कांशीराम ने कैसे बहुजन समाज पार्टी को खड़ा किया, दलित मायावती को यूपी में मुख्यमंत्री बनाने का लक्ष्य साधा
लखनऊ, 2 दिसंबर। बहुजन समाज पार्टी का गठन 14 अप्रैल 1984 को कांशीराम ने किया था। वे खुद सिखों के उस समुदाय में पैदा हुए थे जिनको अछूत माना जाता था। कांशीराम दलितों को सशक्त करना चाहते थे, उनके पिछड़ेपन को दूर कर उनको मजबूत बनाना चाहते थे। कांशीराम मानते थे कि सरकार बनाकर और सरकारी नौकरियों में ऊंचे ओहदों पर जाकर ही दलित और पिछड़े अपने समुदाय के हित को आगे बढ़ा सकते हैं। इसी विचार को लेकर कांशीराम ने आदिवासियों, दलितों और पिछड़ों को संगठित करने का काम शुरू किया था और इसमें अल्पसंख्यकों को भी जोड़ा था। बहुजन समाज पार्टी का गठन तो 1984 में डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की जयंती 14 अप्रैल को हुआ था लेकिन इस राजनीतिक पार्टी को जन्म देने वाले सामाजिक संगठन बामसेफ (BAMCEF- ऑल इंडिया बैकवॉर्ड एंड माइनॉरिटी कम्यूनिटीज एंप्लॉइज फेडरेशन) की स्थापना 1978 में डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की पुण्यतिथि 6 दिसंबर को दिल्ली में की गई थी। आइए जानते हैं कि कांशीराम कैसे और क्यों बहुजन समाज पार्टी बनाकर यूपी की सत्ता तक पहुंच गए?

ऑफिस से शुरू हुआ था कांशीराम का संघर्ष
60 के दशक में कुछ ऐसी घटनाएं हुईं जिसने कांशीराम को झकझोर दिया और वे दलित, शोषित, वंचित के लिए संघर्ष करने लगे। कांशीराम पुणे में डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट लैबोरेटरी में अफसर थे। वहां अंबेडकर जयंती के दिन छुट्टी मांगने पर कर्मचारी दीनाभाना की अपने सीनियर अफसर से तनातनी हो गई। दीनाभाना को सस्पेंड कर दिया गया। उनका साथ देने आए डीके खापड़े भी निलंबित कर दिए गए। ये दोनों ही एससी थे। कांशीराम भी दीनाभाना और डीके खापड़े के समर्थन में आंदोलन करने लगे। आंदोलन कर रहे कांशीराम को जब सस्पेंड किया गया तो कहा जाता है कि उन्होंने सीनियर अफसर की पिटाई कर दी। इन तीनों ने मिलकर 1971 में दलित कर्मचारियों के हक में संघर्ष करने के लिए एक संगठन बनाया था जिसका नाम रखा गया - ऑल इंडिया एससी, एसटी, ओबीसी एंड माइनॉरिटी एंप्लॉइज एसोसिएशन। कांशीराम के दिमाग में ऐसा संगठन बनाने का विचार था जिसमें शिक्षित एससी, एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यक हों, इनके जरिए वे दबे-कुचले समुदाय को जागरूक कर उनके संघर्ष को आगे बढ़ाना चाहते थे। यहीं से बामसेफ संगठन बनाने की कल्पना कांशीराम करने लगे और 1978 में अंबेडकर की पुण्यतिथि पर इस संगठन की स्थापना की घोषणा कर दी। उनके साथ संस्थापक सहयोगी बने- दीनाभाना और डीके खापड़े।

बामसेफ के जरिए दलित कर्मचारियों को कई प्रदेशों में किया एकजुट
दबे-कुचलों के हितों को आगे बढ़ाने के लिए कांशीराम बामसेफ संगठन के जरिए दलित कर्मचारियों को संगठित करने में लगे। वे दलितों पर हो रहे अत्याचारों का विरोध करते थे और संगठन के लोगों को जोड़ने के लिए साइकिल से ही सफर करते थे। वे दलितों के थिंक टैंक, टैलेंट बैंक के जरिए बदलाव लाना चाहते थे। कांशीराम ने प्रण किया था कि दलितों का हक और उनको सत्ता दिलाने के आंदोलन को चलाने के लिए खुद को समर्पित करेंगे, न तो वो शादी करेंगे और न ही अपने लिए संपत्ति जमा करेंगे। दलित वर्ग से आने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों पर उनकी अपील का भारी असर हुआ। दलित अधिकारी और कर्मचारी वेतन से बामसेफ को चंदा देने लगे। शिक्षित दलितों को कांशीराम ने एकजुट किया और दिल्ली, महाराष्ट्र, एमपी, पंजाब, हरियाणा और यूपी में बामेसफ को मजबूत बनाया। बामसेफ से लाखों लोग जुड़ गए और इसके बैनर तले कई संगठन भी बन गए। बामसेफ के बाद कांशीराम ने दलित शोषित समाज संघर्ष समिति बनाया जिसको डीएस फोर के नाम से जाना गया।

