यूपी चुनावों में कांग्रेस के साथ गठबंधन कर बसपा और सपा ने क्या खोया, क्या पाया?

लखनऊ, 29 नवंबर। उत्तर प्रदेश में 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव के बड़े दल छोटे दलों के साथ गठबंधन करने में लगे हुए हैं। इस बार के चुनाव में बड़े दलों का आपस में गठबंधन बनने के आसार नहीं नजर आ रहे हैं। बसपा ने इस बार अकेले मैदान में उतरने का ऐलान किया है। वहीं कांग्रेस ने गठबंधन के लिए दरवाजा खोल रखा है लेकिन कोई इस बड़ी पार्टी का हाथ थामने के लिए आगे नहीं आया है। यूपी के पिछले विधानसभा चुनावों पर नजर डालें तो दो बार ऐसा हुआ है जब कांग्रेस के साथ मिलकर किसी पार्टी ने चुनाव लड़ा था। 1996 में बहुजन समाज पार्टी के साथ मिलकर कांग्रेस चुनावी मैदान में थी। इसके बाद 2017 में कांग्रेस और सपा साथ आई थी। कांग्रेस के साथ 2022 के चुनाव में कोई गठबंधन क्यों नहीं करना चाहता, इसका जवाब में 1996 में हुए कांग्रेस-बसपा और 2017 में हुए कांग्रेस-सपा गठबंधन के अनुभवों में खोजा जा सकता है।

बड़ी पार्टियां 2022 में एक-दूसरे के साथ नहीं

बड़ी पार्टियां 2022 में एक-दूसरे के साथ नहीं

1989 के यूपी चुनाव में कांग्रेस को 94 और 1991 के चुनाव में 46 सीटें मिली थीं। उत्तर प्रदेश में गठबंधन कर चुनाव लड़ने की राजनीति की शुरुआत 1993 में हुई जब सपा और बसपा ने साथ मिलकर भाजपा को चुनौती दी थी। 1993 में सपा-बसपा गठबंधन ने मिलकर 176 सीटों पर जीत हासिल की। 1995 में हुए गेस्ट हाउस कांड से सपा और बसपा के रिश्ते खराब हुए तो बसपा का साथ भाजपा ने दिया। बसपा और भाजपा ने उत्तर प्रदेश की सत्ता में भले साझेदारी की हो लेकिन कभी साथ मिलकर चुनाव नहीं लड़ा। 1996 के चुनाव बसपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन हुआ था। गेस्ट हाउस कांड के बाद भाजपा की मदद से मायावती प्रदेश की पहली दलित मुख्यमंत्री बनी थीं लेकिन कुछ महीनों के बाद ही भाजपा ने समर्थन वापस ले लिया था। इसके बाद बसपा ने 1996 में कांग्रेस का हाथ थामा। इसके पीछे बसपा की रणनीति थी। बसपा इसी तरह से चुनाव में पार्टियों के साथ गठबंधन कर मजबूत होने की राजनीति करती रही है। 1996 में कांग्रेस-बसपा गठबंधन का लाभ मायावती को जरूर मिला लेकिन चुनाव के बाद कांग्रेस का साथ छोड़कर उन्होंने भाजपा से हाथ मिलाकर सरकार बना ली थी। सपा, भाजपा, बसपा और कांग्रेस, यूपी की ये चार बड़ी पार्टियां 2022 के चुनाव में उस दहलीज पर खड़ी हैं जहां एक-दूसरे के साथ चलना असंभव ही लग रहा है, भले ही राजनीति को संभावनाओं का खेल कहा जाता हो।

कांग्रेस-बसपा गठबंधन, बसपा रही फायदे में

कांग्रेस-बसपा गठबंधन, बसपा रही फायदे में

1993 में मुलायम की सपा के साथ गठबंधन कर बसपा ने 67 सीटों पर जीत हासिल की थी। 1991 के चुनाव में बसपा को सिर्फ 12 सीटें मिली थी। सपा के साथ गठबंधन का लाभ बसपा को मिला। 1996 में इसी तरह जब बसपा ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया तो फिर 67 सीटों पर पार्टी को जीत हासिल हुई थी। इस चुनाव में बसपा को सबसे बड़ा फायदा वोट के प्रतिशत का हुआ। बसपा को 27.73 प्रतिशत वोट हासिल हुए थे। वहीं कांग्रेस को इस चुनाव में 33 सीटें मिली। 1991 के चुनाव में कांग्रेस के पास 28 सीटें थी। इस गठबंधन से कांग्रेस को कोई खास फायदा नहीं हुआ था 1997 में मायावती ने भाजपा के साथ मिलकर सरकार बना ली थी और कांग्रेस का साथ छोड़ दिया था।

कांग्रेस-सपा गठबंधन, 2017 में सपा को नुकसान

कांग्रेस-सपा गठबंधन, 2017 में सपा को नुकसान

2017 में सपा नेता अखिलेश यादव ने विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ गठबंधन किया था। इस चुनाव में भाजपा ने छोटे दलों के साथ गठबंधन किया था। मोदी लहर और भाजपा के बिठाए समीकरणों के खिलाफ सपा और कांग्रेस साथ आई थी लेकिन दोनों पार्टियों का यह दांव काम नहीं आया। भाजपा 300 सीटों के पार चली गई, वहीं कांग्रेस 7 सीटों पर सिमट गई। सपा को इस चुनाव में 47 सीटों पर जीत हासिल हुई थी। इस तरह से कांग्रेस के साथ से सपा को लाभ नहीं हुआ। यही वजह है कि सपा इस बार भाजपा की तरह छोटे दलों को साथ लेकर चलने की रणनीति आजमा रही है। वहीं कांग्रेस डूबती नैया दिख रही है जिस पर कोई सवार नहीं होना चाहता है हलांकि इस बार प्रियंका गांधी ने अपनी पूरी ताकत झोंक रखी है। बसपा के साथ गठबंधन करने पर हर पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा है इसलिए उसके साथ भी बड़ी पार्टी नहीं जाएगी। कांग्रेस छोटी पार्टियों के साथ गठबंधन करना चाहती है लेकिन कौन साथ आएगा, अभी यह देखना बाकी है।

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