Loksabha Election 2024: गठबंधन से दूरी मायावती की मजबूरी या बड़ी सियासी चाल, सामने आई ये वजह
बसपा सुप्रीमो मायावती ने यूपी में गठबंधन से दूरी बना ली है। वह न तो एनडीए में शामिल होंगी न ही वह INDIA का हिस्सा बनेंगी।
Bahujan Samaj Party Mayawati: उत्तर प्रदेश की पूर्व सीएम और बहुजन समाज पार्टी (Bahujan Samaj Party) की अध्यक्ष मायावती 2024 लोकसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी हुई हैं। मायावती ने कहा है कि वह 2024 में यूपी में किसी के साथ गठबंधन नहीं करेंगी क्योंकि इससे संगठन को कोई फायदा नहीं होता है। लेकिन पिछले चुनावी आंकड़े बताते हैं कि मायावती अकेले भी लड़ीं तो उन्हें कोई खास सफलता नहीं मिली। राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो गठबंधन से दूरी एक रणनीतिक कदम हो सकता है।

2022 में केवल एक सीट पर सिमट गई बसपा
बसपा की मुखिया मायावती यूपी में किसी गठबंधन में शामिल न होने की वकालत तो कर रही हैं लेकिन पिछले चुनावी आंकड़ों पर नजर डालें तो अकेले लड़ने पर भी उनकी पार्टी को उम्मीद के अनुसार सफलता नहीं मिली। बसपा ने 2022 के विधानसभा चुनाव में अकेले 403 सीटों पर चुनाव लड़ा लेकिन केवल एक सीट ही जीत पायीं थीं। इससे पहले 2017 के विधानसभा चुनाव में बसपा की सीटें घटकर सपा से भी कम हो गईं थीं। बसपा को केवल 19 सीट मिली थी।
2019 लोकसभा चुनाव में सपा के साथ मिलकर जीतीं 10 सीटें
यूपी में बनने वाले किसी भी तरह के सियासी गठबंधन में शामिल होने की बात को मायावती ने खारिज कर दिया है। मायावती ने कहा है कि गठबंधन की सूरत में दूसरे दलों का वोट बसपा के पक्ष में ट्रांसफर नहीं होता है लेकिन पिछले आम चुनाव में वह सपा के साथ मिलकर लड़ीं थी और यूपी की दस सीटों पर उनको जीत मिली थी।
2014 के आम चुनाव में नहीं खुला बसपा का खाता
2019 के लोकसभा चुनाव से पहले मायावती की पार्टी का ग्राफ कुछ ठीक नहीं था। 2014 ही वो समय था जब बीजेपी में नरेंद्र मोदी का उदय हुआ और पीएम उम्मीदवार के तौर पर वह चुनाव लड़े। इस आम चुनाव में बीजेपी और मोदी की लहर इस कदर चली की यूपी में बसपा का लोकसभा चुनाव में पूरी तरह से सफाया हो गया। बसपा 2014 के लोकसभा चुनाव में एक भी सीट जीतने में कामयाब नहीं हुई।
2012 के विधानसभा चुनाव में यूपी में दूसरे नंबर पर रही
2012 में जब यूपी में सपा के मुखिया मुलायम सिंह के नेतृत्व में सपा ने चुनाव लड़ा तब सपा को 224 सीटें मिली थीं और बसपा को सत्ता में रहते हुए भी 80 सीटों पर संतोष करना पड़ा था। यहीं से यूपी में मायावती की पार्टी का ग्राफ गिरना शुरू हो गया था जो अभी तक चल रहा है। पिछले लगातार चार चुनावों में बसपा हार का झटका झेल रही है।
2007 में अपने दम पर बनाई थी यूपी में सरकार
उत्तर प्रदेश की पूर्व सीएम और बसपा की मुखिया मायावती ने 2007 में अपने दम पर सरकार बनाई थी। इस दौरान मायावती को पांच साल सत्ता में रहने का मौका मिला। लेकिन 2012 में हुए विधानसभा चुनाव में जनता ने मायावती के काम को नकार दिया और उन्हें सत्ता से बेदखल कर दिया। 2007 की प्रचंड जीत के बाद से ही बसपा यूपी में 15 सालों से हाशिए पर है। इस दौरान मायावती के कई करीबी उनका साथ छोड़कर दूसरी पार्टियों में चले गए। आज की स्थिति में मायावती के पास बड़े चेहरों का आभाव है।
मायावती को रास नहीं आई गठबंधन की राजनीति
गठबंधन में न शामिल होने की कई वजहें हैं। एक तो आप पार्टी का इतिहास देखेंगे तो पता चलेगा कि बसपा ने पहली बार 1993 में सपा के साथ तो 1996 में कांग्रेस के साथ गठबंधन किया लेकिन इसका फायदा उनको नहीं मिला, जैसा कि वो दावा करती हैं। इसके बाद 2019 में एक बार फिर वह सपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ीं। उनकी सीटें तो शून्य से दस तक पहुंच गईं लेकिन सपा की पांच सीटों पर सिमट गई। राजनीतिक जानकारों की माने तो दरअसल मायावती को गठबंधन के दौरान अपने वोट शेयर का नुकसान झेलना पड़ा। अब वह नहीं चाहतीं कि उनका जनाधार 12 प्रतिशत से भी नीचे गिरे। यदि ऐसा हुआ तो बसपा उस स्थिति में पहुंच जाएगी जहां से उसने शुरुआत की थी।
2024 की बजाए 2027 पर फोकस कर रही पार्टी
वरिष्ठ पत्रकार विजय उपाध्याय कहते हैं कि,
बसपा का वोट शेयर लगातार घट रहा है। कभी अपने दम पर सरकार बनाने वाली मायावती की पार्टी का वोट शेयर गिरकर आज 12 फीसदी तक पहुंच गया है जबकि आप देखेंगे तो यूपी में 21 फीसदी के आसपास दलित हैं। मेरी समझ में मायावती अब 2024 में अकेले लड़कर अपना वोट परसेंटेज सुधारना चाहती हैं जिसका फायदा उनको 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव में मिलेगा। इसीलिए शायद वह गठबंधन में शामिल होकर अपना नुकसान नहीं करना चाहती हैं।












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