सपा से अशोक प्रधान का जाना पार्टी के लिए खतरे की घंटी
समाजवादी पार्टी से अशोक प्रधान का जाना पार्टी के लिए खतरे की घंटी, चार बार लोकसभा सांसद रह चुके हैं।
लखनऊ। समाजवादी पार्टी के भीतर जिस तरह से विवाद चल रहा है उससे तमाम नेताओं को अपने राजनीतिक संकट पर खतरा दिखने लगा है, इसका सबसे बड़ा उदाहरण प्रदेश में सपा के बड़े नेता अशोक प्रधान हैं जिन्होंने सपा का दामन छोड़ एक बार फिर से भारतीय जनता पार्टी का हाथ थाम लिया है। चुनावों की तारीखों के ऐलान के बाद जिस तरह से अशोक प्रधान ने सपा को छोड़ा है उसने प्रदेश में सपा के लिए जरूर मुश्किल संकेत दिए हैं।

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केंद्र की राजनीति में बड़ा नाम
अशोक प्रधान को प्रदेश का दिग्गज नेता माना जाता है और वह यूपी से चार बार लोकसभा सांसद रह चुके हैं, प्रधान पहली बार भाजपा की सीट पर 1996 में लोकसभा पहुंचे थे। वह खुर्जा-नोएडा से भाजपा की सीट पर चुनाव जीते थे और उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मंत्री का भी जिम्मा संभाला था। 1998 में प्रधान ने तमाम आकंड़ों को धता साबित करते हुए प्रदेश में देश की अबतक की 10 सबसे बड़े अंतर वाली जीत हासिल की थी। जिसके बाद उन्हें अटल बिहारी की सरकार में खाद्य मंत्रालय, श्रम मंत्रालय औऱ संचार मंत्रालय जैसे विभागों का जिम्मा दिया गया था।
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पार्टी की नूराकुश्ती के चलते बड़े नेता विमुख
हालांकि प्रधान 2009 में चुनाव हार गए थे लेकिन बावजूद इसके उन्होंने केंद्र की राजनीति में अहम भूमिका निभाई औऱ तमाम न्यूज चैनल पर वह भाजपा के अहम चेहरे के तौर पर दिखाई देते थे। लेकिन 2014 में प्रधान समाजवादी पार्टी का हाथ थामा था। सपा में आने के बाद मुलायम सिंह ने उन्हें पार्टी का महासचिव बनाया था। लेकिन सपा के भीतर जिस तरह की नूराकुश्ती चल रही थी उसे देखते हुए प्रधान ने सपा से दूरी करना ही उचित समझा। लेकिन अशोक प्रधान का समाजवादी पार्टी से जाना पार्टी के लिए एक बड़ा संकेत हो सकता है कि पारिवारिक कलह पार्टी के लिए काफी महंगी साबित होने वाली है।












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