कांशीराम ने बनाया डीएस फोर, शुरू किया सत्ता में भागीदारी के लिए संघर्ष
बामसेफ के जरिए सामाजिक रूप से दबे-कुचलों को संगठित करने के बाद 1981 में कांशीराम ने दलितों के समर्थन को वोट में बदलकर राजनीति के जरिए सत्ता तक पहुंचने के लिए एक और संगठन बनाया जिसका नाम रखा- दलित शोषित समाज संघर्ष समिति (डीएस4)। कांशीराम ने नारा दिया- ठाकुर, बाभन, बनिया छोड़, बाकी सब हैं डीएस4। नारे से ही स्पष्ट है कि कांशीराम अपने संगठन के अंदर ठाकुर, ब्राह्मण और बनिया को छोड़कर बाकी सारे समुदाय को लाना चाहते थे। सत्ता में भागीदारी की शुरुआत के लिए डीएस4 के जरिए कांशीराम दिल्ली और हरियाणा के स्थानीय निकाय चुनाव में उतरे। इसको उन्होंने लिमिटेड पॉलिटिकल एक्शन का नाम दिया। कांशीराम का एक और नारा था- जिसकी जितना संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी। कांशीराम मानते थे कि देश में 85 प्रतिशत बहुजन हैं जिन पर 15 प्रतिशत सवर्ण (ठाकुर, ब्राह्मण, बनिया) राज करते हैं। उन्होंने नारा दिया- वोट हमारा, राज तुम्हारा, नहीं चलेगा, चलेगा। डीएस4 के जरिए कांशीराम ने एससी, एसटी, ओबीसी के साथ-साथ अल्पसंख्यकों को जोड़ने पर ज्यादा जोर लगाया। इसी संगठन के प्रचार के दौरान सात राज्यों में कांशीराम ने 3000 किलोमीटर की साइकिल यात्रा की।

बसपा बनाकर पूरी तरह राजनीति के मैदान में उतरे
1984 के अप्रैल में कांशीराम ने बहुजन समाज पार्टी बनाकर डीएस4 का उसमें विलय कर दिया और चुनावी राजनीति में सत्ता तक पहुंचने का संघर्ष शुरू किया। कांशीराम ने इसके बाद खुद को बामसेफ से अलग कर लिया और पूरी तरह बसपा को आगे बढ़ाने में लग गए। इसमें उन्होंने सिविल सेवा की तैयारी कर रही मायावती को साथ लिया और उत्तर प्रदेश में दलित महिला को मुख्यमंत्री बनाने के अभियान में जुट गए। कांशीराम का मानना था कि राजनीतिक सत्ता की चाभी से सभी ताले खोले जा सकते हैं। कांशीराम के इस राजनीतिक अभियान को मजबूत करने के लिए बामसेफ संगठन ने उसी तरह से काम किया जैसे भारतीय जनता पार्टी के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ करता है। कांशीराम ने जो कहा उसे करके दिखाया। वो दलित मायावती को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे। पहले उन्होंने मुलायम का साथ लिया और उनको समाजवादी पार्टी बनाने का आइडिया दिया। मुलायम-कांशीराम ने मिलकर राम मंदिर आंदोलन की लहर पर सवार होकर 1991 में सत्ता में आई भारतीय जनता पार्टी का रास्ता रोक दिया। 1993 में सपा-बसपा की सरकार बनी, मुलायम मुख्यमंत्री बने। 1995 में गेस्ट हाउस कांड के बाद जब यह गठबंधन टूटा तो कांशीराम भाजपा के समर्थन से मायावती को मुख्यमंत्री बनाने में कामयाब हो गए। इसके बाद भी भाजपा के समर्थन से दो बार और मायावती मुख्यमंत्री बनीं। 2007 में यूपी में बसपा की पूर्ण बहुमत से सरकार बनी थी।

कांशीराम की विचारधारा से भटक गई मायावती की बसपा
कांशीराम ने एक नारा दिया था- बाबा तेरा मिशन अधूरा, कांशीराम करेगा पूरा। कांशीराम दलितों के मूवमेंट की बात करते थे। उनका मानना था कि छत्रपति शाहूजी महाराज ने जो मूवमेंट किया था वही अपने-अपने समय में महात्मा ज्योतिबा फुले और बाबा साहेब अंबेडकर ने किया। इन तीनों ने एक ही मूवमेंट को 1848 से लेकर 1956 तक जारी रखा था। कांशीराम का कहना था कि वे इसी मूवमेंट को आगे ले जाना चाहते थे। मूवमेंट (आंदोलन) के जरिए ही परिवर्तन लाया जा सकता है। इसलिए अंबेडकर के बाद दलित आंदोलन को जमीन पर मजबूत करने के लिए कांशीराम को आज भी याद किया जाता है। कांशीराम दलित आंदोलन को सत्ता में भागीदारी तक ले गए। बहुजन समाज पार्टी मायावती के नेतृत्व में फिलहाल कमजोर होती दिख रही है उसके पीछे यह वजह भी मानी जाती है कि पार्टी कांशीराम की विचारधारा की लाइन से भटक गई। बहुजन हिताय की जगह सर्वजन हिताय ने ले लिया और इसने पार्टी का बड़ा नुकसान किया।












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