प्रशासन चौखट पर और कानून मेरी मुटठी में
प्रशासन मेरी चौखट पे, और कानून मेरी मुटठी में। आज के दौर में यह जुमला शायद अटपटा लगे। परंतु राजधानी लखनऊ में 'सो कॉल्ड हार्इ प्रोफाइल वर्ग में अपनी रसूख का हवाला देकर एक शख्स इसे सच साबित कर रहा है। वो अपराध दर अपराध करता जा रहा है और प्रशासन व पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी है। थाना विभूति खंड, थाना वजीरगंज में उसके खिलाफ दर्ज मुकदमें की बात तो छोडि़ए, सीबीआर्इ और इनकम टैक्स विभाग में भी उसकी जांच की रफ्तार धीमी चल रही है।
अपने रसूख का हवाला और चढ़ावा देने की कला में माहिर इस शख्स के हौसले इतने बुलंद हैं कि इस बार उसने राजधानी लखनऊ के दो बैंकों को चूना लगाया है। बैंक अधिकारियों की मिलीभगत कहिए या फिर उस शख्स का मायाजाल। किसी और के मकान को अपना मकान बताकर बैंक से करोड़ों का लोन ले डाला और बैंक में बंधक जमीन को उसने बेच डाला। मामले का खुलासा तब हुआ जब उक्त मकान मालिक के पास बैंक से ऋण के संबंध में एक पत्र मिला। जिसमें उसके मकान को बंधक बनाये जाने का जिक्र था।
उक्त भवन के मालिक ने जब इलाहाबाद बैंक से संपर्क किया तो जालसाजी की परत दर परत खुलती चली गर्इ। राजधानी सिथत इलाहाबाद बैंक और कारपोरेशन बैंक को फर्जी दस्तावेज के माध्यम से एक कंपनी ने करोड़ों का चूना लगाया है। विक्रांत खंड गोमतीनगर सिथत मेसर्स स्वासितक इंफ्रा-हाइटस प्राइवेट लिमिटेड ने इलाहाबाद बैंक से करोड़ों रूपए का ऋण लिया है जिसके लिए कंपनी ने बैंक को जो दस्तावेज मुहैया करायें हैं जांच के बाद वो फर्जी पाये गये हैं। खुलासे के बाद इलाहाबाद बैंक के अधिकारियों के होश उड़ गए हैं और वो उचित कार्रवार्इ करने से भी हिचक रहे हैं। क्योंकि मामला बैंक के अधिकारियों की मिलीभगत का भी हो सकता है।

विक्रांत खंड गोमतीनगर भवन संख्या बी-211 के स्वामी को इलाहाबाद बैंक की मुख्य शाखा लखनऊ से 5 जुलार्इ, 2013 का लिखा एक पत्र प्राप्त हुआ जिसमें उक्त भवन पर मेसर्स स्वासितक इंफ्रा-हाइटस प्राइवेट लिमिटेड का दफतर दर्शाया गया है और उससे बैंक ने 2 करोड़ 60 लाख रूपए ऋण वसूले जाने का जिक्र किया है। इस कंपनी में बतौर निदेशक आयुष श्रीवास्तव और कुणाल श्रीवास्तव का नाम दर्ज है। भवन स्वामी का कहना है कि न तो वह इस कंपनी के बारे में जानता है और न ही इनके निदेशकों के बारे में। इस भवन में को दफतर नहीं चल रहा है। भवन स्वामी की सूचना पर इलाहाबाद बैंक सकि्रय हुआ और तहकीकात शुरू हुर्इ तो जो सच सामने आया वह चौंकाने वाला था।
झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा कांड के मास्टर माइंड डी.के. श्रीवास्तव और उसकी तथाकथित पत्नी प्रियंका सिंह के एक और जालसाजी का कारनामा उजागर हुआ। स्वासितक इंफ्रा-हाइटस प्राइवेट लिमिटेड को ऋण देते समय बैंक ने इतनी भी जहमत नहीं उठायी कि दस्तावेजों की भली-भांति जांच पड़ताल कर ली जाय। ऋण को लेकर कंपनी और ऋण देकर इलाहाबाद बैंक दोनों ही अपने अपने रास्ते हो लिये। जब ऋण की अदायगी के लिए खोजबीन शुरू हुर्इ तो मामला प्रकाश में आया। फिर क्या था? अधिकारियों के हाथ-पांव फूल गए।
आनन-फानन में 13 जुलार्इ 2013 को दैनिक समाचार पत्र दैनिक जागरण ने बंधक संपतित की एक सूची की नोटिस जारी की। जिसमें आयुष कुमार श्रीवास्तव, कुणाल श्रीवास्तव, देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव और प्रियंका सिंह की तस्वीर समेत जमीनों का विवरण प्रकाशित करवाया। इस नोटिस को देखकर ही शायद कारपोरेशन बैंक बी.एन. रोड कैसरबाग शाखा को भी अपने ठगे जाने का एहसास हुआ और उसने भी 15 जुलार्इ 2013 को दैनिक समाचार पत्र हिन्दुस्तान में इनके खिलाफ ऐसा ही एक नोटिस प्रकाशित कराया। जालसाजी का सच यह है कि जिस मकान को आफिस दिखाकर और जिस जमीन के कागजात को बंधक बनाकर स्वासितक इंफ्रा-हाइटस प्रा.लि. जो ऋण लिया है उसके पीछे मास्टर माइंड है डी.के. श्रीवास्तव एवं प्रियंका सिंह।
बी-211 विक्रांत खंड गोमतीनगर सिथत भवन का स्वामित्व रजिस्ट्रार आफिस लखनऊ में राजशेखर सिंह के नाम से दर्ज है और जो जमीन बंधक के तौर पर बैंक में रखी गर्इ है उसे इन जालसाजों ने दिनांक 6 अप्रैल 2013 को ही रमेश कुमार अग्रवाल पुत्र स्व. प्रभातीलाल अग्रवाल, 1 शास्त्रीनगर लखनऊ को बेच दी है। सरकारी दस्तावेज में बही-1 जिल्द संख्या 5518, पृष्ठ संख्या 187 से 204 पर क्रमांक 4765 पर दर्ज है। इस बात की पुषिट इलाहाबाद बैंक के केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी एवं उपमहाप्रबंधक ने पत्रांक संख्या म.का.सू.अ.अ. 4855 के माध्यम से की है।
रजिस्ट्री आफिस में डी.के. के रसूख का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस शख्स के ज्यादातर संपतितयों की रजिस्ट्री रजिस्ट्रार आफिस लखनऊ में न होकर 21 पन्हौना हाउस, खन्दारी लेन, लालबाग लखनऊ पर होती है जहां इसकी तथाकथित पत्नी प्रियंका सिंह का आवास है। इसका खुलासा तब हुआ जब विशाल खंड गोमतीनगर भवन निवासी अनुपमा सिंह ने अपने भवन की फर्जी रजिस्ट्री कराये जाने का मुकदमा 26 दिसंबर 2012 को वजीरगंज थाने में दर्ज कराया। अब लगभग एक साल पूरे होने को आये परंतु कर्इ थानों में दर्ज एफआइआर पर कार्रवार्इ की चाल बताती है कि कानून के साथ खिलवाड़ करने वाले फर्जी मुकदमें लिखाने और फर्जी रजिस्ट्री कराने में माहिर इस दंपतित ने बालीवुड के बंटी-बबली को भी मात दे रखी है।












Click it and Unblock the Notifications