इमेज बदलने के लिए 'परिवारवाद' और 'जातिवाद' से किनारा अखिलेश के लिए कितना फायदेमंद, जानिए
लखनऊ, 9 फरवरी: उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी समाजवाद का झंडा फहराकर सफल रही, लेकिन उसपर 'परिवारवाद' और 'जातिवाद' फैलाने का आरोप लगा। जिसका खामियाजा एसपी को भुगतना पड़ा और एसपी का प्रदर्शन सबसे निचले पायदान पर पहुंच गया। ऐसे में अखिलेश यादव इस चुनाव में फिर से सफल होने के लिए परिवारवाद और यादववाद से दूरी बनाते नजर आ रहे हैं। इस चुनाव में अखिलेश यादव ने अपनी रणनीति में कई अहम बदलाव किए हैं। अखिलेश यादव अब तक 'परिवारवाद' और 'यादववाद' से दूरी बनाए हुए हैं, इसलिए इस बार सपा की सबकी निगाहें टिकी हुई हें कि इस चुनाव में कितनी कामयाब होगी।

क्या सपा के इस फैलाव से पार्टी की छवि मजबूत हो रही है?
विपक्षी दल लंबे समय से सपा पर परिवारवाद और यादववाद फैलाने का आरोप लगाते रहे हैं। ऐसे में इस बार एसपी ने दोनों से व्यावहारिक दूरी बनाकर रखी है। सपा अब तक ज्यादा उम्मीदवारों के नामों का ऐलान कर चुकी है, लेकिन परिवार के सदस्य के तौर पर इस सूची में सिर्फ चाचा शिवपाल यादव ही शामिल हैं। जिन्हें गठबंधन सहयोगी के रूप में शामिल किया गया है। उधर, सिर्फ यादव सरनेम के सहारे सपा ने इस बार किसी को प्रत्याशी नहीं बनाया है। ऐसे में सपा का यह फैसला कितना सफल होगा ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन इन सबके बीच सपा पर परिवारवाद और यादववाद को लेकर विपक्षी दलों द्वारा लगाए गए आरोप के उलट अपना प्रयास कर रही है।
2017 के चुनाव में सपा की हार का कारण 'परिवारवाद' था
यूपी की राजनीति में सपा समाजवाद का झंडा बुलंद करके सफल रही, लेकिन पार्टी की सफलता के साथ सपा परिवारवाद और यादववाद तक ही सिमट कर रह गई। एक दौर था जब यूपी में सपा की सरकार थी, मुलायम परिवार समेत यादवों का बोलाबाला था। केवल जाति के लोग ही उच्च पदों पर आसीन थे। उदाहरण के लिए 2007 से पहले और 2012 के चुनाव के समय अखिलेश यादव के परिवार से लेकर सबसे ज्यादा सांसद, विधायक, विधान परिषद के सदस्य, परिवार के सदस्य बड़े राजनीतिक पदों पर रहे। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने सपा को पारिवारिक पार्टी बताकर उसका खूब प्रचार किया था, जिसका खामियाजा सपा को भी भुगतना पड़ा था। इस वजह से 2017 के चुनाव में सपा को सिर्फ 47 सीटों से संतोष करना पड़ा था, जबकि इससे पहले 2012 के चुनाव में सपा 224 सीटें जीतने में सफल रही थी।

चुनावी रैलियों में अखिलेश ने परिवार वालों से बनाई दूरी
उत्तर प्रदेश में जिस चुनावी रैलियों में अखिलेश यादव इस बार मंच पर घरवालों से दूरी बनाने लगे हैं. जिस तरह 2017 और 2019 के चुनाव में सपा की रैलियों में मंच पर घरवालों का ही दबदबा होता था, लेकिन इस बार अखिलेश यादव ने मंच पर घरवालों से दूरी बना ली है। इस बार भी पत्नी डिंपल यादव स्टार प्रचारकों की लिस्ट में होने के बावजूद स्टेज शेयर करती नजर नहीं आ रही हैं।
इस चुनाव में सपा का पिछड़े, दलित और मुस्लिम पर फोकस
अखिलेश यादव ने इस बार के चुनाव में यादववाद से दूरी बना रखी है तो वहीं इस बार उन्होंने खुले तौर पर छोटी जाति आधारित पार्टियों से गठबंधन किया है। जिसमें वह ओपी राजभर से लेकर स्वामी प्रसाद मोरया को साथ लाने में सफल रहे हैं। माना जा रहा है कि अखिलेश यादव अपने फैसलों से यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि एसपी यादव के साथ गैर यादव पिछड़े, दलित और मुस्लिम मतदाताओं के साथ हैं। बढ़त देने के लिए अखिलेश यादव जाति जनगणना का समर्थन करते नजर आ रहे हैं।












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