'काला नमक' चावल: क्यों कहा जाता है इसे 'महात्मा बुद्ध का महाप्रसाद'? इसकी विशेषता जानिए

लखनऊ, 22 जून: उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर का मशहूर काला नमक चावल एक बार फिर सुर्खियों में है। यह चावल अब बिक्री के लिए ऑनलाइट पोर्टल फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध करा दिया गया है। हाल के वर्षों में इस चावल की विदेशों में भी मांग बहुत बढ़ गई है। इसकी खासियत यह है कि इसे एक घर में बनाया जाता है, लेकिन खुशबू पूरे मोहल्ले में महसूस होती है। लेकिन, यह जितना ही सुगंधित चावल है, इसमें उतने ही औषधीय गुण भी हैं। इतने फायदेमंद होने के बावजूद यह किसानों के लिए भी काफी लाभकारी है और इसकी पैदावार भी भरपूरी होती है। ऐतिहासिक कहानियों के मुताबिक इस चावल को खुद भगवान महात्मा बुद्ध का आशीर्वाद प्राप्त है।

'काला नमक' चावल: हजारों वर्ष पुराना है इतिहास

'काला नमक' चावल: हजारों वर्ष पुराना है इतिहास

'काला नमक' चावल बहुत ही उच्च गुणवत्ता वाला चावल का किस्म है। काले रंग की भूसी के चलते इसका नाम 'काला नमक' चावल पड़ गया। इसके महत्त्व का अंदाजा इसी से लग जाता है कि यह चावल सीधे भगवान बुद्ध से जुड़ा माना जाता है और इसलिए इसे 'महात्मा बुद्ध का महाप्रसाद' भी कहते हैं। इस चावल का इतिहास कम से कम 600 ईसा पूर्व या बुद्ध काल से है। प्राचीन काल में यह चावल मूल रूप से उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्र में उगाया जाता था। आज के सिद्धार्थनगर, संत कबीर नगर, महाराजगंज, बस्ती, गोंडा, गोरखपुर और कुशीनगर जिले इसमें शामिल हैं। वैसे भारत में उगाए जाने वाले सुगंधित चावलों की एक से बढ़कर एक किस्में हैं, लेकिन 'काला नमक' चावल की विशेषता उन सबसे हटकर है।

'काला नमक' चावल किसानों के लिए क्यों फायदेमंद है ?

'काला नमक' चावल किसानों के लिए क्यों फायदेमंद है ?

आजकल दुनिया जैविक खेती पर जोर दे रही है। 'काला नमक' चावल की विशेषता ये है कि यह सामान्यतौर पर जैविक खेती के जरिए ही उगाया जाता है। यानी धान की इस विशेष किस्म को बिना उर्वरकों और कीटनाशकों की मदद से ही उगाया जाता है और यह जैविक खेती के लिए पूरी तरह से उपयुक्त अति प्राचीन किस्म है। जाहिर है कि इसकी खेती में जब उर्वरकों और कीटनाशकों का इस्तेमाल ही नहीं होता तो किसानों की जेब का बोझ भी कम हो जाता है और उनकी फसल की लागत भी काफी कम हो जाती है। लेकिन, जहां तक पैदावार की बात है तो उसी इलाके में यह धान की दूसरी किस्मों से 40 से 50 फीसदी ज्यादा उपज देता है। इसकी एक और विशेषता ये है कि इसमें तने के सड़ने या भूरे धब्बे वाले रोग की शिकायत नहीं मिलती, जो धान की दूसरी फसलों में कभी-कभी किसानों के लिए बड़ा सिरदर्द बन जाते हैं।

'काला नमक' चावल सेहत के लिए कितना फायदेमंद है ?

'काला नमक' चावल सेहत के लिए कितना फायदेमंद है ?

इस चावल में एंथोसायनिन जैसे एंटीऑक्सिडेंट पाए जाते हैं, जो हृदय रोग की रोकथाम में सहायक होते हैं। यही नहीं इससे त्वचा के स्वास्थ्य की भी अच्छी देखभाल होती है। यह चावल आयरन और जिंक से भरपूर होता है और विटामिन की भी कमी नहीं होने देता है। इसे ब्लड प्रेशर नियंत्रित करने और खून से संबंधित समस्याओं को ठीक करने में मददगार पाया गया है। इसके अलावा इसमें प्रोटीन भी पाई जाती है। पोषक तत्वों से भरपूर होने के चलते विदेशों में इसकी मांग बढ़ गई है। पिछले साल 500 क्विंटल चावल सिंगापुर निर्यात किया गया था। जबकि, दुबई को 20 क्विंटल और जर्मनी को एक क्विंटल 'काला नमक' चावल भेजा गया था।

'काला नमक' चावल को मिला है जीआई टैग

'काला नमक' चावल को मिला है जीआई टैग

'काला नमक' चावल को 2013 में जियोग्राफिकिल इंडिकेटर (जीआई टैग) टैग दिया गया था, जिससे सिद्धार्थनगर और आसपास के जिलों को इसकी मान्यता मिली। जीआई रजिस्ट्री जर्नल ने यह भी जिक्र किया है कि 'काला नमक' चावल के समान अनाज उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले में पाए गए थे। गोविंद बल्लभ पंत यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्र के प्रोफेसर एचएन सिंह ने एक स्टडी में बताया था कि अगर लागत के मुकाबले में देखें तो बासमती के मुकाबले इसके उत्पादन में लागत में लगभग दोगुना से ज्यादा फायदा है। अबतक पूर्वांचल के महाराजगंज, गोरखपुर, सिद्धार्थनगर, संत कबीरनगर, बलरामपुर, बहराइच, बस्ती, कुशीनगर, गोंडा, बाराबंकी, देवरिया और गोंडा को जीआई टैग मिल चुका है।

'काला नमक' चावल को 'बुद्ध का महाप्रसाद' क्यों कहते हैं ?

'काला नमक' चावल को 'बुद्ध का महाप्रसाद' क्यों कहते हैं ?

कहते हैं कि चीनी यात्री फाहियान जब भारत यात्रा पर आया था, तब उसे 5वीं ईसा पूर्व के बौद्ध साहित्य हाथ लगे थे, जिसके बारे में उसने बाद में नोट लिखा है। उसने अपनी यात्रा वृतांत में बताया है कि जब महात्मा बुद्ध ज्ञानि प्राप्ति के बाद पहली बार कपिलवस्तु पहुंचे तो गांव वालों ने उन्हें रोक लिया और उनसे 'प्रसाद' की मांग की। भगवान बुद्ध ने गांव वालों को 'काला नामक' के अनाज आशीर्वाद रूप में दिए और दलदली जगह में बोने के लिए कहा। इसके साथ ही गौतम बुद्ध ने कहा, 'चावल में विशिष्ट सुगंध होगी, जो हमेशा लोगों को मेरी याद दिलाएगी।' कहते हैं कि यही वजह है कि यह धान कहीं और लगाया जाता है तो अपनी गुणवत्ता और सुगंध खो देता है।

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