मायावती ने आजमगढ़ में BJP का रास्ता बनाया आसान ?, जानिए कैसे धराशायी हुए अखिलेश यादव
लखनऊ, 26 जून: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती को सिर्फ एक ही सीट पर जीत नसीब हुई थी। विधानसभा चुनाव के दौरान ही सपा ने मायावती पर आरोप लगाए थे कि उन्होंने ज्यादातर ऐसे उम्मीदवार खड़े किए जिससे बीजेपी के उम्मीदवारों को जीतने में मदद मिली। यही बात तीन महीने बाद लोकसभा के उपचुनाव में भी साबित हो गई। यूं तो बहनजी कभी उपचुनाव में हिस्सा नहीं लेती थीं लेकिन इसबार उन्होंने आजमगढ़ में मुस्लिम उम्मीदवार गुड्डु जमाली को उतारकर बीजेपी का काम असान कर दिया। राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो जमाली की वजह से मुस्लिम मतों में बिखराव हो गया जिसका सीधा फायदा बीजेपी को मिला।

मायावती के मास्टरस्ट्रोक ने अखिलेश को किया धराशायी
उपचुनाव में हिस्सा न लेने वाली बसपा की मुखिया मायावती ने आजमगढ़ के उपचुनाव में शामिल होने का फैसला किया था। मायावती ने यह फैसला क्यों लिया ये तो रहस्य बना हुआ है लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो बीजेपी की राह आसान करने के लिए उन्होंने यह कदम उठाया था। यदि वो चुनाव को लेकर गंभीर होतीं तो रामपुर में आजम के खिलाफ भी उम्मीदवार उतारतीं। वजह जो भी रही हो लेकिन उनके इस फैसले की गूंज दूर तक सुनाई देगी। हालांकि मायावती के एक दांव ने अखिलेश को आजमगढ़ में चारों खाने चित्त होने के लिए मजबूर होना पड़ा।

बसपा ने दलित-मुस्लिम समीकरण का किया था लिटमस टेस्ट
आजमगढ़ के लोकसभा उपचुनाव में बसपा ने अपने पुराने समीकरण का भी लिटमस टेस्ट किया था जो कि फेल रहा। मायावती ने अपने पुराने फार्मूले को लागू करते हुए इस बार आजमगढ़ में मुस्लिम उम्मीदवार गुड्डु जमाली को उतारा था। मायावती को लगा था कि आजमगढ़ में दलित-मुस्लिम समीकरण के सहारे उनकी जीत भी हो सकती है। लेकिन यह फार्मूला काम नहीं आया। यदि ये फार्मूला सफल होता तो आने वाले आम चुनाव में मायावती अलग रणनीति के तहत चुनाव लड़ते दिखाई देंती। लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि क्या बसपा को पूरी तरह से दलितों का साथ नहीं मिला, क्या बीजेपी दलित वोट बैंक में सेंध लगाने में सफल रही।

अगले आम चुनाव में बसपा को नई रणनीति की जरूरत
आजमगढ़ के उपचुनाव में जो नतीजे आए हैं उसकी गूंज अगले आम चुनाव तक सुनाई देगी। बसपा को इस परिणाम ने नए सिरे से सोचने के लिए मजबूर कर दिया। मायावती पहले ही विधानसभा में हार के बाद संगठन को लेकर परेशानियों का सामना कर रही हैं। उपचुनाव की हार अब उनकी मुश्किलों को और बढ़ाने का काम करेगी। मायावती को नए सिरे से संगठन और पार्टी की रणनीति के बारे में सोचना होगा ताकि चुनाव दर चुनाव पार्टी को मिल रही निराशाजनक हार से बाहर निकाला जा सके।

जमाली ने दो लाख से ज्यादा वोट पाकर बीजेपी का काम आसान किया
आजमगढ़ में जमाली का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं था लेकिन उपचुनाव में जो वोट मिले वो उनके लिए नाकाफी साबित हुए। बसपा के रणनीतिकारों और खासतौर से बहनजी को इस बात का भरोसा था कि जमाली की लोकप्रियता की वजह से मुस्लिम समुदाय का भरपूर साथ उनको मिलेगा। हालांकि जमाली इस बार भी दो लाख से अधिक मत पाने में कामयाब रहे। दरअसल जमाली ने जब सपा के संरक्षक मुलायम सिंह यादव के खिलाफ चुनाव लड़ा था तब भी उनको इसी आंकड़े के आसपास वोट मिले थे। बसपा को आजमगढ़ में वापसी करनी है तो आम चुनाव से पहले संगठन के स्तर पर काफी काम करना होगा।












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