कहीं जमकर बरसाए जाते हैं लट्ठ, कहीं खेली जाती है लड्डू मार होली, जाने बरसाने में क्यों मनाई जाती ऐसी होली
Holi News: रंगों का त्योहार होली आने वाला है। इस दिन हर कोई गिले-शिकवे मिटाकर होली के रंग में रंगा हुआ नजर आएगा। चारों ओर रंग ही रंग नजर आएंगे। ऐसे तो होली के ढ़ेरो रंग है। देश के अलग- अलग हिस्से में रंग- बिरंगी परंपरा देखने को मिल जाएगी लेकिन सबसे मशहूर मथुरा, बरसाना और वृंदावन की होली है। जहां कहीं लड्डू मारो होली, कहीं फूलों की होली तो कहीं लठ्ठमार होली खेली जाती है।
इस बार पूरे देश में होली की धूम 14 मार्च को मचने वाली है। लेकिन भगवान कृष्ण की नगरी मथुरा की होली का अपना अलग ही अंदाज है। मथुरा, बरसाना और वृंदावन की गलियों में तरह-तरह से होली मनाई जाती है। कान्हा की गलियों में होली का रंग और उमंग मनमोहक होता है। बसंत पंचमी से ब्रज में 40 दिवसीय होली की शुरुआत हो जाती है। यहां पर रंगों के साथ-साथ और भी बहुत तरह की होली खेली जाती हैं। ब्रज की इस होली का आनंद लेने के लिए देश- विदेश से लोग आते है। आज हम आपको बताएंगे राधा रानी की नगरी बरसाने के लठ्ठमार और लड्डू मार होली की क्या विशेषता है?

क्यों मनाई जाती है लठ्ठमार होली
बरसाने की लठ्ठमार होली सिर्फ देश ही नहीं विदेश में भी फेमस है। हर साल होली से पहले मथुरा और बरसाने के गांवों में लट्ठमार होली का आयोजन बड़े धूमधाम से किया जाता है। यहां बरसाने की गोपियां गोकुल के ग्वालों के साथ लट्ठमार होली खेलती है। इस उत्सव में पुरुष ढाल लेकर आते हैं, जबकि महिलाएं लाठियों से उन पर प्रहार करती हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार यह होली राधा-कृष्ण के प्रेम प्रसंगों से जुड़ा है।
कथा के अनुसार, भगवान कृष्ण और उनके मित्र नंदगाँव से अपनी प्रेमिका राधा और उनकी सखियों पर रंगों का छिड़काव करने के लिए बरसाना आते हैं। लेकिन जैसे ही कृष्ण और उनके मित्र बरसाना में प्रवेश करते हैं तो वहाँ राधा और उनकी सखियाँ उनका लाठियों से स्वागत करती हैं।
इसी हास्य विनोद का अनुसरण करते हुए, हर साल होली के अवसर पर नंदगाँव के ग्वाल बाल बरसाना आते हैं और वहाँ की महिलाओं द्वारा रंग और लाठी से उनका स्वागत किया जाता है। इस दौरान विशेष ब्रज गीत गाए जाते हैं। इस खास मौके पर भांग और ठंडाई का आनंद लिया जाता है। पूरे गांव में कीर्तन गाए जाते है और श्री कृष्ण-राधा के भजन से पूरा वतावरण मंत्रमुग्ध हो जाता है।
बरसाने की लड्डूमार होली की विशेषता
बरसाने की लड्डूमार होली की भी अपनी खास विशेषता है। इस होली के बारे में खास मान्यता है पौराणिक कथाओं में बताया गया है द्वापर युग में राधारानी के पिता वृषभानु जी ने नंदगांव वालों को होली खेलने का निमंत्रण दिया था। नंद बाबा ने यह निमंत्रण स्वीकार कर लिया और पुरोहितों को होली के लिए बरसाना भेजा। गोपियों ने रंग गुलाल से पुरोहितों का जोरदार स्वागत किया और उन्हें लड्डू दिए। पुरोहित के पास कोई गुलाल नहीं था तो उन्होंने थाल में रखे लड्डू उठाकर गोपियों पर फेंकने शुरू कर दिए। तभी से यह परंपरा शुरू हुई और इसे लड्डू मार होली के रूप में मनाया जाने लगा।
एक और कथा के अनुसार बसाना में राधारानी की दासी फाग का निमंत्रण देने नंदगांव जाती हैं जहां वो लड्डू, गुलाल, और रंगों के साथ पहुंचती हैं। फिर नंदगावं का एक पंडा निमंत्रण स्वीकार की खबर लेकर बरसाने जाता है जहां उसके स्वागत में इतने लड्डू दिए जाते हैं कि वो खा नहीं सकता और खुशी से लड्डुओं को उछालने लगता है। सभी लोग खुशी से लड्डू की होली खेलने लगते हैं।
इस दिन भक्तजन राधा-कृष्ण की प्रेम भक्ती में मग्न एक दूसरे पर लड्डू फेंकते हैं। ऐसी मान्यता है कि जिन भक्तों पर लड्डू गिरते हैं उन्हें शुभ फल की प्राप्ति होती है। यह सिर्फ़ एक त्योहार नहीं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक है












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