना कोई मामूली बात नहीं थी। मायावती का कद इसके बाद लगातार तेजी से बढ़ता रहा और 14वीं विधानसभा चुनाव के बाद एक बार फिर से मायावती मुख्यमंत्री बन गई। 3 मई 2002 को वह उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री चुनी गई और इस बार 1 साल 118 दिन का उनका कार्यकाल रहा। इसके बाद सबसे बड़ी उपलब्धि 15 वीं विधानसभा चुनाव के दौरान हासिल की। 13 मई 2007 को उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं और इस बार 4 साल 307 दिन का उनका पूर्णकालिक कार्यकाल रहा। हलांकि इस चुनाव के बाद 2012 व 2017 के विधानसभा चुनाव में बसपा को मुंह की खानी पड़ी और वह दोनों चुनाव में दमदार प्रदर्शन नहीं कर सकी और उस का ग्राफ लगातार नीचे गिरता चला जा रहा है। आलम यह है कि बसपा के बड़े नेता अब पार्टी से बाहर हो चुके हैं और बसपा फिर से खुद को खड़ा करने में जुटी है।

    सपा उठकर चली पर लुढ़क गई

    सपा उठकर चली पर लुढ़क गई

    1993 में जब सपा-बसपा मिलकर यूपी में चुनाव लड़ने आए तो एक बहुत बड़ी शक्ति के रूप में दोनों उभरे थे। उस चुनाव में 256 सीटों पर सपा ने चुनाव लड़ा था और 109 सीटों पर जीत हासिल की थी जबकि 164 सीटों में से 67 सीट बसपा ने जीत कर सूबे की सियासत में नया कीर्तिमान लिख दिया था लेकिन 1995 गेस्ट हाउस कांड के बाद जब मायावती ने अपना समर्थन सपा से वापस ले लिया। उसके बाद सपा को सत्ता में आने में कई साल लग गए थे। 2003 में समाजवादी पार्टी का फिर से उदय हुआ था और 29 अगस्त 2003 को 3 साल 257 दिन के लिए समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने थे। हलांकि अगले चुनाव में सपा को बसपा ने जोरदार पटखनी दी और यह तय हो गया कि यूपी में अब यही दोनों दल एक दूसरे की टक्कर में होंगे। इसके बाद 16 विधानसभा चुनाव में करिश्माई प्रदर्शन करते हुए समाजवादी पार्टी यूपी में सत्तासीन हुई थी और मुलायम सिंह के बेटे अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री चुने गए थे। परंतु मौजूदा समय में सपा और बसपा दोनों सत्ता से बाहर है । 17वीं विधानसभा चुनाव में भाजपा ने एकतरफा जीत हासिल करते हुए सपा और बसपा की लुटिया डुबो दी है। बीते विधानसभा चुनाव सपा के लिए बहुत ही खराब रहा था। पहले पारिवारिक कलह से समाजवादी पार्टी जूझती रही और जब वह चुनाव में उतरी तो बुरी तरह भाजपा से पराजित हुई। मौजूदा समय में सपा भी दो गुटों में बट कर कमजोर हो गई है और उसे भी सहारे की जरूरत है।

    बसपा की बिखरती गयी ताकत

    बसपा की बिखरती गयी ताकत

    1993 के बाद से 2017 के चुनाव के बीच अगर सपा और बसपा के शक्ति आंकलन को देखें तो शुरुआती दिनों में कई सालों तक जहां बसपा ने जातिगत रणनीति के आधार पर अपना कद लगातार बढ़ाया। वहीं मौजूदा समय में बसपा के मुकाबले सपा कहीं अधिक पावरफुल हो चुकी है। 1995 गेस्ट हाउस कांड के बाद चार बार बसपा सत्ता में आई और मायावती मुख्यमंत्री बनीं जबकि सपा के लिए सिर्फ दो बार ही ऐसे मौके आए जब उनकी पार्टी यूपी की सत्ता हासिल कर सकी। 2007 में हुए विधानसभा चुनाव के बाद जब 2012 में विधानसभा चुनाव हुए तो बसपा का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा और उसके बाद से लगातार बसपा नेताओं का बसपा छोड़ने का क्रम शुरू हुआ। बसपा में बागियो की संख्या बढ़ने लगी। बसपा अपने कई नेताओं को विभिन्न आरोपों में निकालने लगी। नतीजा यह हुआ कि मौजूदा समय में बसपा पूरी तरह से टूट कर बिखर चुकी है और शक्तिहीन होने की दिशा में आगे बढ़ रही है। वहीं बसपा के मुकाबले में सपा मौजूदा समय में अधिक प्रभावशाली है दोनों को एक-दूसरे की जरूरत है। मौजूदा समय में सपा के पास इतनी शक्ति नहीं कि वह अकेले दम पर विधानसभा चुनाव या लोकसभा चुनाव में भाजपा को टक्कर दे सके जबकि बसपा ने अपनी शक्ति को खुद ही इतना खत्म कर लिया है कि वह सपा को भी टक्कर देने की स्थिति में नहीं है । उपचुनाव में हाल-फिलहाल सत्तारूढ़ भाजपा को हराना नामुमकिन सा नजर आ रहा है।

    मौका वापसी का

    मौका वापसी का

    यह वक्त की जरूरत है कि दोनों दल फिर से एक बार साथ आये और 1993 में हुए विधानसभा चुनाव के प्रदर्शन को फिर से दोहराएं। अखिलेश यादव पूरी तरह से युवा शक्ति को लेकर आगे बढ़ रहे हैं और मायावती के पास एक बड़ी फौज मतदाताओं की है। अगर यह दोनों दल फिर से एक बार जुड़ रहे हैं तो सूबे में नए सियासी समीकरण बनेंगे जो आगामी लोकसभा और विधानसभा चुनाव में गुल खिलाएंगे। दोनों दल एक साथ आकर न सिर्फ सत्ता में अपनी वापसी कर सकेंगे बल्कि अपनी ताकत को एक बार फिर से बढ़ा सकेंगे।

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    English summary
    Meaning of SP and BSP political alliance in Uttar Pradesh.

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