लोकसभा चुनाव: रायबरेली सीट पर कांग्रेस को सता रहा है डर? ये है इसकी वजह
Lok Sabha Elections 2024: लोकसभा चुनाव की तैयारियां राजनीतिक दलों ने युद्ध स्तर पर शुरू कर दी है। उत्तर प्रदेश में चुनावी सरगर्मियां चरम पर है। उत्तर प्रदेश से सबसे ज्यादा 80 लोकसभा सीटें हैं इसीलिए भाजपा समेत अन्य राजनीतिक दलों की निगाहें राज्य पर टिकी हुई हैं। भाजपा ने तो इस बार के चुनाव में यूपी की 80 सीटों पर जीत हासिल करने का लक्ष्य रखा है।

उत्तर प्रदेश की कई ऐसी लोकसभा सीटें हैं जो उम्मीदवार के चयन से लेकर परिणाम आने तक चर्चा में बनी रहती हैं। उन्हीं खास और चर्चित सीटों में उत्तर प्रदेश की रायबरेली सीट भी शामिल है।
रायबरेली सीट जो कांग्रेस का गढ़ मानी जाती है, उस पर इस बार सोनिया गांधी ने चुनाव नहीं लड़ रहीं हैं। सोनिया के रायबरेली सीट से चुनाव ना लड़ने के ऐलान के बाद माना जा रहा था कि अब उनकी बेटी प्रियंका गांधी रायबरेली सीट से चुनाव लड़ेगी।
लेकिन सोमवार को खबर आई कि प्रियंका गांधी अब दमन दीव से चुनाव लड़ेगी। दमन दीव के कांग्रेस अध्यक्ष केतन पटेल द्वारा ये बड़ा दावा किया गया है। अब ऐसे में सवाल उठ रहा है कि प्रियंका नहीं तो कांग्रेस अब किसे अपने गढ़ रायबरेली को सुरक्षित करने के लिए चुनाव मैदान में उतारेगी?
सूत्रों के अनुसार कांग्रेस आलाकमान में रायबरेली सीट के उम्मीदवार को लेकर अभी भी मंथन चल रहा है। इसकी वजह है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में यूपी की 80 सीटों में रायबरेली एक अकेली सीट थी जिस पर कांग्रेस उम्मीदवार सोनिया गांधी ने जीत हासिल कर कांग्रेस का यूपी से पूरा सफाया होने से बचाया था।
रायबरेली संसदीय क्षेत्र से लगातार पांच लोकसभा चुनाव जीतने वाली सोनिया गांधी ऐसी इकलौती नेता थीं जिन्होंने 2019 की मोदी लहर में भी भाजपा उनसे रायबरेली सीट नहीं छीन पाई थी। जबकि अमेठी सीट भाजपा उनके बेटे राहुल गांधी से छीनने में कामयाब हो गई थी। स्मृति ईरानी ने तीन बार के सांसद रहे राहुल गांधी को हरा कर कांग्रेस के गढ़ अमेठी में भगवा लहराया था।
इस बार के चुनाव में रायबरेली को लेकर कांग्रेस कोई जोखिम नहीं उठाना चाहती है। साफ है कि कांग्रेस को इस बार रायबरेली के छिन जाने का भय सता है। जिसकी खास वजह यहां पर लगातार कांग्रेस का गिरता जनाधार है। 2005 के बाद रायबरेली में लगातार कांग्रेस का जनाधार गिरता जा रहा है।
कांग्रेस का घट रहा भाजपा से जीत का अंतर
2019 के चुनाव में सोनिया गांधी को 534918 वोट मिले थे। वहीं उनके प्रतिद्वंदी भाजपा के दिनेश प्रताप सिंह को 367740 मिले थे। दोनों के बीच में हार का अंतर 167178 मतों का था। जबकि 2014 के लोकसभा चुनाव में सोनिया गांधी को 526434 वोट मिले थे। वहीं उनके प्रतिद्वंद्वी भाजपा के अजय अग्रवाल को 173721 वोट मिले थे और हार का अंतर 352713 था। यानी 2014 के चुनाव की तुलना में 2019 में हार के वोटों का अंतर लगभग आधा हो गया था।
सपा और बसपा से इन दो चुनावों में हुआ मुकाबला
वहीं 2009 में सोनिया गांधी को 481490 मिले थे। उनके प्रतिद्वंद्वी बसपा के आर एस कुशवाहा को 109325 वोट मिले थे। दोनों के बीच हार का अंतर 372165 था। वहीं 2004 में सोनिया गांधी को 378107 वोट मिले थे और उनके प्रतिद्वंदी अशोक कुमार सिंह को महज 128342 वोट मिले थे। दोनों के बीच वोटों का अंतर 249765 था। हालांकि 2004 की अपेक्षा 2009 में वोटों का अंतर अधिक था लेकिन 2019 में वोटो का अंतर घटकर हार का अंतर 352713 हो गया था।
रायबरेली सीट पर 16 बार जीत दर्ज चुकी है कांग्रेस
बता दें रायबरेली सीट 1967 से 1977 तक पूर्व प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के पास थी और 2004 से 2024 में राज्यसभा में सोनिया गांधी में जाने तक उनके सोनिया गांधी के पास रही। यहां के 16 लोकसभा चुनावों और 3 उपचुनावों में कांग्रेस ने 16 बार जीत दर्ज की, 1977 में भारतीय लोकदल और 1996, 1998 में बीजेपी ने इस सीट पर जीत दर्ज की। वहीं सपा की बात करें जो इस बार के चुनाव में कांग्रेस के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़ रही वो पिछले दो बार से रायबरेली सीट पर अपने उम्मीदवार नहीं उतार रही।
रायबरेली में कुल मतदाता
रायबरेली सीट पर कुल मतदाताओं की सीट की बात करें तो इस सीट पर कुल मतादाता 779813 हैं जिनमें 870954 पुरुष वोटर और 779813 महिला मतदाता हैं।
रायबरेली सीट पर जतीय समीकरण
वहीं जतीय समीकरण की बात करें तो ब्राह्मण 11 प्रतिशत, ठाकुर 9 प्रतिशत, यादव 7 प्रतिशत, एससी वोटर्स 34 प्रतिशत हैं। 6 प्रतिशत मुस्लिम, लोध 6 प्रतिशत, कुर्मी 4 प्रतिशत, अन्य 23 फीसदी मतदाता हैं। यानी 34 प्रतिशत एससी वोटर्स सबसे अधिक हैं, जो चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।












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