UP OBC Politics: सपा के दो विकेट गिरने से यूपी में ओबीसी वोट पर क्या होगा असर?
उत्तर प्रदेश में मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी को पिछले दो दिनों में दो बड़े झटके लगे हैं। यह तब हो रहा है, जब बेंगलुरु में विपक्षी एकजुटता का प्रदर्शन करने के लिए दूसरी बैठक की तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं और तमाम विरोधी दल बीजेपी के खिलाफ अपनी दुश्मनी को फिलहाल दूर रखने का मन बनाते दिख रहे हैं।
रविवार को पूर्वी यूपी के प्रभावशाली ओबीसी नेता ओम प्रकाश राजभर की पार्टी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी ने बीजेपी के साथ गठबंधन में वापसी कर ली। शनिवार को पूर्वांचल के एक और कद्दावर ओबीसी नेता और सपा विधायक दारा सिंह चौहान ने भी यूपी विधानसभा की सदस्यता छोड़ दी थी।

दो कद्दावर ओबीसी चेहरों ने दिया विपक्ष को झटका
राजभर का कहना है कि उनकी पार्टी 2024 का चुनाव सामाजिक न्याय और पिछड़ों, दलितों और कमजोर वर्ग के उत्थान के लिए बीजेपी के साथ लड़ेगी। वहीं योगी आदित्यनाथ की पिछली सरकार में कैबिनेट मंत्री रह चुके चौहान के भी फिर से भारतीय जनता पार्टी में शामिल होना लगभग तय माना जा रहा है। यह दोनों ही नेता ओबीसी वोट के लिए बहुत ही प्रभावी माने जाते हैं।
राजभर और नोनिया वोटरों पर बीजेपी की नजर
ओपी राजभर की राजभर समाज के वोट बैंक पर मजबूत पकड़ मानी जाती है। 2022 के विधानसभा चुनावों में पूर्वी यूपी में भाजपा का जो तुलनात्मक रूप से कमजोर प्रदर्शन रहा था, उसकी बड़ी वजह सपा-सुभासपा का गठबंधन था। वहीं दारा सिंह चौहान एक और ओबीसी जाति नोनिया के सबसे बड़े नेता माने जाते हैं। उन्होंने पिछले विधानसभा चुनाव से ठीक पहले बीजेपी सरकार में मंत्री पद से इस्तीफा देकर साइकिल थामी थी और मऊ जिले की घोसी विधानसभा सीट से सफलता प्राप्त की थी।
यूपी में करीब 42% से 45% है ओबीसी वोट
अगर आंकड़ों पर नजर डालें तो यूपी में ओबीसी मतदाता करीब 42 से 45% हैं। इनमें से 9% यादव हैं। लेकिन, बीजेपी इनमें से बाकी बचे 32% से 35% गैर-यादव ओबीसी वोट पर ही ज्यादा फोकस करती रही है। पिछले विधानसभा चुनाव से पहले ओबीसी नेताओं के लगातार भाजपा से निकलने की वजह से पार्टी को काफी मुश्किल हुई थी। राजभर और चौहान को वापस लाकर पार्टी, उन्हीं कमियों की भरपाई की कोशिशों में जुट गई है। राजभर की तरह ही दारा सिंह का पूर्वांचल के मऊ, आजमगढ़ और गाजीपुर इलाकों में अच्छा प्रभाव रहा है।
2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी यूपी की 80 सीटों में से अकेले सिर्फ 62 ही जीती थी। हालांकि, तब सपा और बसपा का गठबंधन था। लेकिन, 2022 के विधानसभा चुनाव में यह गठबंधन टूटने के बाद भी खासकर पूर्वांचल में बीजेपी को काफी नुकसान हुआ था, जिससे उसकी सीटें 2017 के मुकाबले काफी कम हो गई थी। इसकी बड़ी वजह चुनाव से ठीक पहले बड़ी संख्या में ओबीसी नेताओं के सपा से हाथ मिलना था।
यूपी से बिहार तक ओबीसी वोट पर फोकस
यही वजह है कि बीजेपी गैर-यादव वोट बैंक पर बिहार से लेकर यूपी तक पूरा जोर लगा रही है। दोनों राज्यों को मिलाकर लोकसभा में 120 सांसद पहुंचते हैं। इसमें से बड़ी संख्या में सीटों पर हार या जीत में ओबीसी वोटरों को बहुत महत्वपूर्ण रोल रहता है। यही वजह है कि बीजेपी दोनों राज्यों में इस सोशल इंजीनियरिंग पर काफी जोर देने में जुटी है।












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