Ghosi By Election Result: सहयोगियों पर भरोसा पड़ा महंगा, पूर्वांचल में अपनी रणनीति में बदलाव करेगी BJP

उत्तर प्रदेश की घोसी सीट पर बीजेपी चुनाव हार गई है। हालांकि बीजेपी अपनी रणनीति में बदलाव को लेकर मंथन करेगी। बीजेपी के सूत्रों का कहना है कि सहयोगी दलों के बड़े दावों पर भरोसा करना ही पार्टी को महंगा पड़ गया।

UP Politics: देश में अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव (Loksabha Election 2024) पहले बीजेपी (Bhartiya Janta Party) पूर्वांचल में अपना किला मजबूत करने की कवायद में जुटी थी। अखिलेश यादव के खिलाफ किलेबंदी में जुटी बीजेपी ने ओबीसी वोट बैंक पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए ओम प्रकाश राजभर के नेतृत्व वाली SBSP, संजय निषाद के नेतृत्व वाली NISHAD पार्टी के साथ गठबंधन किया। लेकिन घोसी में मिली चुनावी हार ने BJP को ओबीसी समीकरण की रणनीति पर फिर से सोचने के लिए मजबूर कर दिया है।

बीजेपी

बीजेपी की हार से खड़े हुए कई सवाल

घोसी विधानसभा उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के उम्मीदवार की हार ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या पार्टी को पूर्वी उत्तर प्रदेश के लिए अपनी रणनीति पर दोबारा विचार करने की जरूरत है। वह पूर्वांचल में अपने सहयोगियों पर कितना भरोसा कर सकती है?

पूर्वांचल में पिछले दो चुनावों से झटका खा रही बीजेपी

2019 के लोकसभा चुनाव और 2022 के विधानसभा चुनाव के बाद बीजेपी पूर्वी यूपी पर अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटी है। पार्टी ने इस क्षेत्र में 2014 के लोकसभा चुनाव और 2017 के विधानसभा चुनावों में जीत हासिल की थी। लेकिन, 2019 के लोकसभा चुनाव में वह पूर्वी यूपी में आठ सीटें आज़मगढ़, अंबेडकर नगर, ग़ाज़ीपुर, घोसी, जौनपुर, लालगंज, रायबरेली और श्रावस्ती हार गई थी। ये 2019 के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में हारी हुई 16 सीटों में से एक थीं।

2024 के लिहाज से पूर्वांचल में बीजेपी डगर कठिन

हालांकि 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा सत्ता में लौट आई लेकिन वह आज़मगढ़, मऊ, गाज़ीपुर, अंबेडकर नगर और जौनपुर सहित कुछ पूर्वी यूपी जिलों में अपना खाता खोलने में विफल ही रही। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बीजेपी के लिए अभी भी पूर्वांचल महफूज नहीं है और घोसी के हश्र के बाद वह अपने सहयोगियों के भरोसे नहीं रह सकती है।

ओबीसी वोट ट्रांसफर नहीं करा पाए सहयोगी?

भाजपा उम्मीदवार दारा सिंह चौहान की सपा उम्मीदवार सुधाकर सिंह से 42,000 से अधिक वोटों के अंतर से हार ने गठबंधन सहयोगियों एसबीएसपी और NISHAD पार्टी की अपने वोटों को ट्रांसफर कराने की क्षमता को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या ओपी राजभर और संजय निषाद जैसे सहयोगियों के पास अपना वोट दूसरी पार्टी को ट्रांसफर कराने की ताकत है। दरअसल घोसी में 4.4 लाख मतदाताओं में से 1.5 लाख अन्य पिछड़ा वर्ग के हैं। इनमें 60,000 राजभर, 40,000 चौहान और 40,000 यादव शामिल हैं।

उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष भूपेन्द्र सिंह चौधरी ने कहा कि,

पार्टी घोसी उपचुनाव में अपने उम्मीदवार की हार के कारणों की समीक्षा करेगी। हम 2024 का लोकसभा चुनाव जीतने के लिए नए सिरे से रणनीति बनाएंगे। सबका साथ-सबका विकास के नारे के साथ सभी समुदायों के मतदाताओं का समर्थन हासिल करने के लिए भाजपा पूर्वी यूपी में अभियानों की एक श्रृंखला शुरू करेगी।

दारा को टिकट देने के खिलाफ था पार्टी का एक धड़ा

भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि दारा सिंह चौहान के पाला बदलने और उन्हें उस सीट से मैदान में उतारने की पार्टी की रणनीति जिस पर उन्होंने 2022 के विधानसभा चुनाव में जीत हासिल की थी इसका उलटा असर हुआ। राज्य इकाई के कुछ नेताओं को इसका विरोध भी किया था। लेकिन, अंत में पार्टी आलाकमान ने दारा सिंह चौहान को ही मैदान में उतार दिया जिसका नतीजा हार के रूप में सामने आया है।

घोसी में ओबीसी फार्मूला हुआ फेल

एक राजनीतिक समीक्षकों का कहना है कि उपचुनाव का दबाव लोगों पर था। यह 2022 के विधानसभा चुनाव के जनादेश के भी खिलाफ था। दारा सिंह चौहान ने सपा के टिकट पर जीत हासिल की थी लेकिन अब वह सपा को चुनौती दे रहे थे। अभियान की शुरुआत से ही मतदाताओं में गुस्सा स्पष्ट था। ओबीसी और दलित मतदाताओं ने सपा के सवर्ण जाति के उम्मीदवार का समर्थन किया जबकि बीजेपी का ओबीसी उम्मीदवार हार गया।

भाजपा के एक वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष कहते हैं कि,

उपचुनाव में मिली हार की जिम्मेदारी गठबंधन के सहयोगियों एसबीएसपी प्रमुख ओम प्रकाश राजभर, NISHAD पार्टी प्रमुख संजय निषाद और दारा सिंह चौहान पर भी है। इन्होंने ओबीसी और दलित मतदाताओं के समर्थन का दावा किया था। लेकिन अपेक्षित परिणाम नहीं आया। भाजपा ने तो 1996, 2002 और 2017 में पार्टी उम्मीदवार फागू चौहान के सहारे घोसी सीट जीती थी। घोसी कभी भी बीजेपी का गढ़ नहीं रहा है।

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